१. ‘तुषार गांधी विरुद्ध राकेश आस्थाना’ प्रकरण में सर्वाेच्च न्यायालय को पुलिस एवं प्रशासन के प्रति अविश्वास !
‘२० फरवरी २०२३ को ‘तुषार गांधी विरुद्ध राकेश आस्थाना’ प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ के सामने सुनवाई हुई । उस समय देहली पुलिस ने मई २०२२ में ‘सुदर्शन समाचार वाहिनी’ के संपादक श्री. सुरेश चव्हाणके द्वारा ‘हिन्दू युवा वाहिनी’ के कार्यक्रम में भडकाऊ भाषण देने के प्रकरण में शपथ पत्र प्रस्तुत किया । इस शपथ पत्र में उन्होंने बताया कि ‘श्री. चव्हाणके के भाषणों में द्वेषमूलक, भडकाऊ तथा शत्रुता उत्पन्न करने जैसा कुछ भी नहीं था ।’ उस पर न्यायालय ने तीव्र अप्रसन्नता व्यक्त कर वरिष्ठ स्तर के अधिकारी से और अच्छा शपथ पत्र प्रविष्ट करने का आदेश दिया । इस सुनवाई में अतिरिक्त महाधिवक्ता के.एम. नटराजन ने मुख्य न्यायाधीश की पीठ के सामने कहा कि चव्हाणके के प्रकरण का अन्वेषण अब बहुत आगे तक पहुंच चुका है, अतः ‘फॉरेंसिक’ प्रयोगशाला से उनकी आवाज के उदाहरण (सैम्पल) मिलने की संभावना है ।’

तुषार गांधी ने यह याचिका प्रविष्ट की थी, जिसमें उन्होंने कहा, ‘तहसीन पूनावाला प्रकरण में देहली पुलिस ने न्यायालय के आदेश का पालन नहीं किया ।’ पिछली सुनवाई के समय सर्वोच्च न्यायालय ने प्रश्न किए, ‘इस प्रकरण में अपराध पंजीकृत करने में ५ माह का समय क्यों लगा ? तथा क्या उसमें किसी को बंदी बनाया गया है ?’ उसका उत्तर देते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता के. एम. नटराजन ने कहा कि आवाज के उदाहरण (सैम्पल) शीघ्र ही मिल जाएंगे, साथ ही अप्रैल माह के पहले सप्ताह में आरोपपत्र की प्रति भी प्रस्तुत की जाएगी । उसके उपरांत मुख्य न्यायाधीश सहित तीन सदस्यीय पीठ ने इस प्रकरण की सुनवाई ६ अप्रैल २०२३ को रखी है ।
इस प्रकरण की सुनवाई में हुए प्रश्नोत्तर से मुझे बचपन में सुनी हुई गांव की एक कथा का स्मरण हुआ । उसमें एक व्यक्ति छोटे बच्चे से पूछता है, ‘यदि बाघ तुम्हारे पीछे पडा, तो तुम क्या करोगे ?’ उस पर वह बच्चा कहता है, ‘मैं पेड पर चढ जाऊंगा ।’ उसके पश्चात वह व्यक्ति पूछता है, ‘बाघ पेड पर चढ गया तो ?’ बच्चा कहता है, ‘मैं पहाड पर चढ जाऊंगा ।’ व्यक्ति पूछता है, ‘बाघ वहां भी आ गया तो ?’ इस पर वह बच्चा सीधे-सीधे उसे पूछता है, ‘बाघ मुझे खा जाए, क्या आपकी यह इच्छा है ?’ इस बात की भांति ‘तहसीन पूनावाला’ प्रकरण में अपराध पंजीकृत कर इसका अन्वेषण अगले स्तर पर पहुंच गया है, साथ ही आवाज के उदाहरण भी न्याय-चिकित्सकीय प्रयोगशाला को भेजे गए हैं तथा वे शीघ्र ही अन्वेषण विभाग को मिलेंगे ।
२. गोतस्करों के कथित सामूहिक हत्याकांड के विरुद्ध न्यायालय में तहसीन पूनावाला की याचिका
लगभग ८-१० वर्ष पूर्व सर्वोच्च न्यायालय में आधुनिकतावादियों की तूती बोलती थी । गुजरात दंगे, आदिवासियों पर होनेवाले अत्याचार, नक्सलियों की हत्याएं, गोहत्या के कारण सामूहिक हत्याएं जैसे विषयों में उनकी बहुत रुचि थी । तहसीन पूनावाला सीधे सर्वोच्च न्यायालय तक इस प्रकार के विषय ले गए । उसमें उन्होंने बताया कि गोहत्या रोकने के लिए गोरक्षक बडी मात्रा में सामूहिक हत्याएं करते हैं । अतः किसी सामाजिक समूह के विरुद्ध ऐसी अमानुषिक घटनाएं नहीं होनी चाहिए । यह सब बंद होना ही चाहिए । मुख्य न्यायाधीश सहित तीन सदस्यीय पीठ ने १७ जुलाई २०१८ को पूनावाला की इस याचिका पर निर्णय दिया ।
इस समय न्यायालय ने राज्य सरकार, पुलिस प्रशासन तथा प्रमुख व्यक्तियों को झूठे एवं द्वेषमूलक समाचार प्रसारित करनेवालों के विरुद्ध अपराध पंजीकृत करने का आदेश दिया, साथ ही यह भी कहा कि इन आपराधिक अभियोगों पर तीव्रगति सुनवाई के माध्यम से निर्णय दिए जाएं एवं आरोपियों को भारतीय आपराधिक दंडसंहिता में प्रावधित अधिकाधिक दंड दिया जाए । (कनिष्ठ न्यायालय के न्यायाधीशों को क्या अपनी बुद्धि का उपयोग ही नहीं करना है ? केवल सर्वोच्च न्यायालय ने कहा; इसलिए आरोपी को कानून में बताया गया अधिकाधिक दंड देना अन्याय नहीं है ? तो ऐसे प्रकरण में प्रमाण देखे बिना दंड देने के लिए कहने की अपेक्षा सर्वोच्च न्यायालय ऐसे सभी प्रकरणों को उसके यहां हस्तांतरित करे तथा स्वयं ही दंड दे, ऐसा किसी को लगे, तो उसमें अनुचित क्या है ? – संकलनकर्ता)
इसके साथ ही हत्या किए गए व्यक्तियों को सरकार की ओर से सहायता राशि दी जाए, ऐसे अपराध न हों तथा कानून का राज हो; इसके लिए पुलिस सतर्क रहे । कहीं भी भीड ने एकत्रित होकर द्वेषमूलक वातावरण तैयार किया, तो उसे तुरंत रोका जाए; यह निर्देश देकर याचिका की निकासी की ।
३. न्यायालय के माध्यम से हिन्दुत्वनिष्ठों पर कार्यवाही करने के लिए आधुनिकतावादियों का दबाव
इस निर्णय के ३ दिन उपरांत राजस्थान के रामगढ जिले के ललवंडी में कथित सामूहिक हत्याकांड होने के प्रकरण में याचिका प्रविष्ट की गई । उसमें भी सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान के वरिष्ठ अधिकारियों को लिखित रूप में उनका पक्ष रखने का आदेश दिया । इस प्रकार जनता के लिए लड रहे तहसीन पूनावाला ने द्वेषमूलक भाषणों के प्रकरण में क्या बडी सफलता प्राप्त की ? अब इस निर्णय का क्रियान्वयन होता है अथवा नहीं ?, यह देखने के लिए तुषार गांधी जैसे समाजसेवी याचिका प्रविष्ट करते हैं । उस पर राज्य सरकारों तथा पुलिस प्रशासन द्वारा प्रस्तुत किए गए शपथ पत्रों पर प्रमुख न्यायाधीश संतुष्ट नहीं होते । वे इससे अधिक अच्छा प्रतिज्ञा पत्र प्रविष्ट करने के लिए कहते हैं, साथ ही संबंधित प्रकरण के आरोपियों को बंदी बनाया गया अथवा नहीं ?, यह भी पूछते हैं । सर्वसामान्य लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या इस माध्यम से वे परोक्ष रूप से सुझा रहे हैं कि ‘देहली पुलिस सुरेश चव्हाणके को बंदी बनाए ।’
– (पू.) अधिवक्ता सुरेश कुलकर्णी, मुंबई उच्च न्यायालय. (२१.२.२०२३)

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