
जुलाई २०१९ में श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी के साथ इस पृथ्वी पर स्थित साक्षात भगवान शिव का स्थान माने जानेवाले कैलाश पर्वत और मानसरोवर में जाने का सौभाग्य हम साधकों को प्राप्त हुआ । कैलाश पर्वत और मानसरोवर जाने के संबंध में हम श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी से गत ४ वर्षों से चर्चा कर रहे थे । इस वर्ष वह समय आया । प्रतिवर्ष जून से सितंबर, इस ४ मास में वहां जा सकते हैं । इस पृष्ठभूमि पर प्रस्तुत लेख द्वारा परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की कृपा से हमारी कैलाश मानसरोवर यात्रा का संपूर्ण वृत्तांत यहां दे रहे हैं ।
१. कैलाश पर्वत की महत्ता
अ. कैलाश पर्वत को पृथ्वी का मेरुदंड कहा गया है । कैलाश पर्वत केवल एक सामान्य हिमाच्छादित पर्वत नहीं है, अपितु संपूर्ण पृथ्वी का आधारस्तंभ है । कैलाश से अनेक शोधकर्ताआें ने पत्थर का नमूना लेकर अनुसंधान किया है तथा अपना मत प्रस्तुत करते हुए कहा है कि कैलाश पर्वत हिमालय पर्वत से अधिक प्राचीन है । कैलाश पर्वत की आयु अनेक करोड वर्ष है । हमारे धर्मशास्त्रों में लिखा हुआ है कि कैलाश पर्वत की आयु कोई नहीं बता सकता । संक्षेप में कैलाश पर्वत साक्षात शिव है ।
जिस प्रकार पृथ्वी पर अनेक युग, भगवान के अनेक अवतार, धर्म-अधर्म के युद्ध, अनेक प्रलय एवं अनेक सृष्टिचक्र के सूर्य एवं चंद्र साक्षी हैं, उसी प्रकार कैलाश पर्वत भी साक्षी है ।
आ. जिसका उल्लेख अपने सभी धर्मग्रंथों में भी है । जिसकी महिमा ऋषि-मुनि गाते हैं, ऐसा कैलाश पर्वत भगवान शिव, देवी पार्वती, शिवपुत्र कार्तिकेय एवं विघ्नहर्ता गणेश, तथा नंदी सहित सर्व शिवगण का निवासस्थान है । बाहर से पूर्ण ग्रेनाईट पत्थर का दिखनेवाला यह पर्वत मनुष्य के मन एवं बुद्धि के परे है ।
इ. जिस कैलाश पर्वत का शिखर प्रत्येक क्षण परिवर्तित होता है, उस पर्वत के शिखर तक आज तक कोई मानव नहीं पहुंच पाया है । जिस पर्वत पर सतत ॐ कार नाद सुनाई देता है, उस पर्वत पर आज तक कोई मनुष्य निवास नहीं कर पाया है ।
ई. जलहरी होनेवाले प्रत्यक्ष शिवलिंग स्वरूप कैलाश पर्वत के छोटे-छोटे रूप मनुष्य आज तक साक्षात शिव रूप में मंदिरों में पूजा करते आया है । उपग्रह द्वारा निकाले छायाचित्रों में स्पष्ट दिखाई देता है कि कैलाश पर्वत एक बडी जलहरी में स्थित शिवलिंग है ।
२.श्रीचित्शक्ति (श्रीमती)अंजली गाडगीळजी का कैलाश पर्वत से घनिष्ट संबंध
गत चार वर्षों से हमें श्रीचित्शक्ति (श्रीमती)गाडगीळजी बता रही थीं कि सो जाने पर मुझे सदा दिखाई देता है कि मैं एक छोटी बालिका हूं और कैलाश पर्वत के सामने एक पग पर खडी रहकर शिवजी की तपश्चर्या कर रही हूं । कभी शिवजी के प्रति मेरा भाव जागृत होकर लगता था कि मैं कैलाश की मिट्टी में लोट-पोट हो रही हूं और वह मिट्टी अपने माथे पर लगा रही हूं ।
श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी हमें बीच-बीच में कैलाश के संदर्भ में कुछ संतों से सुनी अथवा ग्रंथ में दी जानकारी बताती थीं, जिससे हम साधकों को कैलाश पर्वत संबंधी विशेष अपनापन लगने लगा । श्रीचित्शक्ति (श्रीमती)अंजली गाडगीळजी के संबंध में उनका नाम शिवांजली है और उन्होंने पूर्वजन्म में शिवजी की उपासना की है, ऐसा उल्लेख इससे पहले एक नाडीपट्टिका वाचन में आया था ।

३.ऐसी हुई कैलाश मानसरोवर यात्रा !
अ. कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए जाना सरल न था । उसके लिए शरीर सुदृढ होने के साथ मनोबल भी अच्छा होना आवश्यक है । हमें पता था कि यात्रा के लिए जानेवाले अनेक लोग कैसे आधे रास्ते से लौट जाते हैं। श्रीचित्शक्ति (श्रीमती)गाडगीळजी समेत कैलाश दौरे पर श्री.सत्यकाम कणगलेकर, श्री.स्नेहल राऊत, श्री. विनायक शानभाग एवं श्री. दिवाकर आगावणे,ये ४ साधक जाएंगे, ऐसे निश्चित हुआ । आगे कुछ दिनों में पुणे के साधक श्री.अनिरुद्ध राजंदेकर, श्री. शशांक साने एवं श्री. उमेश निकम ने और उसके कुछ दिनों बाद सांगली के साधक श्री.दत्तात्रेय रेठरेकर ने कैलाश यात्रा के लिए आने की इच्छा दर्शाई । इन सबको आने के लिए श्रीचित्शक्ति (श्रीमती)गाडगीळजी से अनुमति मिलने पर इसका कार्यकारणभाव समझ नहीं आया । प्रत्यक्ष कैलाश यात्रा के समय हमारे साथ ये सभी साधक होने से चित्रीकरण, विविध दिशाआें से, पद्धति से छायाचित्र खींचना, स्थानीय जानकारी एकत्र करना, प्रतिदिन का नियोजन तथा कठिन यात्रा में एक-दूसरे को आधार देना, ऐसी सभी सेवाआें में उनकी सहायता हुई । कैलाश यात्रा में पग-पग पर परात्पर गुरु डॉ.आठवलेजी ने अनेक बार बताया हुआ सङ्घे शक्तिः कलौ युगे । इस श्लोक का स्मरण हुआ । श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) गाडगीळजी सहित हम ८ साधकों को एक-दूसरे की सहायता मिली ।
आ. कैलाश यात्रा के लिए जाते समय न्यूनतम ७ से अधिकाधिक ५० व्यक्तियों के गुटों में जाना पडता है । कैलाश पर्वत और मानसरोवर, दोनों चीन में हैं । चीन भारतियों को व्यक्तिगत वीजा नहीं देता । हमारे गुट में कुल ३२ लोग थे । उनमें से ६ मध्य प्रदेश के इंदौर तथा १० आेंकारेश्वर के समीप के क्षेत्र से आए थे । कुल १६ व्यक्ति मध्य प्रदेश से आए थे । इंदौर और आेंकारेश्वर, ये दोनों गांव सनातन संस्था के श्रद्धाकेंद्र प.पू.भक्तराज महाराजजी से संबंधित गांव हैं । संपूर्ण यात्रा में इन १६ शिवभक्तों को श्रीचित्शक्ति (श्रीमती)अंजली गाडगीळजी का सत्संग मिला । हम साधकों को प्रतीत हुआ कि इन शिवभक्तों के माध्यम से प.पू.भक्तराज महाराज ही साथ हैं और जैसे वे कह रहे हों, मैं आपके साथ हूं । हमें लगा कि प.पू.भक्तराज महाराजजी हमें आशीर्वाद दे रहे हैं । श्रीचित्शक्ति (श्रीमती)अंजली गाडगीळजी एवं सभी साधकों की ओर से प.पू.बाबा के चरणों में कृतज्ञता व्यक्त हुई ।
इ. कैलाश पर चढने के ४ दिन तथा कैलाश पर निवास करने के ३ दिन अत्यधिक ठंड होती है । इस समय हवा में प्राणवायु की मात्रा सर्वाधिक अल्प होती है । इसलिए यात्रा के समय प्रतिदिन प्रत्येक यात्री के रक्त के प्राणवायु की मात्रा हमारे साथ चलनेवाले शेरपा यंत्र की सहायता से गिनते थे । प्राणवायु की मात्रा ६५ से न्यून हो,तो उस यात्री को वापस भेजते थे । कुल ३२ यात्रियों में से ६ यात्रियों को मार्ग में बहुत कष्ट हुआ और उन्हें वापस लौटना पडा । विशेष बात थी कि ३२ यात्रियों में से श्रीचित्शक्ति (श्रीमती)गाडगीळजी के रक्त में प्राणवायु की मात्रा८९ -९० प्रतिशत थी, तो अन्य सभी यात्रियों के रक्त में प्राणवायु की मात्रा अल्प थी । (इससे परात्पर गुरुदेवजी द्वारा सिखाई हुई साधना का महत्त्व समझ में आता है । गुरुकृपायोगानुसार साधना करने से साधना में प्रगति हुई और उससे चैतन्य बढा । चैतन्य बढने के कारण प्राणवायु की मात्रा अल्प नहीं हुई, इसके लिए गुरुचरणों में कितनी भी कृतज्ञता व्यक्त करें, अल्प ही है !
ई. कैलाश पर्वत पर जाने के लिए हम ने गत ३ वर्षों से अनेक लोगों से समादेश एवं मार्गदर्शन लिया । जब जयपुर के शिवभक्त तथा हितैषी श्री. वारिद सोनी से भेंट हुई, तब श्रीचित्शक्ति गाडगीळकाकूजी ने निश्चित किया कि, कैलाश यात्रा यदि करनी है, तो इनके साथ करनी है । हमें जयपुर की साधिका श्रीमती अर्चना खेमका ने कहा कि गत ६ वर्षों से श्री. वारिद सोनीजी कैलाश यात्रा कर रहे हैं और यात्रा के लिए जाते समय सनातन इत्र की ५० शीशियां लेकर जाते हैं । प्रत्यक्ष मिलने पर श्री. वारिद सोनीजी ने श्रीचित्शक्ति गाडगीळजी से कहा, आज तक मैंने शिवपूजा में अनेक इत्र का उपयोग किया है;परंतु सनातन इत्र के जैसा सुगंध किसी का नहीं । तब से मैंने निश्चित किया कि कैलाश पर्वत के नीचे, जिसे चरणस्पर्शकहते हैं, वहां केवल सनातन का ही इत्र अर्पण करना है । इस पर श्रीचित्शक्ति (श्रीमती)गाडगीळजी ने कहा, आप चरणस्पर्श पर इत्र अर्पित करते हैं, अर्थात साक्षात शिवजी के चरणों में ही इत्र अर्पित करते हैं । हम साधक कैलाश पर्वत के चरणस्पर्श तक जाने से पहले ही गुरुदेवजी द्वारा निर्मित सनातन इत्र वहां पहुंचा है। संक्षेप में, आप ही अब हमें कैलाश का मार्ग दिखाएं और हमें कैलाश पर्वत तक लेकर जाएं । यह सुनने पर श्री. वारिद सोनीजी का भाव जागृत हो गया । श्री. वारिद सोनीजी ने ३ माह में यात्रा की तैयारी की और हम से करवा ली ।
उ. कैलाश यात्रा के लिए जाते समय हमारे गुट में कुल ३२ लोग थे, जिसमें श्रीचित्शक्ति (श्रीमती)गाडगीळजी सहित ७ महिलाएं थीं । अंत में ऐसे हुआ कि कुछ कारणवश बाकी की ६ स्त्रियां यात्रा पूर्ण होने के पूर्व ही लौट गईं । अंत में हम केवल २२ लोग ही थे, जिसमें श्रीचित्शक्ति (श्रीमती)गाडगीळजी अकेली महिला थीं । विशेष था कि गुट में सभी को उनका आधार लगता था । हम ३२ लोगों सहित २ चालक, ८ शेरपा और १ तिबेटियन गाईड भी था ।
४.मानसरोवर के संदर्भ में विशेष सूत्र
४ अ.मानसरोवर के समीप का राक्षस तल : मानस सरोवर का अधिक पानी बगल के एक बडे तालाब में एकत्र होता है । इस बडे तालाब के किनारे बैठकर शिवजी को प्रसन्न करने के लिए रावण ने तपश्चर्या की । तब से इस तालाब को राक्षस ताल कहा जाता है । मानसरोवर का पानी मधुर है, जबकि राक्षस ताल का पानी खारा और विषयुक्त है । मनुष्य, पक्षी एवं प्राणी इस राक्षस ताल का पानी नहीं लेते ।
४ आ.ढिराफूक और चरणस्पर्श : कैलाश परिक्रमा करते समय हम कैलाश पर्वत के सब से पास जाते हैं, वह स्थान है ढिराफूक । प्रात:सूर्योदय में सूर्यकिरण कैलाश पर आते हैं । तब कैलाश सुवर्ण पर्वत जैसा दिखाई देता है । ढिराफूक से ३ कि.मी.पैदल जाने पर हम कैलाश के नीचे पहुंचते हैं । इस स्थान को चरणस्पर्श कहते हैं; कारण हम प्रत्यक्ष कैलाश पर्वत, जो साक्षात शिव हैं, उसके चरणों को अर्थात पर्वत को स्पर्श करते हैं । कहा जाता है कि चरणस्पर्श का प्रत्येक पत्थर शिवजी का आत्मलिंग ही हैं ।
४ ई. ढिराफूक से चरणस्पर्श जाने के लिए प्रचंड मनोबल एवं शारीरिक स्वास्थ्य की आवश्यकता होती है; क्योंकि प्रत्येक दसवें पग पर मनुष्य की सांस फूलती है । अनेक लोग दूर से ही दर्शन कर लौटते हैं । कैलाश यात्रा करनेवाले केवल ५ प्रतिशत लोग चरणस्पर्श जाने का साहस करते हैं । उनमें से आधे यात्री बीच से ही लौट जाते हैं । ऐसे पावन स्थान पर हमारे मार्गदर्शक श्री. वारिद सोनीजी सहित पुणे के साधक श्री. उमेश निकम, श्री. शशांक साने तथा श्री.दत्तात्रेय रेठरेकर जाकर आए । यह केवल सद्गुरु की कृपा से ही संभव है ! श्री गुरुकृपा से इन साधकों ने चरणस्पर्श तक जाकर वहां का आत्मलिंगस्वरूप पत्थर एवं गंगास्वरूप पवित्र कैलाश का तीर्थ लाया ।
५.श्रीचित्शक्ति (श्रीमती)गाडगीळजी एवं परात्पर गुरु डॉ.आठवलेजी के चरणों में कृतज्ञता !
कैलाश पर्वत पृथ्वी पर स्थित सभी तीर्थक्षेत्रों का मेरुमणि है । हिन्दू राष्ट्र-स्थापना में आनेवाली सभी बाधाएं दूर होकर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हो तथा आनेवाले भीषण काल में भगवान शिव सनातन संस्था के सभी साधकों की रक्षा करें, यह प्रार्थना करने के लिए ही श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी ने कैलाश यात्रा की । इसके लिए हम सनातन के सभी साधक श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी एवं परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि कृतज्ञता व्यक्त करते हैं !
-श्री.विनायक शानभाग,चेन्नई (१३.२.२०२०)
संपादकीय : नागरिक शास्त्र केवल पुस्तक में ?
केरल में दीपप्रज्वलन का विवाद : राष्ट्रीय व्यक्तित्व की आत्मा संस्कृति है या धर्म ?
हिन्दुत्वनिष्ठ कार्यकर्ताओं के लिए आदर्श जीवन-पद्धति का महत्त्व !
अमेजन के ’अमेजन नाउ’ विज्ञापन द्वारा महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट का अक्षम्य अपमान !