
जहां ‘राम’ हैं, वहां ‘काम’ नहीं चलता तथा जहां ‘काम’ है, वहां ‘राम’ नहीं होते । पाश्चात्त्य लोगों में कहीं पर भी मोक्ष की संकल्पना नहीं है । काम माया है तथा माया जीव को बहुत दुख देती है । ‘समलैंगिकता’ एवं ‘लिव-इन-रिलेशनशीप’ पाश्चात्त्य संस्कृति है, जिससे भारत की कुटुंबव्यवस्था नष्ट हो रही है । ऐसी घटनाएं कलियुग के प्रभाव के कारण घटित हो रही हैं । कलि के प्रभाव के कारण ‘ईष्ट’ ‘अनिष्ट’ लगता है तथा जो ‘अनिष्ट’ होतेा है, वह ‘ईष्ट’ लगता है । ‘समलैंगिकता’ एवं ‘लिव-इन-रिलेशनशीप’ के विषय में भी यही चल रहा है । अग्नि में घी डालने पर जैसे अग्नि अधिक भडक उठता है, उस प्रकार से भोगों की तृप्ति न होकर वे अधिक बढते हैं । हमारी संस्कृति भोगवादी नहीं, अपितु निवृत्तिपोषक है । भारतीय वर्णव्यवस्था भी निवृत्तिपोषक है । अल्लाउद्दीन खिलजी के हाथ में न लग जाएं; इसके लिए रानी पद्मिनीसहित १६ सहस्र महिलाओं ने अग्निप्रवेश किया । यह भारत की महान संस्कृति है । ‘समलैंगिकता’ एवं ‘लिव- इन-रिलेशनशीप’ हिन्दू धर्म को दुर्बल बनाने का षड्यंत्र है, ऐसा प्रतिपादन बंगाल की ‘शास्त्र-धर्म प्रचार सभा’ के उपसचिव पू. (डॉ.) शिवनारायण सेनजी ने किया । वैश्विक हिन्दू राष्ट्र महोत्सव के चौथे दिन (१९.६.२०२३ को) उपस्थित हिन्दुत्वनिष्ठों को संबोधित करते हुए वे ऐसा बोल रहे थे ।
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