
बिहार के पुलिस अधिकारी अश्विनी कुमार बंगाल के दिनाजपुर के एक गांव में एक मोटरसाईकल चोरी के संदर्भ में छापा मारने गए थे । यह गांव बिहार और बंगाल की सीमा से लगा हुआ है । उक्त पुलिस अधिकारी के साथ अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई । जिस गांव के चोर के घर वे छापा मारने गए थे, उसी गांव के स्थानीय नागरिकों ने उन पर पत्थरबाजी कर आक्रमण किया और मृत्यु होने तक उन्हें पीटा । चिकित्सालय ले जाने पर उन्हें मृत घोषित किया गया । इस प्रकरण में फिरोज आलम, अबूजर आलम और साहीनूर खातून, इन ३ लोगों को बंदी बनाया गया है । इससे भीड अथवा स्थानीय लोग कौन थे, यह स्पष्ट होगा । पडोसी राज्य का एक पुलिस अधिकारी कार्यवाही करने आया है, यह ज्ञात होने पर भीड एकत्रित होती है, आक्रमण करते हैं और पुलिस अधिकारी की हत्या कर देते हैं, इस तथ्य के कारण मन में रोष उत्पन्न होता है ।
भीड की राजनीति
मूलत: भीड एकत्रित हुई कैसे ? बंदियों के नाम से भीड धर्मांधों की थी, यह ज्ञात होता है । धर्मांधों और पुलिस प्रशासन का सदा बैर ही रहा है ! उनके अनुसार पुलिस अधिकारी और वह भी हिन्दू अर्थात काफीर ! इसलिए वे एक व्यवस्था पर आक्रमण कर रहे हैं, इसका बोध उन्हें कौन कराएगा ? विशेष यह कि अश्विनी कुमार ने संबंधित गांव में कार्यवाही करने के लिए जाने के पूर्व बंगाल की स्थानीय पुलिस से सहायता मांगी थी; परंतु उन्हें वह नहीं दी गई । मन में रोष उत्पन्न करनेवाला यह दूसरा तथ्य ! बंगाल पुलिस की सहायता मिली नहीं, इसकी तुलना में पुलिस ने जानबूझकर सहायता नहीं की, ऐसा कहना अधिक तर्कसंगत होगा । दूसरे राज्य से जब कोई पुलिस अन्य राज्य में कार्यवाही के लिए जाती है, तब स्थानीय पुलिस का होना आवश्यक होता है । जो पुलिसकर्मी साथ में नहीं गए, उन पर भी कठोर कार्यवाही होना आवश्यक है । बंगाल की प्रत्येक घटना के लिए ममता (बानो) उत्तरदायी होती है, ऐसा कहा जाता है । इस प्रकरण में पुलिस की सहायता न मिलने के लिए भी वे उत्तरदायी हो सकती हैं । उन्होंने पुलिस को ऐसा कोई आदेश दिया है क्या ?, इसकी जांच होना आवश्यक है । बिहार अर्थात नितीश कुमार की भाजपा सरकार से कोई सरकारी अधिकारी आता है अर्थात भाजपा का ही व्यक्ति आ रहा है, तृणमूलवासी की ऐसी सर्वसामान्य भावना निर्माण की जा सकती है । केवल बिहार ही नहीं, अपितु भाजपा शासित प्रत्येक राज्य का सरकारी कर्मचारी ममता दीदी के अनुसार भाजपा का ही व्यक्ति होगा, इसमें संदेह नहीं ।
बंगाल की हिंसा
बंगाल में बाहर से पुलिसवाला आया और उसकी हत्या हुई, यह एक भयानक घटना है । २ – ३ वर्ष पूर्व धर्मांधों द्वारा किए जा रहे आक्रमणों के कारण भयभीत होकर रोते हुए स्वयं का दुखडा बताते हुए बंगाली पुलिस का एक वीडियो सामाजिक माध्यमों में प्रसारित हुआ था । पुलिस की यह अवस्था है, तब सामान्य की क्या स्थिति होगी ?, इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते । कुछ दिनों पूर्व प्रसारित एक वीडियो में एक चाय की गुमटी पर भाजपा का झंडा लगा हुए देखकर गुमटी के पास से जा रही भीड ने झंडा निकालकर फेंक दिया, वहां तोडफोड की और गुमटीवाले के साथ मारपीट की, ऐसे दृश्य थे । ‘जी न्यूज’ की एक गाडी जिसमें महिला पत्रकार और छायाचित्रकार थे, एक गांव से जा रही थी, तब भीड ने ईंट-पत्थर मारकर गाडी के कांच फोड डाले, गाडी को घेरा और अंदर बैठे सभी को धमकाया । यह क्रोधित भीड सभी को मार डालेगी, गाडी के पत्रकार और छायाचित्रकार को ऐसा लग रहा था ।
बंगाल की नई पहचान
बंगाल में ममता दीदी ने स्वयं के सत्ताकाल में क्या बीज बोए हैं ?, यह ध्यान में आता है । बंगाल छोडकर अथवा बाहर से जो आते हैं, वे सभी विदेशी अथवा पाकिस्तानी हैं ? बंगाल के कुछ स्थानों की भीड इस प्रकार उग्र हो रही है । हिंसक होना और हिंसा करना, यह अब ग्रामीण बंगाल की नई पहचान बन रही है, यदि ऐसा कहें तो क्या गलत है ? मूलत: बंगाल क्रांतिकारियों का राज्य है ! भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महान योगदान देनेवाले एक से बढकर एक क्रांतिकारी यहां जन्मे । आज उस बंगाल की अवस्था ‘दंगाखोरों का प्रदेश’ बनाने के लिए ममता दीदी ही उत्तरदायी हैं ।
बंगाल के आईपीएस श्रेणी के एक पुलिस अधिकारी ने स्वयं की व्यथा हृदयविदारक शब्दों में प्रस्तुत कर स्वयं के कटु अनुभवों की कहानी लिखकर अपनी जीवनयात्रा समाप्त कर ली । उन्होंने स्वयं का कर्तव्य भली-भांति संपन्न करने का प्रयास किया, इसलिए उनकी पदोन्नति रोकी गई । उनके निवास पर अनेक समस्याएं निर्माण की गईं । व्यवस्था की त्रुटियों के विरुद्ध आवाज उठाने के कारण अनेक बार उनका स्थानांतरण (तबादला) किया गया, उन्हें न्यायालय के चक्कर लगाने पडे, अंतत: इस राज्य में न्याय नहीं मिलेगा, इस निष्कर्ष पर पहुंचकर उन्होंने आत्महत्या कर ली । उनकी आत्महत्या हेतु ममता दीदी ही उत्तरदायी थी ।
वर्तमान में बंगाल की पहचान आक्रमण करो, तोडफोड करो, मारपीट करो, बम बनाकर विस्फोट करो, हिन्दू हो अथवा पुलिस, उनकी पिटाई करो, भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या, देवताओं का अनादर करो, घुसपैठियों को आश्रय दो, गोतस्करी करो, ऐसी स्थिति विकसित हो रही है । पहले बंगाल में जहां-तहां अनेक लोगों के पास बम मिलते थे । कुछ बम फटते थे तब पता चलता था कि यहां कहीं बम है । देश के एक राज्य में ऐसी स्थिति हो, तो वहां के नागरिक कानून-व्यवस्था कभी अनुभव कर पाएंगे क्या ? एक पुलिस अधिकारी की हत्या, इससे अधिक बुरी स्थिति क्या होगी ? केंद्र सरकार अब और किस विपदा की प्रतीक्षा कर रही है ? कुछ समय पूर्व भाजपा के जनप्रतिनिधि ने ‘बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करें’, ऐसा कहा था । उनकी मांग और जनभावना ध्यान में रखकर, बंगाल में और अधिक अराजकता निर्माण न हो, इसलिए शीघ्रातिशीघ्र राष्ट्रपति शासन लागू करें, ऐसी अपेक्षा है !
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