वैश्विक हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन का चौथा दिन (२७ जून) : राष्ट्र, धर्म एवं संस्कृति की रक्षा

रामनाथी, गोवा – एक बार अटलबिहारी वाजपेयी के पास एक पाकिस्तानी अधिकारी आकर कश्मीर का मानचित्र देकर उन्हें कहने लगा, ‘आप यह टोपी निकाल कर दें’ उस समय उन्होंने कहा, ‘‘यह टोपी नहीं, अपितु हमारा मस्तक है तथा मस्तक कोई निकालकर नहीं देता ।’’ कश्मीर का इतिहास ८ सहस्र ५०० वर्ष से भी पुराना है । ऋषि कश्यप की यह नगरी कुछ सौ वर्ष पूर्व भारत की शिक्षानगरी थी । यहां की आज की झेलम अर्थात वितस्ता नदी तो साक्षात माता पार्वती का रूप है । शिवजी ने माता पार्वती को आज्ञा देकर वहां भेजा है ।
५०० वर्षाें तक कश्मीर पर आक्रमण हुए । मुसलमान शासकों ने यहां के हिन्दुओं पर अत्यंत क्रूरतापूर्ण प्रतिबंध लगाए । उसके कारण वहां का हिन्दू वंश नष्ट हुआ । अभी तक कश्मीरी लोगों को यहां से ७ बार पलायन करना पडा है । मुसलमान शासकों ने यहां के सूर्यमंदिर मार्तंड मंदिरसहित सैकडों मंदिर नष्ट किए । पिछले कुछ दिनों में सेना ने यहां के कुछ छोटे मंदिरों का पुनर्निर्माण करने का प्रयास किया है, ऐसी जानकारी उत्तरप्रदेश के प्रज्ञा मठ पब्लिकेशन के लेखक तथा प्रकाशक मेजर सरस त्रिपाठी ने दी । २७ जून को वैश्विक हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन के ‘राष्ट्र, धर्म एवं संस्कृति रक्षा’ के सत्र में ‘सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा में सेना की भूमिका’ विषय पर वे ऐसा बोल रहे थे ।
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