कुरान में आयतें और सत्य-असत्य की न्यायालयीन लडाई !

न्याय क्षेत्र के समाचारों का विश्‍लेषण

               (पू.) अधिवक्ता सुरेश कुलकर्णी

१. शिया वक्फ बोर्ड के भूतपूर्व अध्यक्ष वसीम रिजवी द्वारा कुरान
की २६ आयतें निकालने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका प्रविष्ट

     ‘शिया वक्फ बोर्ड के भूतपूर्व अध्यक्ष वसीम रिजवी ने कुरान की २६ आयतें निकालने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका प्रविष्ट की है । रिजवी के कथनानुसार अन्य धर्मियों के विरुद्ध आतंकवाद को प्रोत्साहन देनेवाली ये २६ आयतें हटाना आवश्यक है । ये वचन अथवा आयतें अल्लाह की नहीं हैं । प्रेषित मुहम्मद के उपरांत क्रमशः गद्दी पर बैठे हजरत अबू बकर, हजरत उमर और हजरत उस्मान के काल में ये आयतें कुरान में डाल दी गई हैं और उसी काल में कुरान प्रथम बार पुस्तक स्वरूप में आई । सत्ता के लिए धर्म के नाम पर हुए युद्ध में सामान्य मुसलमानों का उपयोग किया जा सके; इसलिए अल्लाह के नाम पर ये २६ आयतें खलीफाआें के काल में कुरान में घुसेडी गईं । कुरान की कुछ आयतों का मदरसों में अध्ययन करने के उपरांत बच्चों में कट्टरता बढने लगती है और वे आतंकवाद की ओर अल्लाह के कार्य के रूप में देखने लगते हैं, ऐसी भूमिका रिजवी ने सर्वोच्च न्यायालय में प्रविष्ट की याचिका द्वारा प्रस्तुत की है । यह याचिका सर्वोच्च न्यायालय में प्रलंबित है ।

२. वसीम रिजवी के विरोध में मुसलमानों के शिया और सुन्नी पंथों द्वारा एकत्र आकर आंदोलन करना

     वसीम रिजवी शिया वक्फ बोर्ड के भूतपूर्व अध्यक्ष होने से राजनीति में सक्रीय हैं । इससे पूर्व भी ‘मदरसों को ताले लगाओ’, ऐसे वक्तव्य के कारण वे विवाद में घिरे थे । रिजवी के याचिका प्रविष्ट करने के उपरांत मुसलमानों में रोष की लहर दौड गई । शिया और सुन्नी में मतभेद रहता है; परंतु वे भी एकत्र आकर रिजवी के विरोध में देशभर निवेदन दे रहे हैं, इसके साथ ही उनके बंदी की मांग भी की जा रही है । ‘शिया ने हैदर-ए कर्रार वेल्फेअर एसोसिएशन’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हसनैन जाफरी डंपी ने रिजवी का शिरच्छेद कर उनका सिर लानेवाले को २० सहस्र रुपए पारितोषिक देने की घोषणा की है । उन्होंने रिजवी का बहिष्कार करने का आवाहन किया है । जो उनसे संपर्क रखेगा, उसका भी बहिष्कार किया जाएगा, ऐसी चेतावनी दी जा रही है ।

३. रिजवी की याचिका को मुसलमानों का तीव्र विरोध !

अ. मुसलमानों का कहना है कि कुरान में प्रत्यक्ष अल्लाह का मार्गदर्शन होने से उसमें कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता । उत्तर प्रदेश की योगी सरकार रिजवी को तुरंत बंदी बनाए, अन्यथा ऐसा समझा जाएगा कि योगी सरकार उनका समर्थन कर रही है ।’

आ. मुसलमानों द्वारा रिजवी के पुतले को विविध स्थानों पर दहन किया जा रहा है । इस पृष्ठभूमि पर लक्ष्मणपुरी (लखनऊ) में उनके कश्मीरी भाग के निवासस्थान पर पुलिस का कडा बंदोबस्त रखा गया है ।

इ. रिजवी की याचिका के विरोध में भाजपा के कश्मीरी मुसलमान गुट ने प्रदर्शन किए । उन्होंने मांग करते हुए कहा कि इस याचिका के कारण करोडों मुसलमानों की भावनाएं आहत हुई हैं । इसलिए उस पर बंदी लगाएं ।

ई. अर्कोट के राजकुमार नवाब मुहम्मद अब्दुल अली बोले, ‘न्यायालय धार्मिक पुस्तकों के विषय में निर्णय नहीं दे सकती । इसलिए वे कोई भी आयतें निकालने के विषय में निर्णय नहीं दे सकते ।’

४. शबरीमाला प्रकरण में हिन्दुआें को चतुराई सिखानेवालेे आधुनिकतावादी अब चुप क्यों ?

     भारत में कानून का राज्य होते हुए इस प्रकार का फतवा कैसे निकाला जाता है ? सदा सर्वकाल सर्वधर्म समभाववाले और भारतीय राज्य संविधान का जप करनेवाले लोग अब शांत कैसे हैं ? १३० करोड की जनता भारतीय न्यायव्यवस्था पर विश्‍वास दर्शाती है । फिर केवल याचिका प्रविष्ट हुई, तो विरोध करने का क्या कारण है ? सदासर्वदा वैचारिक स्वतंत्रता का राग अलापनेवाले लोग इस पर कुछ बोलना क्यों टालते हैं ?
वसीम रिजवी द्वारा प्रविष्ट की हुई याचिका से ऐसे ध्यान में आता है कि शबरीमाला के मंदिर में १० से ५० आयु वर्ग की महिलाआें को प्रवेश दें; इसलिए याचिका होती है । उसमें न्यायालय आदेश देता है । यहां केवल याचिका प्रविष्ट होने पर धर्मांधों का क्रोध चरमसीमा पर पहुंच गया । ऐसे समय पर हिन्दुआें के श्री महालक्ष्मी मंदिर के गर्भगृह में अथवा शनिशिंगणापुर के चबूतरे पर महिलाआें को प्रवेश मिले, इसके लिए आग्रही तृप्ति देसाई धर्मांधों को कुछ समझाएंगी ?

५. कुरान की आयतों के संदर्भ में ३६ वर्ष पूर्व प्रसिद्ध चंदनमल चोप्रा प्रकरण

अ. इस संदर्भ में ३६ वर्ष पूर्व कोलकाता उच्च न्यायालय में प्रविष्ट हुई याचिका का स्मरण होता है । वर्ष १९८५ में चंदनमल चोप्रा और शीतल सिंह की ‘कुरान’ नामक पुस्तक पर बंदी डालें और उसकी प्रसिद्ध हुई प्रतियां जब्त करें’, यह मांग करनेवाली याचिका कोलकाता उच्च न्यायालय में प्रविष्ट की थी । इन याचिकाकर्ताआें के अनुसार राज्य सरकार (क्रिमिनल प्रोसिजर कोड) फौजदारी निगरानी संहिता धारा ९५ के अंतर्गत यह पुस्तक जब्त कर सकते हैं ।

     वे आगे ऐसे भी कहते हैं कि कुरान की आयतों में दो धर्मांधों के बीच धार्मिक सौहार्द अशांत होगा अथवा प्रक्षोभक होगा, ऐसा लेखन है । धारा १५३ अ भारतीय दंड विधानानुसार यह फौजदारी अपराध है, इसके साथ ही धारा २९५ अ भारतीय दंड विधानानुसार अन्य धर्मियों की धार्मिक भावनाएं आहत करना, यह भी फौजदारी अपराध है । इसलिए ऐसी बातों की संभावना होने से संबंधित लेखन पर बंदी लगानी
चाहिए ।

आ. यह याचिका न्यायमूर्ति खस्तगीर के पास सुनवाई के लिए आई । उनके सामने तर्क दिया गया कि आयतें कहती हैं कि मूर्तिपूजा करनेवालों को मार डालो । इस पर न्यायमूर्ति ने राज्य सरकार के मत मांगे । न्यायमूर्ति खस्तगीर ने कुरान पुस्तक पर बंदी डालने के विषय में याचिका सुनी; इसीलिए वरिष्ठ अधिवक्ता अल्हाज सी.एफ. अली ने उन पर टीका की । तदुपरांत ‘न्यायमूर्ति खस्तगीर के न्यायालय का बहिष्कार करें’, ऐसा प्रस्ताव कोलकाता उच्च न्यायालय में वकीली करनेवाले ७० अधिवक्ताआें ने रखा ।

इ. इस याचिका का को मुसलमान संगठनों का बहुत विरोध हुआ । ‘कुरान बचाएं’ यह अभियान कार्यान्वित करने के लिए ‘जमात-ए-इस्लामी’ और कोलकाता स्थित ‘केरला मुस्लिम एसोसिएशन’ की समिति स्थापित हुई ।

ई. इस याचिका का बंगाल में साम्यवादियों की वामपंथी सरकार और कांग्रेस की तत्कालीन केंद्र सरकार ने तीव्र विरोध किया । इतना ही नहीं, अपितु उन्होंने न्यायमूर्ति खस्तगीर पर इतना दबाव डाला कि उन्होंने अपने सामने से यह याचिका ही हटा दी । (Cause List पर से हटा दी) ।

उ. यह रिट याचिका न्यायमूर्ति बिमलचंद्र बसाक के पास सुनवाई के लिए आई । उन्होंने १७.५.१९८५ को याचिका खारिज की । तदुपरांत चंदनमल चोप्रा ने १८.६.१९८५ को पुनर्विचार याचिका प्रविष्ट की । वह भी २१.६.१९८५ इस दिन असम्मत हुई ।

ऊ. तदुपरांत इतिहास विशेषज्ञ सीताराम गोयल और चंदनमल चोप्रा ने ‘द कलकत्ता कुरान पिटीशन इन १९८६’ नामक पु स्तक प्रकाशित की । इस पुस्तक में मुसलमानों का किया जानेवाला अनुनय और मतों के लिए की जानेवाली लाचारी का उल्लेख था । यह पुस्तक छापने के उपरांत ‘हिन्दू रक्षा दल’ के अध्यक्ष इंद्र सेन शर्मा और सचिव राजकुमार आर्य ने आयतें छापीं और उसे ‘वाय रॉइट्स टेक प्लेस इन द कंट्री ?’, (देश में दंगे क्यों होते हैं ?) ऐसा शीर्षक दिया । इसलिए उन दोनों को बंदी बनाया गया था । तदुपरांत मेट्रोपॉलिशन मैजिस्ट्रेट देहली के न्यायाधीश जेड.एस. लोहाट के आदेशानुसार शर्मा और आर्य को मुक्त किया गया ।

     इस पृष्ठभूमि पर वसीम रिजवी को जान से मारने की चेतावनी दी जा रही है । चंदनमल चोप्रा प्रकरण में क्या-क्या हुआ, इस हेतु यह इतिहास है ।’

श्रीकृष्णार्पणमस्तु !’

– (पू.) अधिवक्ता सुरेश कुलकर्णी, संस्थापक सदस्य, हिन्दू विधिज्ञ परिषद एवं अधिवक्ता, मुंबई उच्च न्यायालय. (२१.३.२०२१)