
तीसरा विश्वयुद्ध अतिभीषण होने के कारण शारीरिक और मानसिक समाधान योजना के साथ ही आध्यात्मिक उपचार भी करने पडते हैं । इसका अर्थ है हमें अपनी साधना के प्रयास बढाने होंगे । धर्म अधर्म युद्ध में जो ईश्वर की भक्ति करता है, धर्म के पक्ष में खडा रहता है, ईश्वर उसकी रक्षा करते हैं; परंतु उसके लिए हमें भक्त बनना आवश्यक है । आपातकाल आगे गया है । उसका लाभ उठाकर अधिकाधिक भक्ति का, साधना का, धर्माचरण करने का प्रयास बढाया तो ईश्वर भक्तों की रक्षा करेंगे ही, इसमें कोई शंका नहीं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
कोटि कोटि प्रणाम !
सनातन धर्म के मूर्तिमान स्वरूप सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन !
संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।
प.पू. भक्तराज महाराजजी द्वारा अपने शिष्य डॉ. आठवलेजी के प्रति व्यक्त गौरवोद्गार !
इरोड (तमिलनाडु) में ‘महासुदर्शन याग’ एवं ‘आयुष्य होम’ भावपूर्ण वातावरण में संपन्न !