
एक निर्दयी एवं महापापी व्याध (बहेलिया), एक दिन आखेट (शिकार) करने निकला । मार्ग में उसे शिवमंदिर दिखाई दिया । उस दिन महाशिवरात्रि थी । इस कारण, शिवमंदिर में भक्तजन पूजन, भजन, कीर्तन करते दिखाई दे रहे थे । ‘पत्थर को भगवान माननेवाले मूर्ख लोग, ‘शिव शिव’ और ‘हर हर’ कह रहे हैं’, इस प्रकार से उपहासात्मक वक्तव्य देते हुए वह वन में गया । आखेट (शिकार) ढूंढने के लिए वह एक वृक्ष पर चढकर बैठ गया । किन्तु पत्तों के कारण उसे आखेट दिखाई नहीं दे रहा था । इस कारण उसने एक-एक पत्ता तोडकर नीचे गिराना आरंभ किया । यह कृत्य करते समय वह ‘शिव शिव’ कहता जा रहा था । तोडकर नीचे फेंके जानेवाले बेल के पत्ते उस वृक्ष के नीचे स्थित शिवलिंग पर गिर रहे थे, जिसका ज्ञान व्याध को नहीं था । प्रातःकाल उसे एक हिरन दिखाई दिया । व्याध उसे बाण मारने ही वाला था कि हिरन उससे बाण न मारने की विनती करने लगा । तत्पश्चात पाप का परिणाम बताकर वहां से चला गया । अनजाने हुआ महाशिवरात्रि का जागरण, शिव पर चढे बेलपत्र और शिव के जप के कारण व्याध के पाप नष्ट हुए एवं ज्ञान भी प्राप्त हुआ । इस कथा से ज्ञात होता है कि अनजाने में भी हुई शिवजी की उपासना से शिव कितने प्रसन्न होते हैं !
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘भगवान शिव की उपासना का अध्यात्मशास्त्र’)
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