
विद्याधिराज सभागृह, १८ जून (संवाददाता) – एम्.एस्. कलबुर्गी की हत्या के उपरांत ६३ लोगों ने ‘पुरस्कार वापसी’ की । मोहनदास गांधी की हत्या के उपरांत अभीतक मानो किसी की हत्या ही नहीं हुई तथा डॉ. दाभोलकर एवं कलबुर्गी हत्याएं कोई भयंकर घटनाएं थीं, ऐसा वातावरण बनाया गया । हमें किसी की हत्या का समर्थन नहीं करना है । नास्तिकतावादियों की हत्याओं के उपरांत हिन्दुत्वनिष्ठों को आतंकी प्रमाणित किया जाता है; परंतु क्या कोई ‘वामपंथियों ने कितने लोगों को मारा ?’, यह प्रश्न पूछेगा ?

वामपंथियों ने संपूर्ण विश्व में जो हत्याएं कीं, उनका आंकडा १० करोड से भी अधिक है । नक्सलियों ने ही भारत में १४ सहस्र से अधिक लोगों की हत्याएं की हैं । नक्सलियों ने जिनकी हत्याएं की हैं, उनमें आदिवासी, विधायक एवं मंत्री अंतर्भूत हैं; परंतु यह हमें दिखाया नहीं जाता । तथाकथित बुद्धिजीवी हमें जो दिखाते हैं, वही हम देखते हैं । वामपंथियों द्वारा भारत में की गई १४ सहस्र हत्याओं की अपेक्षा हमें ४ नास्तिकतावादियों की हत्याएं बडी लगती हैं । नक्सली ही वामपंथी हैं तथा वामपंथी ही नक्सली हैं; यह सच्चाई कोई नहीं बताता । यही वैचारिक आतंकवाद है । नक्सलियों द्वारा किए गए आक्रमणों के उपरांत वामपंथियों ने क्या कभी शोकसभा की है ? नहीं !; परंतु उसके विपरीत उन्होंने नक्सली गतिविधियों का समर्थन किया है । भारत में मुगलों द्वारा किए गए आक्रमणों की जब चर्चा होती है, उस समय ‘ये घटनाएं ४०० वर्ष पूर्व की हैं’, ऐसा बताया जाता है; परंतु २ सहस्र वर्ष पूर्व की बताई जानेवाली तथा कहीं पर भी लिखित स्वरूप में न होते हुए भी ‘आर्याें ने द्रविडों पर अत्याचार किए’, ऐसा हमें सुनाया जाता है । यही वैचारिक आतंकवाद है । केवल ४ नास्तिकवादियों की हत्याओं के विषय में नहीं , अपितु वामपंथियों द्वारा अभीतक की गई सहस्रों हत्याओं के विषय में हिन्दुत्वनिष्ठों को प्रश्न उठाना चाहिए, ऐसा प्रतिपादन हिन्दू विधिज्ञ परिषद के अध्यक्ष अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने किया ।
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