
विद्याधिराज सभागार, २१ जून (संवाददाता) – त्रिपुरा जाने पर ही वहां के धर्मांतरण की स्थिति हमारी समझ में आ सकती है । वर्ष १९८५-८६ से त्रिपुरा में हिन्दुओं का बडी संख्या में धर्मांतरण होने लगा । मेरे गुरु शांतिकाली महाराज के साथ मैं भी धर्मांतरण रोकने के कार्य में लगा । मेरे बडे भाई का अपहरण कर उसे ‘तुम्हारे भाई को (पू. चित्तरंजन स्वामीजी को) धर्मांतरण रोकने का काम बंद करने के लिए कहो’ की धमकी दी; परंतु गुरुदेवजी की कृपा से मैंने मेरा कार्य जारी रखा । मैंने नौकरी छोडकर धर्मांतरण रोकने का प्रयास किया । इस कार्य में मुझे विश्व हिन्दू परिषद के अशोक सिंघल एवं रा.स्व. संघ के मोहन भागवत का सहयोग मिला, ऐसा प्रतिपादन पू. चित्तरंजन स्वामी महाराज ने किया । वैश्विक हिन्दू राष्ट्र महोत्सव में छठे दिन के सत्र में वे ऐसा बोल रहे थे ।

उन्होंने आगे कहा…
१. ईसाई धर्मप्रचारक शिक्षा के नाम पर अनेक राज्यों में घुसपैठ करते हैं । मणीपुर एवं नागालैंड राज्यों में बडे स्तर पर हिन्दुओं का धर्मांतरण होता है । आज के समय में २५ पादरी, नन तथा १ सहस्र प्रचारक त्रिपुरा आकर धर्मांतरण का कार्य कर रहे हैं ।
२. त्रिपुरा के लोग भोलेभाले हैं । वे शिक्षा को महत्त्व देते हैं । इन ईसाईयों ने वहां बच्चों के लिए विद्यालय खोले हैं । विद्यालय में प्रवेश लेने के २-३ वर्ष उपरांत ईसाई धर्मप्रसार इन बच्चों के अभिभावकों से मिलकर उन्हें बोलते हैं, ‘‘तुम्हारा लडका बुद्धिमान है । उसमें अच्छी क्षमता है । आप उसे बाप्तिस्मा दें । (धर्मांतरण करें) हम उसे अच्छी शिक्षा प्रदान करेंगे ।’ भोलेभाले हिन्दू उनकी बातों में आते हैं तथा इस प्रकार उस परिवार का धर्मांतरण होता है ।
३. गुरुदेवजी के आशीर्वाद से हम धर्मांतरण के विरुद्ध लडाई लड रहे हैं । आनेवाले २-३ वर्षाें में हम मिजोरम एवं नागालैंड से आए इन ईसाई धर्मप्रचारकों को यहां से भगा देंगे ।
४. त्रिपुरा के मठों-मंदिरों में अनेक साधु-संत हैं; परंतु वहां आनेवाले हिन्दुओं को धर्म की शिक्षा नहीं दी जाती । उसके कारण धर्मांतरण की समस्या और अधिक फैल गई है । हिन्दू धर्म बच गया, तभी जाकर मठ-मंदिर टिके रहेंगे; इसलिए पहले हिन्दू धर्म को बचाने का प्रयास कीजिए ।
५. यहां देश के कोने-कोने से आए हिन्दुत्वनिष्ठ यह प्रतिज्ञा लें कि हम धर्मांतरण रोककर सनातन धर्म, हिन्दू धर्म की रक्षा करेंगे तथा आवश्यकता पडने पर धर्म के लिए प्राणों का भी त्याग करेंगे ।
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