
१. गन्ने का रस, आंवले का रस अथवा भूरा कद्दू (पेठा) के रस के साथ अमलतास की फलियों का गूदा लें ।
२. अनानास का रस लें ।
३. अपामार्ग (लटजीरा) के बीज रातभर मट्ठे (छाछ) में भिगोकर रखें और सवेरे पीसकर छाछ के साथ लें ।
४. काकमाची (मकोय) का स्वरस, मूर्वा (मरोड फली) क्षार, यवक्षार (एक प्रकार का नमक जो जौ के क्षार से बनता है) एवं इमली के क्षार के साथ लें ।
५. करेले का रस लें ।
६. कुटकी एवं त्रिफला चूर्ण गरम पानी के साथ लें ।
७. पके हुए केले का मधु (शहद) के साथ सेवन करें ।
८. पिसे हुए कद्दू (पेठे) के पत्ते एवं पिसी हुई हलदी को दही के साथ सेवन करें ।
९. सफेद प्याज, गुड, थोडी हलदी डालकर सवेरे व रात में लें । इमली का क्षार आणि यवक्षार, प्रत्येक १ ग्राम लेकर चने के पानी के साथ प्रतिदिन पीने के लिए दें ।
१०. चने की दाल एवं समान मात्रा में गुड डालकर बनाया मिश्रण ३ दिन खाएं ।
(संदर्भ : जालस्थल sanatan.org/hindi)
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?