मुंबई उच्च न्यायालय ने ‘पीओपी’ पर से प्रतिबंध हटाया !

  • गणेशभक्त तथा मूर्तिकारों को मिली राहत !

  • प्राकृतिक जलस्रोतों में नहीं, अपितु कृत्रिम तालाबों में ही विसर्जन करने के आदेश !

मुंबई – संशोधित नियमावली के अनुसार छोटे आकार की ‘पीओपी’ (प्लास्टर ऑफ पेरिस) मूर्तियों के निर्माण, साथ ही उनकी व्यावसायिक बिक्री पर कोई प्रतिबंध नहीं है; परंतु उनका विसर्जन केवल कृत्रिम तालाबों में ही करना होगा, ऐसे आदेश मुंबई उच्च न्यायालय ने ९ जून को दिए । ‘पीओपी’ पर से प्रतिबंध हटाते हुए न्यायालय ने यह प्रावधान रखा है कि ‘पीओपी’ की प्रत्येक मूर्ति के पीछे लाल रंग का चिन्ह होना अनिवार्य है ।
मुंबई उच्च न्यायालय ने इस वर्ष के माघी गणेशोत्सव से ‘पीओपी’ पर प्रतिबंध का निर्णय लागू किया था । उच्च न्यायालय के आदेशानुसार महानगरपालिकाओं ने इस वर्ष ‘पीओपी’ पर प्रतिबंध होने के आदेश निकाले थे । इस बीच मूर्तिकार संगठन ने मुंबई में एक बडी बैठक की थी । इस बैठक में भाजपा के विधायक आशीष शेलार ने आश्वासन दिया था कि ‘इस प्रकरण में पीओपी से प्रदूषण होता है अथवा नहीं, इस संबंध में कोई सटीक अध्ययन नहीं किया गया है तथा हम न्यायालय जाएंगे ।’ मूर्तिकार संगठन ने ‘पीओपी’ की मूर्तियों के उपयोग के निर्णय के विरोध में न्यायालय में याचिका प्रविष्ट की थी । उसके उपरांत राज्य सरकार ने पद्मविभूषण प्राप्त वैज्ञानिक डॉ. अनिल काकोडकर की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की और उसकी रिपोर्ट केंद्रीय प्रदूषण मंडल को भेजी । वह उन्हें मान्य हुई, ऐसा न्यायालय में स्पष्ट हुआ ।

मुंबई उच्च न्यायालय के निर्देश

१. न्यायालय ने राज्य सरकार को ३ सप्ताह के अंदर एक समिति नियुक्त कर ‘पीओपी’ मूर्तियों के विसर्जन के लिए कौन से उपाय किए जाएंगे, इस विषय में विस्तृत एवं गहन जानकारी न्यायालय के सामने प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं । ३० जून को इसकी अगली सुनवाई है ।

२. सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडलों की बडी गणेश मूर्तियों के विसर्जन के विषय में राज्य सरकार को सभी प्रमुख मंडलों से बात कर समाधान निकालने के निर्देश मुंबई उच्च न्यायालय ने दिए हैं; क्योंकि न्यायालय के आदेशानुसार ‘पीओपी’ मूर्तियों को समुद्र, नदी, तालाब आदि प्राकृतिक जलस्रोतों में विसर्जित नहीं किया जा सकेगा ।

‘पीओपी’ पर प्रतिबंध प्रकरण के संपूर्ण विषय की पृष्ठभूमि !

१. केंद्रीय प्रदूषण मंडल ने वर्ष २०२० में ‘पीओपी’ पर प्रतिबंध लगाया था; परंतु उसका कार्यान्वयन करना विविध कारणों से राज्य सरकार के लिए संभव नहीं हो पाया था ।

२. मध्य के कुछ वर्षों में मूर्तिकारों ने इस विषय में याचिकाएं की थीं । मुंबई उच्च न्यायालय सहित अनेक उच्च न्यायालयों ने, साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने इन याचिकाओं को निरस्त कर दिया था । ‘पीओपी’ की मूर्तियां बनाना फिर भी जारी था ।

३. पर्यावरणप्रेमी जनहित याचिकाकर्ता रोहित जोशी एवं अन्यों ने ‘माघी गणेशोत्सव के लिए पीओपी मूर्तियों की ही बिक्री हो रही है’, ऐसी जनहित याचिका प्रविष्ट की ।

४. उपरोक्त याचिका पर मुंबई उच्च न्यायालय ने ‘पीओपी’ मूर्तियों पर प्रतिबंध का अब से कठोरता से कार्यान्वयन किया जाए’, ऐसा आदेश राज्य सरकार, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल (एम्.पी.सी.बी.), साथ ही राज्यभर के महानगरपालिका एवं जिलाधिकारी को वर्ष २०२५ के माघी गणेशोत्सव के समय दिया था ।

५. अब वापस ठाणे स्थित श्री गणेश मूर्तिकार कामगार संगठन ने मुंबई उच्च न्यायालय में याचिका प्रविष्ट (दाखिल) की है ।

६. विशिष्ट परिस्थितियों में ‘पीओपी’ को अनुमति देना संभव होने का दावा राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय में किया, साथ ही एक समिति नियुक्त कर समिति की रिपोर्ट ५ मई को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल को भेजी ।

७. मुंबई उच्च न्यायालय ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल को अपना मत रखने को कहा ।

८. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने राज्य शासन की समिति की रिपोर्ट पर विचार किया । उनकी विशेषज्ञ समिति ने स्वीकार किया कि, वर्ष २०२० में दिए गए मार्गदर्शक तत्त्व परामर्श के स्वरूप के थे । प्रतिबंध का प्रावधान ‘पीओपी’ मूर्तियों के केवल प्राकृतिक जलप्रवाहों में विसर्जन पर है, निर्माण और बिक्री पर नहीं ।

९. ९ जून को न्यायालय में राज्य के महाधिवक्ता डॉ. बिरेंद्र सराफ बोले कि, २० फीट से बडी मूर्तियां अपनी संस्कृति का भाग बन गई हैं । यदि मंडलों ने स्थायी रूप से उन्हीं मूर्तियों का उपयोग किया, तो राज्य के रूप में हम उसमें बाधा नहीं डालेंगे ।

संपादकीय भूमिका

  • श्री गणेश विसर्जन हिन्दू धर्मशास्त्र द्वारा बताई गई धार्मिक कृति है । इसलिए कोई भी आदेश निकालते समय सभी संबंधितों का मत विचार में लेना आवश्यक है । हिन्दुओं की धार्मिक परंपराओं के संदर्भ में धर्माचार्य, अधिकारी संत आदि का मार्गदर्शन नहीं लिया जाता, यह हिन्दू-बहुल भारत में हिन्दुओं के लिए लज्जाजनक है !
  • पुणे के ‘सृष्टि इको रिसर्च’ द्वारा किए गए शोध के अनुसार, ‘पीओपी’ (प्लास्टर ऑफ पेरिस) से जल प्रदूषण नहीं होता, अपितु इसके विपरीत पानी की गुणवत्ता में सुधार होता है । यह एक महत्त्वपूर्ण बिंदु है जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए । इसके अतिरिक्त, यह भी कई बार सामने आया है कि विसर्जन के लिए बनाए गए कृत्रिम कुंडों का पानी अधिकांश मुख्य जलप्रवाह में ही छोड़ दिया जाता है, जिससे कृत्रिम स्रोतों का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है । इन कृत्रिम जलस्रोतों के कारण कई बार देवता की मूर्तियों का अनादर भी होता है, जो भक्तों की भावनाओं को आहत करता है । पूर्व में कृत्रिम जलस्रोतों के निर्माण में भ्रष्टाचार के प्रकरण भी उजागर हुए हैं, जिससे इन परियोजनाओं की पारदर्शिता और प्रभावशीलता पर प्रश्न उठते हैं । इसलिए, धर्मप्रेमी और संवेदनशील हिन्दू जनता यह अनुभव करती है कि इन सभी महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर न्यायालय तथा सरकार दोनों स्तरों पर उतनी ही गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए ।