
१. परात्पर गुरु डॉक्टरजी के हाथ-पैर के अंदरूनी भाग तथा जीभ
का गुलाबी होना, उनमें व्याप्त ईश्वर की सर्वव्यापक प्रीति के रंग का चमत्कार
‘परात्पर गुरु डॉक्टरजी की त्वचा, नख एवं केश जिस प्रकार पीले हो रहे हैं, उसके साथ ही उनकी आंखों का अंदरूनी भाग, हाथ-पैर के अंदरूनी भाग, तथा जीभ और होंठ भी गुलाबी हो रहे हैं । यह परात्पर गुरु डॉक्टरजी में व्याप्त ईश्वर की सर्वव्यापक प्रीति के रंग का आविष्कार है ।
२. उंगलियों की गांठों का अग्रभाग अधिक गुलाबी होना
परात्पर गुरु डॉक्टरजी के हाथ की उंगलियों की गांठों के अग्रभाग अधिक गुलाबी दिखाई देते हैं; क्योंकि उंगलियों के अग्रभागों का कार्य में अधिक संवेदनशील होने से इन भागों से प्रीति का दर्शक गुलाबी रंग अधिक मात्रा में प्रक्षेपित होता दिखाई देता है ।
३. बात करते समय परात्पर गुरु डॉक्टरजी के होंठ एवं जिह्वा का रंग अधिक गुलाबी होता हुआ प्रतीत होना
परात्पर गुरु डॉक्टरजी जब बात करते हैं, तब उनके होेंठों का, उनके मुख के अंदर के भाग का, साथ ही जिह्वा का रंग अधिक गुलाबी होता हुआ दिखाई देता है । उनकी वाणी से समष्टि के कल्याण हेतु प्रक्षेपित होनेवाली प्रीतिदर्शक तरंगों के स्पर्श से, उनके मुख के भीतरी भाग में निहित गुलाबी रंग जागृत होने का ही यह लक्षण है ।’
– श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.



विविध बुद्धिअगम्य परिवर्तनों के संदर्भ में परात्पर गुरु डॉक्टरजी का विश्लेषण‘विभिन्न अच्छी एवं बुरी अनुभूतियों के संदर्भ में निहित वास्तविकता ज्ञानेश्वरी में बताए अनुसार निम्न प्रकार से है – यह मेरे कारण ही हुआ । परंतु मैंने नहीं किया । – ज्ञानेश्वरी, अध्याय ४, ओवी ८१ इसमें ‘मेरे कारण हुआ’ का अर्थ मेरे अस्तित्व के कारण हुआ । इसमें ‘मैं’ पन परमेश्वर का है तथा ‘मैंने’ नहीं किया का अर्थ ‘कर्तापन मेरे पास नहीं है । इसका एक सुंदर उदाहरण है सूर्य । सूर्य उदित होता है, तब सभी जग जाते हैं, फूल खिलते हैं इत्यादि । यह केवल सूर्य के अस्तित्व से होता है । सूर्य किसी से जगने के लिए नहीं कहता अथवा फूलों को खिलने के लिए भी नहीं कहता !’ – (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले |
परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के उपयोग में निहित श्वेत कुर्ते का रंग परिवर्तित होकर कुछ स्थानों पर गुलाबी होना
३१.१२.२००९ को परात्पर गुरु डॉक्टरजी के उपयोग में निहित श्वेत कुर्ते की एक बांह, पेट और छाती के स्थान पर गुलाबी रंग दिखाई दिया । हमने यह देखा है कि अनेक दिनों तक उपयोग करने पर वस्त्रों का रंग फीका पड जाता है; परंतु श्वेत वस्त्रों का मूल रंग हटकर वहां दूसरा कोई रंग चढा हो, ऐसा किसी ने नहीं देखा है । रंग परिवर्तन का अर्थ दैवीतत्त्व प्रकट होना और रंग का प्रकाशमय होकर चमकना, समष्टि कार्य हेतु इस दैवीतत्त्व के कार्यरत होने का लक्षण है । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी जैसे उच्च कोटि के संतों का कार्य समष्टि के कल्याण का होने से उनकी देह तथा उनके उपयोग में निहित वस्तुओं के माध्यम से समष्टि के लिए आवश्यक तत्त्व कार्यरत होता है ।
साधकों के, साथ ही परात्पर गुरु डॉक्टरजी के वस्त्रों का
रंग गुलाबी होने की प्रक्रिया में दिखाई दिए कुछ विशेषतापूर्ण सूत्र
१. तीव्र कष्ट से पीडित साधकों के वस्त्रों को प्राप्त गुलाबी रंग, उन वस्त्रों को चैतन्यमय क्षेत्र में रखने पर निकल जाना
तीव्र कष्ट से पीडित साधकों के वस्त्रों पर गुलाबी रंग आना आरंभ होने पर इन वस्त्रों को विभूति लगाकर अथवा उन्हें श्रीकृष्ण के चित्र से बांधकर रखने पर अथवा किसी चैतन्यमय स्थान पर रखने के ८ दिन पश्चात उस गुलाबी रंग में निहित मायावी तत्त्व निकल जाने से धीरे-धीरे यह रंग भी निकलते हुए दिखाई दिया ।
२. कष्ट रहित, साथ ही अच्छी शक्ति के स्पंदनवाले साधकों के वस्त्रों
को चैतन्यमय क्षेत्र में रखने पर उनके वस्त्रों को प्राप्त गुलाबी रंग का बढना
कष्ट रहित, साथ ही अच्छी शक्ति के स्पंदनवाले साधकों के वस्त्रों को गुलाबी रंग आने पर जब इन्हें चैतन्य के सान्निध्य में रखा गया, तब इन वस्त्रों को प्राप्त गुलाबी रंग में वृद्धि होती दिखाई दी ।
३. कष्ट रहित तथा अच्छी शक्ति के स्पंदन रहित साधकों के गुलाबी रंग प्राप्त वस्त्रों को, साथ ही अच्छी
शक्ति के स्पंदन रहित साधकों के वस्त्रों को चैतन्यमय क्षेत्र में रखने पर उनमें अल्पाधिक मात्रा में उतार-चढाव होना
कष्ट रहित; परंतु देह में अच्छी शक्ति न होनेवाले साधकों के वस्त्रों के संबंध में उन्हें यदि चैतन्य के सान्निध्य में रखने पर उन्हें प्राप्त गुलाबी आभा में बिलकुल थोडी मात्रा में उतार-चढाव होते दिखाई दिया ।
४. परात्पर गुरु डॉक्टरजी के वस्त्रों को प्राप्त गुलाबी रंग की विशेषता
अ. ‘इस रंग में चमकीलेपन, साथ ही पारदर्शिता की मात्रा अधिक होती है ।
आ. परात्पर गुरु डॉक्टरजी की देह में परिपूर्ण चैतन्य होने से उनके द्वारा उपयोग किए वस्त्रों को सर्वत्र एक समान गुलाबी रंग आता है ।
इ. इस रंग से दिव्य गंध और ठंडी तरंगों का प्रक्षेपण भी होता है ।’
– श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ, गोवा.
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