महर्षि अध्‍यात्‍म विश्‍वविद्यालय की ओर से आयोजित कार्यशाला में जिज्ञासुआें के लिए परात्‍पर गुरु डॉ. आठवलेजी का मार्गदर्शन

                       परात्‍पर गुरु डॉ. आठवले

     परात्‍पर गुरु डॉ. आठवलेजी ‘स्‍पिरिच्‍युअल साइन्‍स रिसर्च फाउंडेशन’ संस्‍था के प्रेरणास्रोत हैं । पूरे विश्‍व में अध्‍यात्‍मप्रसार करने हेतु उन्‍होंने ‘महर्षि अध्‍यात्‍म विश्‍वविद्यालय’ की स्‍थापना की है  इस विश्‍वविद्यालय की ओर से भारत के गोवा स्‍थित आध्‍यात्मिक शोध केंद्र में ५ दिनों की आध्‍यात्मिक कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं । इन कार्यशालाआें का उद्देश्‍य ‘जिज्ञासुआें को साधना के प्रायोगिक भाग की जानकारी देकर उनकी साधना को गति प्रदान करना’ है । परात्‍पर गुरु डॉक्‍टरजी द्वारा इन कार्यशालाआें में उपस्‍थित जिज्ञासुआें के लिए किया मार्गदर्शन यहां दे रहे हैं ।   (भाग ४)

१. साधना

१ ई. साधना की अडचनों पर विजय पाएं !

१ ई १. व्‍यवहारिक कर्तव्‍य नामजप करते हुए एवं भावपूर्ण करने पर वे साधना मेंं अडचन नहीं सिद्ध होते !

श्रीमती प्रेमा लूझ हेर्नाडेझ : मुझे ४ बच्‍चे हैं । मुझमें नियोजनकुशलता न होने के कारण मुझे साधना करना कठिन होता है । बैठकर नामजप करने के लिए मुझे समय नहीं मिलता  इसके लिए मुझे क्‍या करना चाहिए ?

परात्‍पर गुरु डॉ. आठवलेजी : बच्‍चों के प्रति आपके कर्तव्‍य हैं । उनकी ओर अनदेखी करना उचित नहीं । आध्‍यात्‍मिक स्‍तर ६० प्रतिशत से अधिक होने पर ईश्‍वर के आंतरिक सान्‍निध्‍य में रहने के कारण हम सर्वत्र साक्षीभाव से देख पाते हैं । तब हमेंं ज्ञात रहता है कि यह सब माया है । केवल ग्रंथपठन अथवा सैद्धांतिक ज्ञान से यह अनुभव करना असंभव है । साधना कर ‘यह संसार एक माया है’, हमारे लिए यह अनुभव करना संभव होता है । तब तक हमें परिवार की चिंता करना आवश्‍यक है, परंतु यह करते समय हमें नामजप की ओर ध्‍यान देना आवश्‍यक है । उसी प्रकार ‘बच्‍चे भगवान के ही रूप हैं’, ऐसा भाव रखकर हमें उनका ध्‍यान रखना चाहिए । इस भाव से उनका ध्‍यान रखना साधना ही है ।

१ ई २. साधना में उन्‍नति कर मन एवं बुद्धि का लय करना जीवन में आए उतार-चढाव पर विजय पाने की गुरुकुंजी है !

श्री. गणपति पुट्टप्‍पण्‍णवर : आश्रम में चैतन्‍य है इसलिए यहां साधना करने में उत्‍साह प्रतीत होता है; परंतु घर पर यह उत्‍साह कैसे बनाए रखें ? आश्रम से अन्‍य स्‍थान पर जाने पर अथवा कभी-कभी भौतिक जीवन में आए तनाव के कारण साधना करने का उत्‍साह टिकता नहीं है ।

परात्‍पर गुरु डॉ. आठवलेजी : साधना में उन्‍नति होने पर वहां सुख-दुख नहीं, अपितु आनंद होता है । अतः सुख-दुख का उतार-चढाव नहीं होता । इसीलिए साधना बढाने की ओर ध्‍यान देना महत्त्वपूर्ण है । क्‍या किसी संत को निराशा आई, ऐसा कहीं सुना है ? निराशा मन को आती है । संतों के मन एवं बुद्धि का लय हो जाने से वे सतत आनंदावस्‍था में रहते हैं । ‘मुझे साधना ही करनी है’ ऐसा दृढ निश्‍चय करें । कुछ दिन गोवा के सनातन आश्रम में आकर रहें एवं साधना के विषय में अगला मार्गदर्शन प्राप्‍त करें ।

आध्‍यात्‍मिक दृष्‍टि से सद़्‍गुरु सिरियाक वाले बाल्‍यावस्‍था में हैं ।

परात्‍पर गुरु डॉ. आठवलेजी : साधना मेंं उन्‍नति होने पर साधक बाल्‍यावस्‍था में जाते हैं । सामान्‍य व्‍यक्‍ति जन्‍म लेता है, बडा होता है एवं वृद्ध हो जाता है । छोटे बच्‍चों में वृद्ध व्‍यक्‍ति समान बुद्धि नहीं होती । आपको सामान्‍य व्‍यक्‍ति समान प्रौढ नहीं होना चाहिए आपको आध्‍यात्‍मिक दृष्‍टि से बडा होना है । (क्रमशः)