
‘ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष सप्तमी को परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का जन्मदिवस है । इस उपलक्ष्य में उनके लिए उपहारस्वरूप निम्नांकित लेख दे रहे हैं ।
१. ‘ॐ’ का अर्थ
‘ॐ’ के एक अक्षर से, ‘ब्रह्म’ के दो अक्षरों से और ‘प्रणव’ के ३ अक्षरों से एक ही ‘ब्रह्म’ बताया जाता है ।
२. ‘ॐ’कार की मात्राएं
सामान्यरूप से ‘अ’ ‘उ’ ‘म’, इनमें प्रत्येक मात्रा और चंद्रलेखा पर बिंदु की अर्ध मात्रा; इस प्रकार ओंकार की साढे तीन मात्राएं मानी जाती हैं ।
३. मतांतर
अ. ‘ॐ’ लिखने की २ पद्धतियां हैं । एक ‘ॐ’ और दूसरी उकार दर्शानेवाली रेखा का अग्र नीचे की ओर नहीं, अपितु ऊपर की ओर मुडा हुआ होना ।


आ. सामान्यतः ‘ॐ’कार साढे तीन मात्राओं का माना जाता है । प्रश्नोपनिषद़्, मुण्डकोपनिषद़् एवं माण्डूक्योपनिषद़् उपनिषदों में ‘ॐ’कार का विषय बताया जाता है तथा ‘ॐ’कार ३ मात्राओं का बताया गया है ।
इ. एक मत के अनुसार ‘ॐ’ अनाहत नाद है, तो एक मत के अनुसार ‘सोऽहं’ अनाहत नाद है और एक मत के अनुसार ब्रह्म में कोई भी अनाहत नाद नहीं होता ।
४. ब्रह्माजी के चरणों के रूप में ‘ॐ’कार की मात्राओं का प्रतिपादन
माण्डूक्योपनिषद में ब्रह्म को ४ चरणों का बताया गया है तथा उसकी ३ मात्राएं और चौथे को मात्रा विरहित पाद बताया गया है । ब्रह्मा के ये ४ चरण ४ विभाग नहीं, अपितु केवल अवस्थाओं के प्रतीक हैं । माण्डूक्योपनिषद में प्रत्येक चरण को विस्तार के साथ बताते समय उसमें ऐसे अनेक शब्द आए हैं, जिनका अर्थ समझना कठिन लग सकता है । केवल शब्दार्थ बताने पर भी वे समझ में आएंगे, ऐसा नहीं है । इसके लिए प्रत्येक शब्द को विस्तार से समझना होगा । (टिप्पणी १) इस लेख में ऐसे सभी शब्द होते हुए भी ‘ॐ’कार और ‘ॐ’कार की मात्राओं को संक्षेप में स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है ।
५. ‘ॐ’कार की मात्राओं का आध्यात्मिक प्रगति के चरणों का सूचक होना
५ अ. अवस्थालय
५ अ १. जाग्रत : बाह्य भौतिक एवं लौकिक बातों में संलिप्त अवस्था को ‘जाग्रत’ अवस्था एवं ‘अ’ मात्रा कहा गया है ।
५ अ २. स्वप्न : ‘स्थूल में निहित बाह्य व्यवहार रुक जाना; परंतु उनके विचार मन में आते रहने’ की अवस्था को ‘स्वप्नावस्था’ कहा गया है । उसका प्रतीक ‘उ’ मात्रा है । स्वप्न में भी प्रत्यक्ष स्थूल की घटनाएं घटित न होकर भी वे दिखाई देती हैं; इसलिए इसके समान अवस्था स्वप्नावस्था है । प्रत्यक्ष व्यवहार रुककर इस अवस्था में पहुंचने का अर्थ होता है ‘अ’ मात्रा का लय ‘उ’ मात्रा में हुआ ।
५ अ ३. सुषुप्ति : किसी विचार में मन के मग्न रहने से, चिंतन के विषय में रत रहने से देहभान और अन्य विषयों का मनोभान नहीं रहता । स्थूल क्रिया अथवा भोग नहीं होते और मन में भी क्रियाओं अथवा भोगों के विचार नहीं होते । गाढी निद्रा अर्थात सुषुप्ति में भी देहभान और मनोभान नहीं होता; इसलिए उसे सुषुप्ति-अवस्था कहा गया है । इस अवस्था को ‘म’ मात्रा कहते हैं । ‘उ’ मात्रा का लय ‘म’ मात्रा में हुआ ।
५ अ ४. तुर्यावस्था : भौतिक घटनाओं से सुख-दुख नहीं होता । उनकी ओर तटस्थता से देखना संभव होता है और आनंद भी होता है । यह ‘म’कार का अर्धमात्रा में लय हुआ ।
६. कुछ उपासनाएं एवं ‘ॐ’ कार की मात्रा
कुछ लोग अलग-अलग उपासनाओं में ‘ॐ’कार की मात्राओं को विशिष्ट स्थिति के प्रतीक बताते हैं । ऐसी उपासनाओं का आगे संक्षेप में उल्लेख किया गया है ।
६ अ. दृष्टि और वर्ण (रंग) पर आधारित : नासिकाग्र (भूचरी मुद्रा) या भ्रू (खेचरी मुद्रा) में दृष्टि दृष्टियोग (दृष्टि एकाग्र करना)
१. आरंभ में प्रकृति का अंधकार दिखाई देता है । आगे जाकर स्थूल देह से संबद्ध पीला प्रकाश दिखाई देता है । इस स्थिति को ‘अ’ मात्रा कहा गया है ।
२. उसके उपरांत स्थूल का लय सूक्ष्म देह में होता है और तब सूक्ष्म देह से संबद्ध आरक्त वर्ण दिखाई देता है । इसका अर्थ ‘अ’ मात्रा का लय ‘उ’ मात्रा में हुआ ।
३. आगे जाकर सूक्ष्म देह का लय ‘कारण’ देह में होता है । तब श्वेत वर्ण दिखाई देता है । इसका अर्थ ‘उ’ मात्रा का लय ‘म’ मात्रा में हुआ ।
४. अंत में कारणदेह का लय महाकारणदेह में होता है, तब नील बिंदु के दर्शन होते हैं । इसे ‘म’ मात्रा का लय अर्धमात्रा में हुआ’ कहते हैं । नील बिंदु के निरंतर ध्यान से प्रकाशरूप अंगुष्ठमात्र साक्षी प्रत्यगात्मा (साक्षीभाव से युक्त तथा अंगूठे के आकारवाली अंतरात्मा) के दर्शन होते हैं । इसे ‘तुरीय अवस्था’ कहते हैं ।
६ आ. वाणीलय
६ आ १. वैखरी : शब्दों के उच्चारण के सहित जो जप होता है, वह वैखरी वाणी में होता है । इसे ‘अ’ मात्रा माना गया है ।
६ आ २. मध्यमा : उन शब्दों को मन ही मन बोलना (मतांतर – मुंह में ही बोलना) मध्यमा वाणी है । यहां ‘अ’ मात्रा का लय ‘उ’ मात्रा में हुआ ।
६ आ ३. पश्यन्ती : उस जप के शब्दों का जो अर्थ होता है, उस अर्थ का केवल आंकलन होना पश्यन्ती वाणी है । यहां ‘उ’ मात्रा का लय ‘म’ मात्रा में हुआ ।
६ आ ४. परा : केवल भान की स्फुरित परावाणी है । ‘म’ मात्रा का लय अर्धमात्रा में हुआ ।
६ इ. ध्यान-उपासना
१. सगुण मूर्ति को आंखों से देखकर उस पर ध्यान लगाना ‘अ’ मात्रा है ।
२. वृत्ति को अंतर्मुख कर मन में ध्यानमूर्ति लाना, ‘अ’ मात्रा का ‘उ’ मात्रा में लय है ।
३. चित्त की चंचलता दूर होकर वृत्ति शांत होना ‘उ’ मात्रा का लय ‘म’ मात्रा में ।
४. आगे स्थित मूर्ति में चैतन्य मानकर चैतन्यरूपी ध्यान-मूर्ति में मन के स्थिर होने का अर्थ ‘म’ मात्रा का लय अर्धमात्रा में हुआ । इस अवस्था में विशिष्ट आनंद का अनुभव होता है ।
६ ई. वृत्ति निरोध एवं उपासना
१. वृत्ति, विचार आते-जाते रहते हैं । ‘वे अनित्य हैं’, इसे जानकर आत्मा से उसका अनुसंधान रखना । वृत्तियों में निहित ‘मैं’, ‘मेरा’ इत्यादि विचार ‘अ’ मात्रा ।
२. एक बार ‘मैं’ पन की वृत्तियों को पार किया, तो ‘अ’ मात्रा का लय ‘उ’ मात्रा में; किंतु मन में तब भी कर्तृत्व और भोक्तृत्व की भावना बनी रहती है ।
३. ‘मैं कर्ता’ ‘मैं भोक्ता’ अहं दूर हुआ, तो ‘उ’ मात्रा का लय ‘म’ मात्रा में ।
४. उसके उपरांत स्वरूप का ज्ञान होकर ‘मैं ब्रह्म ही हूं’, यह भानरूपी वृत्ति और साक्षीभाव जब आता है, तब ‘म’ मात्रा का लय अर्ध मात्रा में हुआ ।
७. भगवद़्गीता
अ. भगवद़्गीता के अध्याय ८, श्लोक १२ और १३ में ‘ॐ’कार का संक्षिप्त उल्लेख है । उसमें भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है, ‘सभी इंद्रियों का संयम कर, मन को हृदय में निरुद्ध कर (मन में उठनेवाले विचारों को रोककर) व प्राणों को मस्तक में स्थापित कर योगधारणा में स्थिर हों । उसके पश्चात एकाक्षरी ‘ॐ’ ब्रह्म का उच्चारण करते हुए तथा मेरा (‘ॐ’के अर्थरूपी ईश्वर का) स्मरण करते हुए जो देहत्याग करता है, वह परमगति को पाता है ।
(टिप्पणी : प्रत्येक व्यक्ति इसे नहीं कर पाएगा । जिन्हें ध्यानधारणा आती है, वे ही इसे कर सकेंगे । – लेखक)
आ. भगवद़्गीता के अध्याय १७, श्लोक २३ एवं २४ में ‘ॐ’ के संबंध में बताया गया है । भगवान बताते हैं – ‘ॐ, तत्, सत्’ इन ३ प्रकारों से ब्रह्मा का उल्लेख है । उससे पहले ब्राह्मण, वेद और यज्ञ की रचना की गई; इसलिए यज्ञ, दान एवं तप इन क्रियाओं का आरंभ ‘ॐ’ के उच्चारण से किया जाता है । आ. भगवद़्गीता अध्याय १७, श्लोक २३,२४ मेें ‘ॐ’ के बारे में बताया गया है । भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं – ‘ॐ, तत्, सत्’ ऐसे तीन प्रकार से ब्रह्म का उल्लेख है । उससे पूर्व ब्राह्मण, वेद एवं यज्ञकी रचना की गई; इसलिए यज्ञ, दान एवं तप की क्रियाओं का आरंभ ‘ॐ’ के उच्चारण से किया जाता है ।
८. समालोचन
अ. जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में तत्त्व का अज्ञान होता है अर्थात तत्त्व की जानकारी नहीं होती है ।
आ. सूत्र ‘५ अ ४’ एवं ‘६ इ’ में निहित सूत्र ४ में बताया गया आनंद ब्रह्मानंद नहीं होता । गृहस्थी और विश्व में फंस जाने का जो दुख होता है, उस दुख के अभाव का आनंद होता है ।
इ. ‘ॐ’ की ‘अ’, ‘उ’, ‘म’ मात्राएं भौतिक अवस्था ही दर्शाती हैं; परंतु उन्हें ‘ॐ’ से निर्देशित ब्रह्म चरण मानना अनुचित नहीं है । छान्दोग्योपनिषद में (अध्याय ३, खण्ड १४, मंत्र १) में कहा गया है कि ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति –।’
अर्थ : यह समस्त विश्व सचमुच ब्रह्म ही है । उसी से उत्पन्न होनेवाला और उसमें ही विलय होनेवाला है ।
भगवद़्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण बताते हैं, ‘वासुदेवः सर्वं’ (अध्याय ७, श्लोक १९)
अर्थ : सबकुछ वासुदेव ही (ईश्वर ही) है ।
तात्पर्य यह है कि पहले चरण को पार करते हुए अंतिम चरण तक पहुंचना है ।
ई. अंतिम की अर्ध मात्रा अथवा ब्रह्म का मात्रा विरहित चौथा चरण भी कोई सर्वोच्च अवस्था नहीं है; परंतु चौथी तुरियावस्था में स्थिर मनुष्य मृत्यु के उपरांत मुक्त ही होता है ।
उ. उक्त विवेचन से ‘ॐ’कार पर आधारित साधना को अपनी क्षमता से परे समझने का कारण नहीं है । भले ही हम किसी मार्ग से साधना क्यों न करें, और ‘ॐ’ का कभी उच्चारण भी नहीं करते होंगे, तब भी प्रगतिशील साधक अगले चरणों से आगे बढता रहता है ।
१. आरंभ में भौतिक और लौकिक बातों में रुचि होना (‘अ’ मात्रा)
२. भोग लेना छोड देना; परंतु मन में विषयभोगों का आकर्षण होना (‘उ’ मात्रा)
३. भोगों में आकर्षण शेष न रहने से संतुष्ट वृत्ति; परंतु ईश्वर अथवा ब्रह्म के स्वरूप का ज्ञान न होना (‘म’ मात्रा)
४. ज्ञान होकर सभी घटनाओं की ओर तटस्थता के साथ देखना संभव होना अर्थात साक्षीभाव आना (मात्रा रहित चौथा पग । मतांतर – चंद्रलेखा पर बिंदु, यह अर्धमात्रा)
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टिप्पणी १ – कठिन लगें, ये ऐसे कुछ शब्द हैं । जैसे जागरितस्थान, बहिष्प्रज्ञ, अन्तःप्रज्ञ, स्थूलभुक्, वैश्वानर, स्वप्नस्थान, प्रविविक्तभुक्, तैजस, सुषुप्त, प्रज्ञानघन, प्राज्ञ, ईशान, तुर्य, अव्यपदेश्य, एकात्मप्रत्ययसार इत्यादि टिप्पणी २ – सूत्र ६ में निहित सूत्र ‘६ अ’ और प्रणवोपासना पर आधारित श्री. म. वैद्य के ग्रंथों पर आधारित हैं ।’ |
– अनंत आठवले (परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के ज्येष्ठ बंधु, ढवळी, फोंडा, गोवा) (७.५.२०२०)
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
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सूक्ष्म : व्यक्ति का स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीव्हा एवं त्वचा यह पंचज्ञानेंद्रिय है । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है । |
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