हिन्दुओं का शताब्दियों से अविरत संघर्ष !

‘९ नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने रामजन्मभूमि प्रकरण में निर्णय दिया । विगत कई दशकों से यह प्रकरण लंबित था; किंतु ऐसा होते हुए भी विगत ४० वर्ष से अधिवक्ता के. परासरन् (आयु ९२ वर्ष) ने दृढता से ‘रामलला विराजमान’ का पक्ष रखा । इस प्रकरण में जिस प्रकार हिन्दू और मुसलमान पक्षकार थे, उसी प्रकार एक और पक्षकार स्वयं प्रभु श्रीराम अर्थात ‘रामलला विराजमान’ भी थे । इस प्रकरण में अधिवक्ता के. परासरन् ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए अत्यंत विद्वत्तापूर्ण एवं गंभीरता से अपने सूत्र रखे । इसी कारण सर्वाेच्च न्यायालय की ओर से समस्त रामभक्तों को अपेक्षित निर्णय मिला है । इस प्रकरण के संदर्भ में उनके निम्नलिखित गुण एवं विद्वत्ता का पता चलता है ।
अधिवक्ता के. परासरन् की दृढता एवं लगन !
अधिवक्ता के. परासरन् की सहायता के लिए कुछ युवा अधिवक्ताओं का समूह है और उन्होंने इस रामजन्मभूमि प्रकरण में काम भी किया है । इन युवकों ने बताया कि इस प्रकरण की सुनवाई में ९२ वर्षीय अधिवक्ता के. परासरन् की दृढता, लगन और अध्ययन देखकर हमें भी प्रेरणा मिलती थी । अधिवक्ता परासरन् विगत ४० वर्ष से इस प्रकरण में पैरवी कर रहे हैं; किंतु उन्होंने कभी हार नहीं मानी ।
रामजन्मभूमि प्रकरण का समग्र अध्ययन !
अधिवक्ता के. परासरन् का रामजन्मभूमि प्रकरण का इतना अध्ययन है कि वे कई बार न्यायालय के सामने बोलते-बोलते ही महत्त्वपूर्ण दिनांक बहुत ही सहजता से बताते थे । वे उंगलियों पर गणना कर ‘कौन-से दिन क्या हुआ था ?’, यह बताते थे । उन्होंने ‘अयोध्या’ विषय पर इतना गहन शोध और अध्ययन किया है कि उस पर एक पुस्तक लिखी जा सकती है ।
(संदर्भ : दैनिक सामना, १०.११.२०१९)
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संपादकीय : आर्थिक अनुशासन