न्यायालय के हस्तक्षेप के कारण आतंकवाद के विरुद्ध लड़ने की क्षमता पर प्रभाव पड़ रहा है । इसलिए सर्वोच्च न्यायालय को कश्मीर जाकर वहां की स्थिति को देखना चाहिए ! – – Lt Gen D.P. Pandey (Retd)

भारतीय सेना के सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल डी.पी. पांडे की सलाह

लेफ्टनंट जनरल डी.पी. पांडे (निवृत्त)

नई दिल्ली – सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुडे मामलों में कई बार हस्तक्षेप किया है, जिससे सरकार और सेना द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों में विलंब हो रहा है । इस प्रकार के न्यायिक हस्तक्षेप से आतंकवाद के विरुद्ध लडने की क्षमता प्रभावित होती है । इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को कश्मीर जाकर देखना चाहिए कि सुरक्षाबल किस परिस्थिति में कार्य करते हैं ? आतंकवाद का ज़मीन पर क्या प्रभाव हो रहा है ? यह भी देखना चाहिए । यह सुझाव भारतीय सेना के सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल डी.पी. पांडे ने सर्वोच्च न्यायालय को दिया । वह एएनआई समाचार एजेंसी के पॉडकास्ट (साक्षात्कार) में बोल रहे थे ।

डी.पी. पांडे द्वारा प्रस्तुत मुख्य सूत्र

१. कश्मीर कोई न्यायालय की कक्षा नहीं है, जहाँ सब कुछ तर्क और नियमों से तय किया जाता है । वहाँ हर क्षण जान को खतरा होता है । वहाँ जाकर देखें कि आतंकवादियों की अमानवीयता किस हद तक पहुँच चुकी है, तभी न्यायालय को देश की सुरक्षा नीतियों की वास्तविक समझ आएगी ।

२. सर्वोच्च न्यायालय ने कभी-कभी आतंकवाद का सामना करने के लिए आवश्यक निर्णयों को रोका या उनमें विलंब किया है । सरकार और सेना को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर खुलकर और स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की अनुमति मिलनी चाहिए ।

३. यह समय राजनीतिक या कानूनी उलझनों में फंसे बिना आतंकवाद के विनाश के लिए एकजुट होने का है ।

कश्मीर की बजाय बिहार में पैसा खर्च किया होता, तो राज्य आगे बढ़ गया होता !

आज जो कुछ भी कश्मीर है, उसे बनाने के लिए सरकार ने बहुत खर्च किया है । वहाँ के लोगों को शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ प्रदान की गई थीं । यदि इतना ही पैसा बिहार में लगाया गया होता, तो आज वह राज्य बहुत आगे निकल गया होता ।