
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने असम में पशुओं से संबंधित एक कानून में संशोधन कर विधेयक पारित किया है । इस विधेयक के अनुसार पुलिस को अधिकार मिले हैं कि वे संदिग्ध गोतस्करों में घर में प्रवेश कर खोज करने और गोतस्कर द्वारा पिछले ६ वर्षाें में अवैध पशु व्यापार से प्राप्त संपत्ति जप्त कर सकते हैं । इस विधेयक के कारण गोतस्करों के वाहनों की नीलामी की जा सकेगी । हिमंत बिस्व सरमा ने यह बहुत ही साहसिक निर्णय लिया है, ऐसा ही कहना पडेगा । भारत में गोतस्करी की घटनाएं बहुत होती हैं, विशेष रूप से सीमावर्ती राज्य बंगाल और असम से बांग्लादेश में गायों की तस्करी की जाती है । भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित बाड पार कर गायों को सीमा पार भेजने के लिए एक विशिष्ट प्रकार के झूले तैयार किए गए हैं । उसी प्रकार से नदियों और नालों में गायों को ढकेलकर उन्हें सीमापार भेजा जाता है । असम के सीमावर्ती क्षेत्रों में कई बार गोतस्कर और सीमावर्ती क्षेत्र के सैनिकों में मुठभेड होती है । १ दिसंबर २०१९ से ३० नवंबर २०२० तक एक वर्ष की अवधि में सीमा सुरक्षा बल के द्वारा २४ सहस्र ६० गायों को छुडवाया गया है । इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि यहां गोतस्करी की समस्या कितनी भीषण है ।

गाय के संबंध में लिए गए साहसिक निर्णय
कई बार गोरक्षकों और गोतस्करों के मध्य मारपीट की घटनाएं होकर उनमें गोरक्षकों को अपने प्राण भी गंवाने पडे हैं । इसके कारण यह समस्या और गंभीर बन गई है । असम से बंगाल में भी गायों की तस्करी होती है । जुलाई महीने में मुख्यमंत्री सरमा ने विधान किया था, ‘गाय हमारी माता है तथा उसकी तस्करी करनेवालों को नहीं छोडा जाएगा । अब उन्होंने चरण-प्रति-चरण उसकी कार्यवाही आरंभ कर दी है । इससे पूर्व ही अगस्त में पशुओं से संबंधित कानून में संशोधन करनेवाला विधेयक पारित किया गया था । उसके अनुसार हिन्दू, सिख और जैन धर्मियों के प्रार्थनास्थलों से ५ किलोमीटर के परिसर में गोहत्या और गोमांस की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया था । साथ ही उन्होंने इस कानून में संशोधन से पूर्व उन्होंने कहा था, ‘हिन्दू गाय की पूजा करते हैं; इसलिए जहां हिन्दू रहते हैं, उन स्थानों पर गोमांस वर्जित किया जाए ।’
गोमाता के संदर्भ में असम के मुख्यमंत्री सरमा जो कदम उठा रहे हैं, वह उनके द्वारा की जा रही वास्तविक गोरक्षा है । वे केवल यह कहकर नहीं रुके हैं कि ‘गोरक्षा होनी चाहिए और गाय हमारी माता है’, अपितु उसका क्रियान्वयन आरंभ कर उसकी प्रतीति दी है । सरमा मूलतः कांग्रेस से हैं; परंतु कांग्रेस के नेता राहुल गांधी के संदर्भ में घटित एक प्रसंग से उन्हें कांग्रेस का वास्तविक स्वरूप ज्ञात हुआ; परंतु उसके उपरांत उन्होंने भाजपा में प्रवेश कर अच्छे निर्णयों की जो झडी लगाई है, उसे देखते हुए वे पूर्व में कांग्रेसी थे, इस पर कोई विश्वास नहीं करेगा । किसी हिन्दुत्वनिष्ठ मुख्यमंत्री को भी ऐसा निर्णय लेने में कुछ समय लगेगा, वैसे निर्णय उन्होंने कुछ ही महीनों में लिए हैं । २ दिन पूर्व ही भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक वक्तव्य में कहा था, ‘इस देश में वर्तमान स्थिति ऐसी है कि गाय के विषय में बोलना भी अपराध है ।’ देश के प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य से ध्यान में आता है कि उन पर गाय के विषय में बोलने के लिए कितना दबाव है ? ऐसी स्थिति में गाय के विषय में कुछ निर्णय लेकर कानून बनाना कितना कठिन होगा ? महाराष्ट्र में गोवंश हत्या प्रतिबंधक कानून बन चुका है; परंतु उस पर परिणामकारक कार्यवाही न होने के कारण गोवंश की हत्या होती है, गोतस्करी होती है, गोवंश का अवैध परिवहन होता है । निर्णय लेने के साथ ही अथवा कानून को लागू करने के संदर्भ में प्रभावशाली कार्यवाही होने से ऐसे अनाचार रोके जा सकते हैं । मुख्यमंत्री सरमा ने कुछ महीनों पूर्व यह वक्तव्य दिया था कि ‘बलात्कार करनेवाला आरोपी यदि पुलिस के चंगुल से भाग जाता है, तो पुलिस को गोलीबारी करनी ही पडेगी । इससे उन्होंने अपराधों पर लगाम लगाने के लिए दाम, दंड और भेद की नीति ही लागू पडती है, इसे रेखांकित किया है ।

मदरसे बंद
इससे पूर्व सरमा ने असम के ७०० मदरसे बंद किए हैं तथा शेष मदरसों का रूपांतरण चिकित्सकीय महाविद्यालयों और चिकित्सालयों में करने की बात कही है । इस विषय में बोलते हुए उन्होंने यह वक्तव्य दिया कि ‘मुसलमान समुदाय मुझे चुनाव में मतदान नहीं करेगा और मैं उनके पास मत मांगने के लिए जाऊंगा भी नहीं; परंतु जब इन शिक्षा संस्थानों से मुसलमान युवक डॉक्टर और अभियंता बनकर बाहर निकलेंगे, तब वे समझेंगे कि मेरा निर्णय कितना उचित था । इससे उनकी तत्त्वनिष्ठा की भी प्रतीति हुई । कुछ दिन पूर्व इस्लाम त्याग कर हिन्दू धर्म अपनानेवाले जितेंद्र नारायण सिंह त्यागी (पूर्व के वसीम रिजवी) ने ‘मदरसों में आतंकी तैयार होते हैं’, ऐसा वक्तव्य देकर खलबली मचाई थी । उनकी दृष्टि में ‘मदरसों से शिक्षा लेनेवाले आतंकी गतिविधियों में संलिप्त होते हैं और वे देश से एकनिष्ठ नहीं रहते; इसलिए उन्होंने मांग की थी कि मदरसे बंद किए जाएं और वहां दी जानेवाली शिक्षा में विज्ञान और गणित जैसे विषयों का समावेश किया जाए । मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा उस मांग को पूरा करने की हिम्मत दिखा रहे हैं ।
असम के विपक्षी दलों और अन्य लोगों ने सरमा के इन निर्णयों का विरोध किया; परंतु वे विरोध की चिंता नहीं करते । वे स्वयं द्वारा लिए गए निर्णयों का सैद्धांतिक दृष्टि से समर्थन कर सकते हैं और उनके निर्णय कैसे सही हैं ?, इस विषय में दूरर्दशन वाहिनियों पर अपना पक्ष रख सकते हैं । सरमा ने यह दिखा दिया है कि प्रखर राष्ट्र एवं धर्मप्रेम, देश के लिए कुछ करने की लालसा, तत्त्वनिष्ठा, निर्णय लेने का साहस और मजबूत वैचारिक दृष्टिकोण हो, तो कोई भी महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया जा सकता है । अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री उनका आदर्श सामने रखें, तो हिन्दुओं और भारत की अनेक समस्याओं का समाधान होकर हिन्दू राष्ट्र को मूर्त स्वरूप प्राप्त होगा !
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