
१. सनातन संस्था का कार्य काल के अनुरूप एवं अवतारी होना
‘सप्तर्षि जीवनाडीपट्टी वाचन में ‘महर्षि ने सनातन संस्था के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी को ‘श्रीहरि विष्णु के अवतार’ क्यों कहा है ?’, साथ ही सनातन संस्था द्वारा प्रकाशित ग्रंथों को ‘पांचवा वेद’ अथवा ‘कलियुग के वेद’, क्यों कहा जाता है ?’, यदि इसे समझ लेते हैं, तो सनातन संस्था का कार्य काल के अनुरूप एवं अवतारी है’, यह सरलता से ध्यान में आएगा ।
२. अनेक भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में ग्रंथ की निर्मिति कर धर्मसंस्थापना करने का प्रयास करनेवाले परात्पर गुरुदेवजी !
कलियुग के इस काल में धर्म विरोधी शक्तियों ने हिन्दू धर्म नष्ट करने के लिए षड्यंत्र रच कर संस्कृत भाषा को जानबूझकर ‘मृत भाषा’ के रूप में घोषित किया । इस पृष्ठभूमि पर ‘प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मातृभाषा में धर्मग्रंथों का ज्ञान मिलकर साधना करना सरल हो’, इसलिए परात्पर गुरुदेवजी ने अनेक भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में ग्रंथों की निर्मिति की है तथा आज भी कर रहे हैं । इसके द्वारा परात्पर गुरुदेवजी धर्म नष्ट करने का षड्यंत्र निष्फल कर धर्मशिक्षा एवं साधना के द्वारा धर्मसंस्थापना करने का प्रयास कर रहे हैं ।

३. प्रत्येक व्यक्ति को मातृभाषा में धर्मशिक्षा प्रदान करने के लिए एवं साधना के संदर्भ में मार्गदर्शन करने के लिए परात्पर गुरुदेवजी द्वारा ग्रंथनिर्मिति का कार्य आरंभ होना
भारत में संस्कृत भाषा सिखाने की व्यापक सुविधा न होने के कारण आध्यात्मिक परतंत्रता में लिप्त एवं जिसे संस्कृत न आती हो, ऐसे समाज को संस्कृत श्लोक सुनाकर अथवा उनसे संस्कृत में बात कर उन्हें प्रभावित किया जा सकता है; परंतु उनके लिए धर्म अथवा साधनामार्गाें पर चलाना संभव नहीं होगा । यह बात ध्यान में लेकर ‘प्रत्येक व्यक्ति को मातृभाषा में धर्मशिक्षा देने के लिए एवं साधना के विषय में मार्गदर्शन करने के लिए परात्पर गुरुदेवजी ने ग्रंथनिर्मिति का कार्य आरंभ किया है तथा ‘सनातन ग्रंथमाला’ का कार्य सहजता से कर रहे हैं’, यह ध्यान में आता है ।
४. परात्पर गुरुदेवजी लिखित ग्रंथ एवं उनके समष्टि कार्य के द्वारा उनके अवतारी कार्य की प्रतीति होना
‘भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में जो ज्ञान विशद किया है, उसका प्रत्यक्ष आचरण कैसे किया जाए ? ईश्वरप्राप्ति के साथ ही धर्मसंस्थापना के कार्य में सहभागी होकर जीवन का उद्धार कैसे करें ?’ परात्पर गुरुदेवजी लिखित ग्रंथ एवं उनके समष्टि कार्य से यह साध्य हो रहा है । इससे उनके अवतारी कार्य की प्रतीति होती है ।
उपरोक्त विवेचन से सप्तर्षि जीवनाडी-पट्टिका वाचन में महर्षि ने कहा है, ‘परात्पर गुरुदेवजी ‘श्रीहरि विष्णु के अंश हैं । वे धर्मसंस्थापना का अवतारी कार्य कर रहे हैं’, ऐसा कहना कितना सार्थक एवं सत्य है !’, इसका अनुभव कर सकते हैं ।
– (सद्गुरु) डॉ. चारुदत्त प्रभाकर पिंगळे, राष्ट्रीय मार्गदर्शक, हिन्दू जनजागृति समिति (जनवरी २०२२)
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