
अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन का परिचय

अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन सर्वोच्च न्यायालय में धर्माभिमानी अधिवक्ता हैं तथा ‘हिन्दू फ्रंट फॉर जस्टिस’ के प्रवक्ता हैं । राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए वे विभिन्न न्यायालयों में हिन्दुओं के पक्ष में उत्साहपूर्वक संघर्ष कर रहे हैं । उन्होंने ‘श्रीराम जन्मभूमि’ एवं मध्य प्रदेश की ‘भोजशाला’ के लिए अपने पिता पू. अधिवक्ता हरि शंकर जैनजी के साथ सफल न्यायालयीन संघर्ष किया है, साथ ही उनका मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि और काशी ज्ञानवापी सहित विभिन्न मन्दिरों को यवनों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए न्यायालयीन मुक्ति संघर्ष चल रहा है । उनका ‘अखिल भारतीय हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन’ में ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर घोषित किया गया है ।
१. ‘सेक्युलर’ एवं ‘सोशलिस्ट’ शब्दों का भारतीय संविधान में प्रत्यक्ष समावेश
‘वर्ष १९७६ में भारतीय संविधान में संशोधन कर ‘सेक्युलर’ (धर्मनिरपेक्ष) और ‘सोशलिस्ट’ (समाजवादी), ये २ शब्द सम्मिलित किए गए । संविधान के इस ४२वें संशोधन ने हिन्दुओं को इस देश का द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनने पर विवश कर दिया । इस देश में हिन्दुओं की जो विभिन्न समस्याएं उत्पन्न हुई हैं, उनका मूल भी यही शब्द हैं । ‘सेक्युलर’ और ‘सोशलिस्ट’, ये शब्द संविधान में अनुचित रीति से जोडे गए । उसके विरुद्ध हमने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है । मुझे पूर्ण आशा है कि ये दोनों शब्द आज नहीं तो कल, असंवैधानिक घोषित होंगे । इन शब्दों को सम्मिलित करने के लिए प्राध्यापक के.टी. शाह ने वर्ष १९४८ में संविधान सभा की चर्चा में निरन्तर ३ बार (१५ नवम्बर १९४८, २५ नवम्बर १९४८ और ३ दिसम्बर १९४८) प्रस्ताव रखा था; परन्तु तीनों बार संसद ने उसे अस्वीकार कर दिया । तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस देश में आपातकाल घोषित किया । तत्पश्चात वर्ष १९७६ में ४२वां संविधान संशोधन कर बिना किसी चर्चा के इन शब्दों को संविधान में बलपूर्वक घुसाया गया । संविधान के प्रत्येक शब्द की व्याख्या की गई है अथवा उस पर संसद में चर्चा हुई है; परन्तु ‘सेक्युलर’ और ‘सोशलिस्ट’, इन शब्दों को संविधान में स्थान देने के विषय में कोई भी चर्चा नहीं हुई है ।
२. ‘सेक्युलर’ और ‘सोशलिस्ट’ इन शब्दों के विषय में हिन्दुओं के साथ पक्षपात
अ. ‘हम धर्मनिरपेक्ष हैं और सब समान ही हैं’, ऐसा समझने की चूक केवल हिन्दू ही करते हैं । अनुच्छेद २५ द्वारा संविधान ने हमें अपने धर्म के आचरण का अधिकार दिया है, तो फिर हम धर्मनिरपेक्ष कैसे हो सकते हैं ? धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के नाम पर देश में विगत ७८ वर्षों में विभिन्न विरोधाभास दृष्टिगोचर हुए हैं । ‘लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम’ में (‘रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट’ में) यदि किसी को राजनीतिक दल का आधिकारिक पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) कराना हो, तो ‘अनुच्छेद २९ ए’ के अनुसार उसे ‘हम ‘सोशलिस्ट’ और ‘सेक्युलर’ इन दोनों सिद्धान्तों का पालन करेंगे’, ऐसा प्रतिज्ञापत्र देना पडता है । ‘ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन’ (ए.आई.एम.आई.एम.) दल का संविधान यदि पढा जाए, तो यह संपूर्ण दल केवल मुसलमान समाज के हित के लिए ही बना है, ऐसा ही कोई भी कहेगा, तदापि वह प्रत्येक चुनाव लडता है ।
आ. धर्म के नाम पर मत मांगे; इसलिए माननीय हिन्दूहृदयसम्राट बाळासाहेब ठाकरे पर अभियोग चलाया गया था । दूसरी ओर यही न्याय ‘ए.आई.एम.आई.एम.’ के ओवैसी पर लागू नहीं किया जाता । संसद में उन्होंने अपनी इस्लामी पद्धति से शपथ ली और ऊपर से ‘जय पैलेस्टाइन’, ऐसी घोषणा भी दी । जिससे संसद के व्यासपीठ से अनुच्छेद १०२ की स्पष्ट रूप से हत्या की गई । अनुच्छेद १०२ (१) के अनुसार ‘यदि कोई भी व्यक्ति विदेशी राष्ट्र के प्रति प्रेम और निष्ठा प्रदर्शित करता है, तो भारत के राष्ट्रपति उस व्यक्ति की सदस्यता तत्काल निरस्त कर देंगे’, ऐसा कहा गया है । ‘जय पैलेस्टाइन’ की घोषणा के विरुद्ध परिवाद (शिकायत) पंजीकृत किया गया, तब राष्ट्रपति महोदया के सम्मुख ओवैसी के प्रवक्ता ने ‘संसद में ‘जय हिन्दू राष्ट्र’ ऐसे भी नारे दिए गए थे’, ऐसा तर्क प्रस्तुत किया । वास्तव में बरेली के सांसद ने ‘जय हिन्दू राष्ट्र्र’, ऐसी घोषणा ओवैसी के शपथ ग्रहण करने के उपरान्त की थी । तो क्या ओवैसी ने संसद में ‘जय हिन्दू राष्ट्र’ की घोषणाएं दी जानेवाली हैं, यह पहले से ही मान लिया था ?
इ. दिल्ली के जन्तर मन्तर पर हुए एक आन्दोलन के समय ‘जय हिन्दू राष्ट्र्र’ ऐसी घोषणाएं दीं; इसलिए प्रीत सिंह को बंदी बनाया गया था । आज भी लोग धर्म के नाम पर मत मांग रहे हैं; परंतु उन पर किसी भी प्रकार की कार्यवाही नहीं की जाती; परंतु यदि कोई चुनाव के प्रचार में हिन्दू धर्म का उल्लेख करे, तो तत्काल विद्वेषपूर्ण भाषण (हेट स्पीच) किया; ऐसा कहकर अपराध पंजीकृत किया जाता है । क्या यह लोकतन्त्र की हत्या नहीं है ? इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि इस देश में ‘सेक्युलर’ एवं ‘सोशलिस्ट’, इन शब्दों की अत्यन्त भयावह असत्य कथा (‘फेक नैरेटिव’) तैयार की गई है ।
ई. अनुच्छेद ३० (१) यह संविधान का सबसे बडा विरोधाभास है; क्योंकि अनुच्छेद ३० (१) के अनुसार अल्पसंख्यक अपनी शैक्षिक संस्थाएं स्थापित कर सकते हैं । उस प्रकार उनकी शैक्षिक संस्थाएं अत्यधिक मात्रा में फल-फूल रही हैं । उनके लिए किए जानेवाले करोडों रुपयों के आर्थिक प्रावधान को देखा जाए, तो बडा आघात ही लगेगा । वक्फ बोर्ड को ब्याजमुक्त ऋण दिया जाता है । मुसलमान बालकों को ‘यू.पी.एस.सी.’ का (केंद्रीय लोकसेवा आयोग का) प्रशिक्षण दिया जाता है । देश में धर्मनिरपेक्षता लागू होने पर भी अल्पसंख्यकों के लिए पृथक आर्थिक प्रावधान क्यों किया जाता है ?, ये सब विरोधाभास हैं ।’
– अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, सर्वोच्च न्यायालय, देहली.
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