
रामनाथ (फोंडा), २१ जून (वार्ता.) – भारत की इस्लामी अर्थव्यवस्था समझना आवश्यक है । कश्मीर में केसर की खेती, हिमाचल प्रदेश में सेब की खेती, राजस्थान में खनिज उद्योग, उत्तरप्रदेश में पान मसाला उद्योग, गुजरात में तेल उद्योग, कर्नाटक में चंदन की खेती, केरल में नारियल की खेती आदि की अर्थव्यवस्था संपूर्णतः मुसलमानों के पास है । यह केवल योगायोग नहीं,अपितु सनातन हिन्दू धर्म एवं हिन्दुओं पर किया जानेवाला ‘प्रयोग’ (षड्यंत्र) है । इसलिए भारत की इस इस्लामी अर्थव्यवस्था को समझकर लेना चाहिए, हिन्दुओं को समझाकर बताना चाहिए और उसका विरोध करना चाहिए, ऐसा आवाहन देहली के अर्थशास्त्रज्ञ ऋषि वशिष्ठ ने वैश्विक हिन्दू राष्ट्र महोत्सव के छठे दिन किया ।
वे आगे बोले,
१. किसी भी प्रकार की मुहिम चलाने के लिए, संघर्ष करने के लिए धन की आवश्यकता होती है । धन के माध्यम से संघर्ष आरंभ किया जा सकता है, उसे समर्थन दिया जा सकता है । हिन्दुओं को ‘डिजिटल’ अर्थव्यवस्था का अभ्यास कर उसे सुदृढ बनाना चाहिए ।
२. भारत के बडे-बडे २-३ मंदिरों की अर्थव्यवस्था भी भारत के संपूर्ण राष्ट्रीय उत्पन्न की तुलना में अधिक है । ९५ प्रतिशत हिन्दू मंदिरों में दान करते हैं । उन्हें इस संघर्ष में सम्मिलित कर सकते हैं । उन्हें संगठित कर राष्ट्रीय, प्रादेशिक एवं जिलास्तरीय न्यास की स्थापना कर ऐसे हिन्दुओं को एक समान सूत्र में संगठित करने से इस्लामी षड्यंत्र रोक सकते हैं ।
३. ऐसा बताया जाता है कि भारत के मुसलमानों की संख्या बढ गई है । किसी गांव की लोकसंख्या गणना के लिए जब सरकारी अधिकारी जाते हैं तब एक घर में एक मुसलमान पुरुष की ३ पत्नियां और १० बच्चे दिखाए जाते हैं । दूसरे घर जाने पर वही लोग कुटुंब में दिखाए जाते हैं और उस संख्या के आधार पर सरकार से अनुदान, अनाज इत्यादि लिया जाता है । वही अनाज उस गांव के हिन्दुओं को मुसलमान अधिक मूल्य पर बेचते हैं । यह भी अर्थव्यवस्था के संदर्भ में एक षड्यंत्र है ।
४. भारत में जितने ‘मैट्रिमोनियल’ जालस्थल (विवाह मिलान करवानेवाले जालस्थल) हैं, उनमें ८० प्रतिशत इस्लामी देशों के हैं । इस माध्यम से लव जिहाद को प्रोत्साहन दिया जाता है । इसलिए हिन्दुओं को अपने ‘मैट्रिमोनियल’ जालस्थल आरंभ करने चाहिए ।
५. आर्य चाणाक्य ने अर्थव्यवस्था के विषय में ३ सूत्र बताए – भाव, स्वभाव एवं अभाव । भाव अर्थात जन्म से ही हम हिन्दू हैं, स्वभाव अर्थात सांस्कृतिक दृष्टि से हम सनातनी हिन्दू हैं; परंतु हममें अभाव है, तो स्वयं की अर्थव्यवस्था का ।भारतीय चलन पर छत्रपति शिवाजी महाराज एवं गुरु गोविंदसिंह के चित्र होने चाहिए, तो वहां म. गांधी का चित्र है, यही अभाव है ।
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