सात्त्विक अलंकारोंकी श्रेष्ठता संबंधी विवेचनसहित !

अलंकार हिन्दू संस्कृति की अनमोल धरोहर है । हिन्दू संस्कृति पर पश्चिमी संस्कृति का रंग चढा । फैशन के नाम पर आजकल स्त्रियां चूडियां नहीं पहनतीं एवं कुमकुम के स्थान पर बिंदी लगाती हैं । कुछ स्त्रियों को अलंकार पहनना पिछडापन लगता है । इस ग्रंथमाला का मूल उद्देश्य यह अध्यात्मशास्त्रीय दृष्टिकोण देना है कि अलंकार अर्थात दैवी कृपाप्राप्ति में सहायक साधन ।
अलंकारोंका महत्त्व !
- अलंकारों की निर्मिति
- ईश्वरीय गुण अर्थात सूक्ष्म अलंकार
- देवता, मनुष्य और अलंकार
- अलंकारकी धातु एवं उसमें जडे रत्न
स्त्री-पुरुषोंके अलंकार?
- किसे कौनसे अलंकार धारण करने चाहिए?
- व्यक्तित्वानुसार अलंकारों का चयन कैसे करें ?
- अलंकारों की आवश्यकता तथा अनावश्यकता !
- सात्त्विक एवं आसुरी अलंकार
स्त्रियोंके अलंकारोंका अध्यात्मशास्त्रीय विवेचन (लघुग्रन्थ)
- स्त्रियोंके अलंकार धारण करने का महत्त्व व लाभ
- अतिभावुक स्त्रियां कैसे अलंकार धारण करें ?
- विधवाको अलंकार क्यों नहीं पहननेे चाहिए ?
मांगटीकेसे कर्णाभूषणतकके अलंकार?
- केशमें धारण करनेयोग्य अलंकार
- बिंदीकी अपेक्षा कुमकुम लगाना अधिक उचित क्यों ?
- नथ मोतियोंकी क्यों होती है ?
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !
संपादकीय : आर्थिक अनुशासन
हिन्दू जनजागृति समिति के हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान अंतर्गत राष्ट्रीय मार्गदर्शक सद्गुरु डॉ. चारुदत्त पिंगळेजी की मध्य प्रदेश यात्रा !
ज्ञानमूर्ति, निर्गुण तत्त्व की नित्य अनुभूति देनेवाले एवं ब्रह्मानंद में निमग्न रहनेवाले सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी
सच्चिदानंद परब्रह्म गुरुदेवजी द्वारा ३० वर्ष पूर्व दिए गए आशीर्वचन को साधक क्षण-क्षण अनुभव कर रहे हैं !
सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी एकमेवाद्वितीय एवं अवतारी पुरुष क्यों हैं ?