चित्रकूट (मध्यप्रदेश) से भागवत भास्कर आचार्य श्री विपिन कृष्णजी महाराज की गोवा स्थित सनातन के आश्रम में सद्भावना यात्रा !

रामनाथी (गोवा), ६ अक्टूबर (समाचार) – गोवा में सनातन का आश्रम साक्षात् वैकुण्ठ है। भोगभूमि के कलंकित नाम से विख्यात गोवा राज्य में इतना सुंदर आश्रम बनाने वाले उस महान व्यक्ति को मेरा प्रणाम ! चित्रकूट (मध्य प्रदेश) के भागवत भास्कर आचार्य श्री विपिन कृष्णजी महाराज ने कहा कि ऐसे महापुरुष के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए कई जन्म लेने पड़ेंगे और वो भी अल्प पडेंगे । ६ अक्टूबर को महाराजा ने यहां सनातन के आश्रम में सदिच्छा भेंट की। इस अवसर पर उनका सम्मान सनातन के संत पु. पृथ्वीराज हजारे ने माला पहनाकर और शॉल, श्रीफल और उपहार देकर किया। इस अवसर पर गोवा मेडिकल कॉलेज के नाक-कान-गला विशेषज्ञ डाॅ. मार्कण्डेय तिवारी, एक हिन्दू संगठन ‘होली’ (समान विचारधारा वाले भारतीयों के लिए सहायक संगठन) के अध्यक्ष श्री. के.के. चतुवेर्दी, विशन सिंह राजपुरोहित सहित अन्य गणमान्य नागरिक एवं श्रद्धालु उपस्थित थे।
इस समय महाराज ने आश्रम में राष्ट्र एवं हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए चल रहे कार्यों के बारे में जाना। सनातन के साधक श्री. विक्रम डोंगरे ने उन्हें आश्रम में धर्म प्रचार-प्रसार के कार्य की जानकारी दी ।
इस अवसर पर महाराज ने श्रोताओं का मार्गदर्शन करते हुए कहा,

१. धर्म रक्षा और धर्म जागरण का कार्य करने वालों का मार्ग कितना कठिन होता है। जब-तब उन्हें संघर्ष करना पड़ता है। फिर भी, ईश्वर ऐसे ही लोगों का पक्ष लेता है।
२. आश्रम में आकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई और शांति का अनुभव हुआ।
३. गोवा जैसी भूमि में इतना अद्भुत आश्रम ! वहां ‘ओम’ जैसा स्वयंभू प्रतीक दिखायी देना अलौकिक है ।
४. यह आश्रम सायुज्य मुक्ति का केन्द्र है। (सायुज्य मुक्ति का अर्थ है भगवान के साथ मिलन से मुक्ति या भक्त जिस देवता की पूजा करता है उसमें विलीन हो जाता है।)
आश्रम के दर्शन से मेरी गोवा यात्रा सार्थक हो गई !
मैं एक कहानी वाचन कार्यक्रम के लिए गोवा आया हूँ। मैं श्री. चतुवेर्दी का आभारी हूं कि वे मुझे सनातन के आश्रम में ले आये । यहां आने से मेरा गोवा आना सार्थक हो गया है।’

आश्रम में त्रुटियों के बोर्ड की सराहना की !
इस मौके पर महाराज ने कहा कि आश्रम में साधक अपनी गलतियों को ब्लैकबोर्ड पर लिखते हैं। यही सनातन धर्म की विशेषता है। यही सनातन धर्म का आरंभ है और इसी से वो पुरा होता है। स्वयं द्वारा किये गये अपराधों को स्वीकार करना ही सनातन धर्म है। जो अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं कर सकता वह सनातन धर्म को भी स्वीकार नहीं कर सकता।
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