श्रीराम मंदिर की न्यायालयीन लडाई में विजय प्राप्त कराने में प्रखर धर्माभिमानी पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी का बहुत बडा योगदान है ।

१. बचपन से ही हिन्दुत्व के लिए कार्य करने की लगन
पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी का जन्म २७ मई १९५४ को हुआ । उन्होंने वर्ष १९७६ में वकालत आरंभ की । पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी जब १० वर्ष के थे, उस समय उनकी मां ने सीख दी थी कि ‘मुगलों के काल में जिन मंदिरों को गिराकर वहां मस्जिदें बनाई गईं, उन मंदिरों को पुनः वापस लेना है तथा आगे जाकर हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना साकार करनी है ।’ उसके कारण कदाचित बचपन से ही उन्हें ‘मुझे हिन्दुत्व का ही कार्य करना है’, इसकी तीव्र लगन थी ।
विशेष स्तंभ : हिन्दुत्व के वीर योद्धा

‘अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण हुआ । पूरे देश में उसका आनंदोत्सव मनाया गया; परंतु उसके लिए अनेक लोगों को संघर्ष करना पडा । इसमें अनेक लोगों ने तन, मन, धन एवं प्राणों का बलिदान दिया । उसमें श्रीराम मंदिर की न्यायालयीन लडाई में विजय प्राप्त कराने में प्रखर धर्माभिमानी पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी का बडा योगदान है । पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी सर्वाेच्च न्यायालय में वकालत करते हैं । हिन्दू धर्म एवं संस्कृति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता देखी जाए, तो हमें भगवान श्रीकृष्ण द्वारा भगवद्गीता में बताए गए ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्म ते संगोस्तवकर्मणि ।’ अर्थात ‘आपको केवल कर्म करने का अधिकार है; परंतु उसके फल पर अधिकार नहीं है । आप कर्म के फलों को आपका ध्येय न बनाएं तथा अकर्म में किसी प्रकार की आसक्ति न रखें’, इस सीख का स्मरण होता है । श्रीराम मंदिर के उपरांत अब वे उत्तर प्रदेश के काशी एवं मथुरा तथा मध्य प्रदेश की भोजशाला आदि मंदिरों की मुक्ति के लिए भी निःशुल्क लडाई लड रहे हैं । ‘यह देश संपूर्ण रूप से ‘हिन्दू राष्ट्र’ बने, यह उनका एकमात्र सपना है तथा यह सपना सच हो’, इसकी उन्हें लगन है । उन्होंने अपने जीवन में कभी भी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया । इसलिए पूरे देश में ‘कर्मठ हिन्दुत्वनिष्ठ अधिवक्ता’ के रूप में उनकी पहचान बन गई है । वे ‘हिन्दू फ्रंट फॉर जस्टिस’ के अध्यक्ष हैं । सामान्यतः भारतीय समाज, विशेषकर भारतीय संस्कृति के लिए उनका अतुलनीय योगदान है । उनके पुत्र अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन भी अपने पिता के कदम पर कदम रखकर सफलतापूर्वक इस मार्ग पर अग्रसर हैं ।
अपमान से सम्मान तक की कठिन यात्रा !
आज काल बदल गया है । वर्तमान समय में पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी का नाम राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान से लिया जाता है । पहले हिन्दुत्व के लिए कार्य करने के कारण समाज एवं संबंधियों का उनकी ओर देखने का दृष्टिकोण नकारात्मक था । अनेक लोग उन्हें कार्यक्रम में बुलाना भी टाल देते थे । ‘इन्हें यदि कार्यक्रम में बुलाया, तो ‘हम पर जातिवादी अथवा हिन्दुत्वनिष्ठ की मुद्रा लगेगी’, यह भय उन्हें होता था । उनके साथ संपर्क आने से हमें हानि न पहुंचे, ऐसा उन्हें लगता था । उसके कारण परिजन एवं परिचित लोग उनसे दूर रहने का प्रयास करते थे । न्यायालयीन क्षेत्र भी इसके लिए अपवाद नहीं था । अधिवक्ता एवं न्यायाधीश उनपर ताने कसते थे । धर्म के लिए उन्होंने लोगों से तिरस्कार सहन किया; परंतु पू. अधिवक्ता जैनजी ने यह लडाई नहीं छोडी । इसमें उन्हें अपनी धर्मपत्नी का भी सहयोग मिला ।
२. श्रीराम मंदिर की लडाई में सक्रिय सहभाग

वर्ष १९८६ में रामजन्मभूमि का ताला खोले जाने के उपरांत देश में हिन्दुत्व की लहर आई । उस समय उन्हें इसका भान हुआ कि ‘अब मां द्वारा दी गई सीख को वास्तव में उतारने का समय आ गया है; इसलिए मुझे कुछ करना चाहिए ।’ तब से उन्होंने इस कार्य में सक्रिय होने हेतु प्रयास आरंभ किए । ‘१० जुलाई १९८९ को उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय की लक्ष्मणपुरी खंडपीठ ने आदेश दिया कि ‘रामजन्मभूमि से संबंधित सभी अभियोग अब उच्च न्यायालय में चलाए जाएंगे ।’ उसके उपरांत हिन्दू महासभा ने उन्हें इस अभियोग में अधिवक्ता नियुक्त किया । तब से वे हिन्दू महासभा के माध्यम से रामजन्मभूमि की लडाई में सक्रियरूप से सहभागी हुए । उस समय वे उनके सफल कार्यकाल के मध्य में थे । उन्होंने २ दशकों से अधिक समय तक हिन्दू महासभा के पक्ष में यह अभियोग लडा ।
३. श्रीराम जन्मभूमि प्रकरण में मुसलमानों का पक्ष रखने का प्रस्ताव ठुकराना
पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी को रामजन्मभूमि प्रकरण में मुसलमानों का पक्ष रखने का प्रस्ताव मिला था । उसके लिए उन्हें बडा शुल्क भी मिलता; परंतु उन्होंने यह प्रस्ताव ठुकराया । उसके पीछे उनका दृष्टिकोण था कि ‘पैसों के लिए मैं अपनी आत्मा नहीं बेच सकता ।’ अधिवक्ताओं के समूह के अंग के रूप में उन्होंने ३२ वर्ष तक रामजन्मभूमि का अभियोग लडा ।
४. श्रीराम जन्मभूमिकी मुक्ति हेतु व्यक्तिगत आशा-महत्त्वाकांक्षाओं का किया त्याग

६ दिसंबर १९९२ को तथाकथित बाबरी का ढांचा गिराया गया । उसी दिन उनकी मां का स्वर्गवास हुआ; परंतु तब भी वे धर्म के प्रति अपने दायित्व से पीछे नहीं हटे । उन्होंने अपनी मां की तेरहवीं के अगले दिन ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लक्ष्मणपुरी खंडपीठ में याचिका प्रविष्ट की । न्यायालय के द्वारा भगवान श्रीराम की पूजा की अनुमति दी जाने तक वे इस प्रकरण में डटे रहे । वे कडाके की ठंड में सभी कागदपत्रों के साथ ऑटो में अकेले बैठकर लक्ष्मणपुरी उच्च न्यायालय आते थे; क्योंकि उस समय बहुत-कुछ सुविधाएं नहीं थी । वे सदैव ही मुसलमान समुदाय के लोगों से घिरे रहते थे । जब रामजन्मभूमि के विषय में विशेष सुनवाई चलती थी, तब पूरा न्यायालय धर्मांधों से भरा रहता था; परंतु उस स्थिति में भी पू. अधिवक्ता जैनजी हिन्दुओं के पक्ष में अकेले ही आवेश में वादविवाद करते थे । उस अभियोग में उन्होंने वादविवाद किया कि ‘भगवान श्रीराम के दर्शन करना प्रत्येक हिन्दू का जन्मसिद्ध अधिकार है । भगवान श्रीराम एक संवैधानिक अस्तित्व हैं तथा उनका दर्शन रोका नहीं जा सकता; इसलिए उसे तत्काल खोल देना चाहिए ।’ यह सुनवाई निरंतर १० दिन चली ।
१ जनवरी १९९३ को न्यायाधीश हरिनाथ तिलारी ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए कहा, ‘श्रीराम के दर्शन तुरंत आरंभ किए जाएं । प्रभु श्रीराम संवैधानिक पुरुष हैं, अतः उनका दर्शन रोका नहीं जा सकता ।’ इस निर्णय के उपरांत न्यायाधीश को लगा कि पू. अधिवक्ता जैनजी के प्राण संकट में हैं । इसलिए उन्होंने पू. जैनजी को अपनी गाडी में हबीबगंज चौक पर स्थित हनुमान मंदिर तक छोडा और वहां से वे घर चले गए । ‘यदि ऐसा कोई अभियोग अथवा निर्णय न होता, तो हमें वर्ष २०१० तथा वर्ष २०१९ में आया श्रीराम जन्मभूमि का निर्णय नहीं मिलता, साथ ही आज अयोध्या में बना प्रभु श्रीराम का मंदिर हमें दिखाई देता या नहीं’, इसके प्रति संदेह है ।

५. धर्मरक्षा हेतु उत्तर प्रदेश केतत्कालीन मुख्यमंत्री तथा समाजवादी दल के प्रमुख नेता मुलायम सिंह के साथ संघर्ष
अ. वर्ष १९८९ से १९९४ की अवधि में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के समाजवादी दल की सरकार सत्ता में थी । उसके कारण पू. जैन का उनके साथ सदैव संघर्ष रहा । उनकी सरकार ने अयोध्या में सैकडों कारसेवकों पर गोलियां चलाई थी । उस समय सरकार ने १६ कारसेवक मारे जाने की बात कही थी; परंतु पू. जैनजी ने घटनास्थल पहुंचकर १६ नहीं, अपितु ३६५ कारसेवकों के मारे जाने का दावा किया था ।
आ. वर्ष १९८९ से १९९४ की अवधि में पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी ने मुलायम सिंह सरकार के विरुद्ध अनेक अभियोग प्रविष्ट किए थे, जिसके कारण वे पू. जैनजी पर क्षुब्ध थे । एक दिन रात को मुलायम सिंह के मुख्य सचिव ए.पी. सिंह ने पू. जैन को मुख्यमंत्री का विरोध करना छोडने की चेतावनी दी तथा वैसा न करने पर परिणाम भुगतने की धमकी दी । उस समय पू. जैनजी ने मुख्य सचिव को ‘यह बिकाऊ वस्तु नहीं है’, ऐसा बोलकर वापस भेजा ।
इ. मुलायम सिंह ने एक ऐसा सुरक्षाबल बनाया था, जिसमें हिन्दुओं एवं मुसलमानों की संख्या ५०-५० प्रतिशत रहनेवाली थी । पू. अधिवक्ता जैनजी ने ऐसा होने से रोका तथा उसके उपरांत उन्होंने उर्दू भाषांतरकार तथा उर्दू शिक्षकों की भर्ती पर भी रोक लगाई ।
अखिल भारतीय हिन्दू राष्ट्रअधिवेशन में अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी को संत घोषित किया गया !

एक ही परिवार में एक ही समय पर पिता के संत हो जाने की, साथ ही उनके पुत्र एवं नाती के ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त करने की दुर्लभ घटना !
हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी ने वर्ष २०१९ के अखिल भारतीय हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन में धर्मरक्षा की तीव्र लगन रखनेवाले, निष्काम भाव से सेवारत रहने की वृत्ति से युक्त, उत्साह के अक्षय स्रोत, ध्यान-मन-स्वप्न में केवल रामराज्य का अर्थात हिन्दू राष्ट्र का निदिध्यास आदि विभिन्न गुणों से युक्त तथा सर्वाेच्च न्यायालय में वकालत करनेवाले हरि शंकर जैनजी के संतपद पर विराजमान होने का शुभ समाचार दिया । धर्मरक्षा के कार्य के साथ उनकी आध्यात्मिक यात्रा में पू. (अधिवक्ता) हरि शंकर जैनजी के कदम पर कदम रखकर अग्रसर उनके पुत्र अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन तथा उनके नाती कु. वृषांक, इन दोनों द्वारा ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त कर उनके जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होने की घोषणा भी इसी अधिवेशन में की गई ।
ई. वर्ष १९८६ में न्यायाधीश के.एम. पांडे ने श्रीराम मंदिर को खोलने का ऐतिहासिक आदेश दिया । उस समय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में उन्हें पदोन्नति मिलनेवाली थी; परंतु उनके द्वारा श्रीराम मंदिर के पक्ष में निर्णय देने से मुलायम सिंह क्षुब्ध थे । उसके कारण उन्होंने न्यायाधीश पांडे की पदोन्नति में अडंगा डाला । पू. जैनजी ने इसका विरोध कर मुलायम सिंह का षड्यंत्र उजागर किया । उसके कारण न्यायाधीश पांडे को पदोन्नति मिली ।
हिन्दुओं को ‘तालिबानी’ कहनेवाले अधिवक्ता राजीव धवन को दिया मुंहतोड जवाब !सर्वोच्च न्यायालय में जब रामजन्मभूमि प्रकरण की सुनवाई चल रही थी, उस समय विरोधी दल के अधिवक्ता राजीव धवन ने न्यायालय में ‘हिन्दू तालिबानी हैं’, ऐसा वक्तव्य दिया था । उस समय पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी ने भरे न्यायालय में कहा था, ‘यदि हिन्दू तालिबानी हैं, तो मैं भी तालिबानी हूं । इसके लिए मुझे जो दंड देना है, वह दीजिए ।’ |
६. तत्कालीन मुख्यमंत्री तथा समाजवादी दल के नेता अखिलेश यादव के विरुद्ध अभियोग
तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक प्रकरण में १९ धर्मांध आतंकियों को छोड दिया था । उसके कारण पू. अधिवक्ता जैनजी ने अखिलेश यादव के विरुद्ध अभियोग प्रविष्ट किया । उसके उपरांत अखिलेश यादव ने उन्हें ‘स्टैंडिंग काउंसिल’ से हटा दिया ।
७. हिन्दू धर्म से संबंधित १०२ अभियोगों में सहभाग पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी एवं अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन हिन्दू धर्म से संबंधित लगभग १०२ से अधिक अभियोगों में सम्मिलित हैं ।
अ. ‘लव जिहाद’ में फंसी पीडिताओं के लिए निःशुल्क न्यायालयीन लडाई : केवल श्रीराम मंदिर ही नहीं, अपितु कोई लडकी यदि ‘लव जिहाद’ में फंसी हो, तो उसके लिए निःशुल्क लडाई लडना, कहीं पीपल का पेड काटा गया, तो कहीं छोटीसी हनुमानजी की मूर्ति तोडी गई, ऐसे प्रकरणों में भी उन्होंने लक्ष्मणपुरी के न्यायालय में निरंतर लडाई लडी है ।
आ. मथुरा के श्रीकृष्ण मंदिर की लडाई : ‘मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली पर बनाई गई है । अतः पू. हरिशंकर जैनजी ने न्यायालय से इस मस्जिद को हटाकर वहां की १३.३७ एकड भूमि देवता को हस्तांतरित करने की मांग करनेवाला अभियोग प्रविष्ट किया है, जो वर्तमान समय में चल रहा है ।
इ. ताजमहल को शिवमंदिर घोषित करने की मांग : पू. हरि शंकर जैनजी ने ताजमहल मूलतः शिवमंदिर होने का दावा किया । उनके नेतृत्व में वर्ष २०१५ में स्थानीय ६ अधिवक्ताओं ने वहां के दीवानी न्यायालय में ‘ताजमहल को शिवमंदिर घोषित करने’ की मांग की है ।
ई. टीलेवाली मस्जिद अभियोग : ‘टीलेवाली मस्जिद का परिसर वास्तव में शेषनागस्थ टीलेश्वर महादेव का स्थान है; इसलिए उसे हिन्दुओं को सौंपा जाए’, इसके लिए पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी न्यायालयीन लडाई लड रहे हैं ।
उ. कुतुब मीनार के निर्माण के लिए मुसलमान आक्रांताओं द्वारा गिराए गए २७ हिन्दू तथा जैन मंदिरों का प्रकरण : कुतुब मीनार का परिसर मूलतः मंदिरों का था । वहां के २७ हिन्दू तथा जैन मंदिरों को गिराकर उनके अवशेषों से मस्जिद बनाई गई । इस परिसर में पूजा की अनुमति मिले; इसके लिए पू. अधिवक्ता जैनजी ने न्यायालय में याचिकाएं प्रविष्ट की, जिन पर सुनवाई चल रही है ।
ऊ. काशी विश्वनाथ धाम एवं ज्ञानवापी का प्रकरण : अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि प्रकरण में बडी विजय प्राप्त होने के उपरांत पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी ने काशी विश्वनाथ धाम से संबंधित ज्ञानवापी के प्रकरण में बडी विजय प्राप्त की । भारतीय पुरातत्व विभाग के ब्योरे के आधार पर पू. जैनजी ने यह दावा किया है कि ज्ञानवापी में मस्जिद नहीं, अपितु मंदिर है । हिन्दुओं के मौलिक अधिकार के रूप में पू. अधिवक्ता जैनजी ने देवी शृंगार गौरी की पूजा तथा प्रार्थना की अनुमति मांगी थी । उसके अंतर्गत वहां की गई खुदाई में शिवलिंग तथा अनेक हिन्दू प्रतीक मिले हैं । यह अभियोग वाराणसी न्यायालय में चल रहा है ।
ए. भोजशाला प्रकरण : मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला के प्रकरण में पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी ने इंदौर उच्च न्यायालय में रिट याचिका प्रविष्ट की है । वर्ष १०३४ में राजा भोज ने वहां एक भव्य गुरुकुल (भोजशाला) का निर्माण किया था; परंतु मुसलमान आक्रांताओं ने उसे गिराकर वहां मस्जिद का निर्माण किया है । वहां सरस्वतीदेवी का मंदिर होने का हिन्दुओं का दावा है । इस याचिका से पुरातत्व विभाग की ओर से इस पूरे परिसर के सर्वेक्षण की मांग की गई है ।
ऐ. संविधान में समाहित ‘समाजवादी’ एवं ‘धर्मनिरपेक्ष’, इन शब्दों को हटाने हेतु सर्वाेच्च न्यायालय में याचिका : भारतीय संविधान की प्रस्तावना में घुसाए गए ‘समाजवादी’ एवं धर्मनिरपेक्ष’ (सेक्युलर), इन शब्दों के संशोधन की वैधता को पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी ने सर्वाेच्च न्यायालय में चुनौती दी है । सर्वाेच्च न्यायालय में इसकी सुनवाई चल रही है ।
ओ. पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी ने न्यायालय में सच्चर आयोग की वैधता को चुनौती दी है ।

८. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सोनिया गांधी के विरुद्ध बने प्रत्याशी
पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी ने वर्ष १९९३ में अमेठी से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विरुद्ध चुनाव लडा; परंतु उसमें उन्हें पराजय का सामना करना पडा । उसके उपरांत उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका प्रविष्ट कर ‘सोनिया गांधी भारतीय नहीं, अपितु इटालीयन मूल की हैं’, इस आधार पर उन्होंने उनके चुने जाने को चुनौती दी थी । इसके साथ ही उन्होंने सोनिया गांधी के स्व. राजीव गांधी के साथ हुए विवाह की वैधता को भी चुनौती दी । उन्होंने ‘नागरिकता कानून १९५५’ के अनुच्छेद ५(१)(क) की वैधता को भी चुनौती दी, जिसके अंतर्गत सोनिया गांधी को पंजीकरण के द्वारा भारतीय नागरिकता मिली थी ।
९. समाचार वाहिनियों पर आयोजित परिचर्चाओं में सहभाग
पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी विभिन्न समाचार वाहिनियों पर आयोजित किए जानेवाले परिचर्चाओं में सहभागी होते हैं । उसमें वे हिन्दू धर्म, आक्रांताओं द्वारा गिराए गए मंदिर, हिन्दू राष्ट्र एवं हिन्दू जनता के पक्ष में प्रभावी वादविवाद करते हुए दिखाई देते हैं ।
कृतज्ञता
पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी ७० वर्ष की आयु में भी एक युवक की भांति हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान हेतु, साथ ही आक्रांताओं द्वारा मंदिरों को गिराकर बनाई गई मस्जिदों की भूमि पुनः हिन्दुओं को सौंपी जाए, इसके लिए जो संयत लडाई लड रहे हैं, उसके लिए उनके चरणों में कोटि-कोटि कृतज्ञता !
परिवार व्यवस्था, धर्मसंस्था एवं शिक्षाप्रणाली को साम्यवाद से संकट !
अधिक मास अथवा पुरुषोत्तम मास का महत्त्व !
Ghaziabad Hindu Student Murder : ‘बकरी की हत्या होते हुए देखा है क्या ?’, ऐसे प्रश्न पूछकर मुसलमानों द्वारा हिन्दू युवक की हत्या !
Uttarakhand Love Jihad : मुस्लिम युवक द्वारा पहचान छिपाकर हिन्दू नाबालिग लडकी को प्रताडित करने का प्रकरण सामने आया है ।
(और इनकी सुनिए…) — ‘इस क्षेत्र में हमारा ही भय है ! यहां तुम्हें बचाने कोई नहीं आएगा !’- Dapoli (Ratnagiri) dispute
हिन्दू जनजागृति समिति की ओर से अमृता विश्वविद्यापीठम् के निदेशक डॉ. यु. कृष्णकुमार से सद्भावना भेंट !