१. उद्देश्य
प्रत्येक मंगलकार्य के आरंभ में विघ्ननिवारणार्थ श्री गणपति पूजन करते हैं । उसी प्रकार पितर एवं पितर देवताओं का (नांदीमुख इत्यादि देवताओं का) नांदीश्राद्ध करते हैं ।
२. पूवतैयारी
नांदीश्राद्ध में (वृद्धिश्राद्ध में) दर्भ के स्थान पर दूर्वा लेते हैं; परंतु यह श्राद्ध यज्ञादि कर्मों के अंगीभूत हो, तो जडरहित अर्थात चोटीवाला दर्भ लेते हैं अथवा दूर्वा तथा दर्भ मिलाकर लेते हैं । जिस वस्तु में पूजित देवता के पवित्रक आकर्षित करने की क्षमता होती है, वह उस देवता की पूजा में प्रयुक्त की जाती है ।
३. विधि
सामने दो ताम्रपात्र रखें । दाहिनी ओर का ताम्रपात्र देवता के लिए एवं बाईं ओर का ताम्रपात्र पितरों के लिए होता है । दोनों ताम्रपात्रों में ‘पाद्य’ के उपचार हेतु जल, आसन एवं गंधादि सर्व उपचार हेतु गंध, फूल एवं जल एकत्रित एवं भोेजन हेतु दक्षिणा अर्पित करें । प्रत्येक कृत्य मंत्रपूर्वक करें । साथ ही, नांदीश्राद्ध का फल प्राप्त होने हेतु दोनों ताम्रपात्रों में एक-एक सिक्का अर्पित करें ।
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘सोलह संस्कार’)

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