मद्रास उच्च न्यायालय का निर्णय

नई दिल्ली – किसी पुस्तक में वर्ष १९६७ की स्वतंत्र तमिलनाडू की मांग का केवल ऐतिहासिक उल्लेख करना वर्तमान समय में ‘देशद्रोह’ नहीं मन जा सकता । किसी ऐतिहासिक घटना का वर्णन करना तथा वर्तमान में अलगाववाद को बल देना इन दोनों बातों में स्पष्ट अंतर है । ऐसे प्रकरणों का मूल्यमापन वर्तमान सामाजिक स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए, ऐसा महत्त्वपूर्ण निर्णय मद्रास उच्च न्यायालय ने दिया ।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि,
१. देशद्रोह का मूल सारगर्भ सरकार के प्रति विद्वेष, तिरस्कार अथवा असंतोष उत्पन्न करना अथवा वैसा प्रयास करना, यह है ।
२. इसलिए किसी भी वक्तव्य का मूल्यमापन उस काल के सामाजिक एवं राष्ट्रीय पर्यावरण का विचार कर करना चाहिए ।
३. किसी इतिहास की पुस्तक में, शोध में अथवा पत्रों में अतीत की घटनाओं का उल्लेख करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भाग हो सकता है । यदि कोई प्रकाशन केवल पुराने समय की घटनाओं की प्रविष्टि रखता हो तथा उसके आधार पर वर्तमान में लोगों को भडकाने का प्रयास करता हो, तो उसे देशद्रोह नहीं कहा जा सकता ।
४. वर्ष १९६७ में भारत का राजनीतिक वातावरण वर्तमान समय की अपेक्षा संपूर्णतः भिन्न था । वर्तमान समय में भारत सामाजिक एवं राष्ट्रीय स्तर पर अधिक संगठित है तथा ऐसे ऐतिहासिक वक्तव्यों के कारण सामान्य जनता में सरकार के प्रति द्वेष उत्पन्न होने की संभावना नहीं है ।
५. संबंधित पुस्तक में स्वतंत्र तमिल राष्ट्र की मांग वर्तमान अभियान के रूप में प्रस्तुत नहीं की गई है, अपितु केवल इतिहास में घटित घटनाओं का उल्लेख करना स्वयं में देशद्रोह का अपराध सिद्ध नहीं होता ।
६. किसी भी वक्तव्य को उसके संपूर्ण संदर्भ के साथ पढना आवश्यक है । उसमें से केवल एक पंक्ति अथवा एक परिच्छेद को अलग निकालकर अपराध सिद्ध नहीं किया जा सकता ।
७. भविष्य में यह दृष्टिकोण इतिहास, शोधकार्य एवं प्रकाशन से संबंधित प्रकरणों में भी महत्त्वपूणॅ मार्गदर्शन कर सकता है ।
८. आपराधिक कानून का उपयोग केवल वास्तव में भडकाने के अथवा हिंसा फैलाने के प्रकरणों तक ही सीमित रहना चाहिए ।
क्या था यह प्रकरण ?
देशद्रोह से संबंधित यह प्रकरण ‘कलघम् पथिप्पगम’ नाम की एक प्रकाशन संस्था के साथ जुडा हुआ है, जिसके संचालकों के विरुद्ध पुलिस ने आरोपपत्र प्रविष्ट किया था । वर्ष २०१४ में प्रकाशित एक पुस्तक में वर्ष १९६७ में तमिलरासन द्वारा तमिलनाडू को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की की गई मांग तथा कूटनीति का उल्लेख किया गया था । इसी आधार पर प्रकाशकों के विरुद्ध भारतीय दंडसंहिता में समाहित देशद्रोह की धाराओं के अंतर्गत कार्यवाही आरंभ की गई । इस प्रकरण के मुख्य आरोपी इलांगोवन का सुनवाई की अवधि में निधन हो चुका था, जबकि दो प्रकाशकों ने उच्च न्यायालय में याचिका प्रविष्ट कर उनके विरुद्ध की जा रही कार्यवाही निरस्त करने की मांग की थी । न्यायालय में याचिकाकर्ताओं ने यह तर्कवाद किया कि उनकी पुस्तक में केवल ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख है, जबकि वर्तमान समय में अलगाववाद का कोई प्रचार नहीं है तथा वैसे उनकी कोई इच्छा भी नहीं है ।
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