
गोवर्धन (उत्तर प्रदेश) – भगवान श्रीकृष्ण ने लीला दिखाते हुए जहां अपनी करांगुली से पवित्र गोवर्धन पर्वत उठाया था, उस गोवर्धन पर्वत के सान्निध्य में निष्काम कर्मयोगी जगद्गुरु जनार्दन स्वामी महाराज के कृपाशीर्वाद से उनके उत्तराधिकारी श्री श्री १००८ महामंडलेश्वर स्वामी शांतिगिरीजी महाराज की प्रेरणा से ‘जनशांति धर्म समारोह’ का आयोजन किया गया था । यह समारोह २५ जुलाई से १ अगस्त की अवधि में श्री रमणरेती आश्रम में आयोजित किया गया था । इन ७ दिनों में महाजप अनुष्ठान, अखंड नंदादीप, यज्ञ, हस्तलिखित जपसाधना एवं अभिषेक जैसे विभिन्न उपक्रमों में सहस्रों भक्तों ने भाग लिया । १ अगस्त को यज्ञ की पूर्णाहूति से इस समारोह का समापन होने के उपरांत श्री श्री १००८ महामंडलेश्वर स्वामी शांतिगिरीजी महाराज ने अपना मौनव्रत छोडा । इस अवसर पर ‘सुदर्शन न्यूज’ के संपादक तथा महाराजजी के भक्त श्री. सुरेश चव्हाणके, ‘चाणक्य न्यूज’ के श्री. अजय शर्मा तथा हिन्दू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय मार्गदर्शक सदगुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी उपस्थित थे । इस समारोह में सहस्रों साधकों ने ‘भारत को शीघ्र हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए’ मौन साधना, ११ करोड जप, ५१ सहस्र अनुष्ठान पाठ तथा ५ सहस्र घंटे के श्रमदान का पुण्य समर्पित किया । इस समारोह में महाराष्ट्र से आए अनेक भक्त सपरिवार उपस्थित थे । इस कार्य में युवा वर्ग का बडे स्तर पर सहभाग था । कार्यक्रम का सूत्रसंचालन ब्रह्मचारी रामानंद ने किया ।
विश्वशांति का मार्ग सनातन धर्म के अनुकरण में है ! – सदगुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी, राष्ट्रीय मार्गदर्शक, हिन्दू जनजागृति समिति
धर्माचरण करना तथा धर्म के पथ पर चलना शांति का पहला कदम है । जपसाधना केवल मन की शांति के लिए ही नहीं; अपितु वह स्वयं की आध्यात्मिक शक्ति तथा सामर्थ्य का भी प्रतीक है । हमारा इतिहास यह बताता है कि श्रीराम-रावण युद्ध के उपरांत शांति की अर्थात रामराज्य की स्थापना हुई । श्रीराम जन्म के उपरांत शांति की स्थापना नहीं हुई, अपितु सीताहरण के उपरांत जो भीषण युद्ध हुआ, उसके उपरांत शांति स्थापित हुई । इसी प्रकार से श्रीकृष्ण जन्म के उपरांत शांति अथवा धर्मराज्य की स्थापना नहीं हुई; अपितु कंस के वध तथा अधर्मी कौरवों के विनाश के उपरांत ही धर्म की स्थापना हुई । आज हमारे देश में कथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर लोकतंत्र की व्याख्या ही परिवर्तित कर दी गई है । आज के लोकतंत्र में बहुमत का (बहुसंख्यकों का) विचार तथा उनके अधिकारों को अस्वीकार कर अल्पसंख्यकों को सभी अधिकार दिए जा रहे हैं, जो दुर्भाग्यपूर्ण है । समानता के मूल सिद्धांत के रूप में अल्पसंख्यकों को जो अधिकार दिए गए हैं, वे हम हिन्दुओं को भी मिलें; इसके लिए आज हिन्दुओं में संघर्ष की स्थिति आ गई है । यदि हमें धर्म की रक्षा करनी है, तो भले ही हम संख्या में अल्प हों; परंतु तब भी हमें धर्माचरण करते हुए दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन करना आवश्यक है । अतः इस आध्यात्मिक समारोह से तथा नामजप साधना से जो बल उत्पन्न हो रहा है, वह हमें हिन्दू राष्ट्र के कार्य हेतु आध्यात्मिक बल प्रदान करनेवाला तथा आशीर्वाद देनेवाला है । केवल भारत में ही हिन्दू राष्ट्र नहीं; अपितु सनातन धर्म के अनुकरण से विश्वशांति का ही मार्ग मिलता है ।
वर्तमान समय में छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास पुनः स्थापित करने की आवश्यकता ! – सुरेश चव्हाणके, संपादक, ‘सुदर्शन न्यूज’

छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम केवल भारत में ही नहीं, अपितु आज भी अखिल विश्व में ‘पराक्रमी योद्धा राजा’ के रूप में लिया जाता है । महाराष्ट्र संतों एवं पराक्रमी राजाओं की भूमि है; परंतु आज महाराष्ट्र को ही बचाने की स्थिति आ गई है । राष्ट्र की निर्मिति में महाराष्ट्र का योगदान सदैव महत्त्वपूर्ण रहा है । वर्तमान वर्ष शिवराज्याभिषेक का ३५० वां वर्ष है । आज केवल एक दिन शिवजयंती मनाकर अथवा छत्रपति शिवाजी महाराज जैसी वेशभूषा धारण कर हममें उनके गुण एवं शौर्य नहीं आएंगे, उसके लिए हमें छत्रपति शिवाजी महाराज की भांति आचरण करना पडेगा । छत्रपति शिवाजी महाराज ने बचपन में ही अपने सामने ‘हिन्दवी स्वराज’ की स्थापना का बडा एवं व्यापक ध्येय रखा तथा उसके लिए संगठन कर प्राणों की बाजी लगाई । आज इस इतिहास को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता है ।
श्री. अजय शर्मा, ‘चाणक्य न्यूज’ – हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु ऐसे आध्यात्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाना हमारा सौभाग्य है । इस कार्य में सदैव मेरा पूर्ण सहयोग रहेगा ।
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