‘महाराष्ट्र मंदिर महासंघ’ के कानूनी समर्थन को बडी सफलता !
देवस्थान की भूमि हडपने का षड्यंत्र विफल !
अचलपुर (जिला अमरावती) – यहां के ऐतिहासिक और प्राचीन ‘श्री सीतारामचंद्र संस्थान उर्फ श्रीराम मंदिर (बुंदेलपुरा)’ की मौजा खेल त्र्यंबकनारायण स्थित ३.५ एकड (१.४३ हेक्टेयर) की १० करोड रुपये मूल्य की कृषि भूमि को हडपने के षड्यंत्र को अचलपुर के राजस्व न्यायालय ने विफल कर दिया । अचलपुर के तहसीलदार तथा कृषि भूमि न्यायाधिकरण के अध्यक्ष सुदर्शन शहारे ने देवस्थान की प्रारंभिक आपत्ति स्वीकार करते हुए महिला कब्जाधारी के कुल-खरीद प्रकरण को कानूनी रूप से निरस्त कर दिया ।
किसी भी देवस्थान के प्रकरण में केवल प्रारंभिक आपत्ति के कानूनी आधार पर संपूर्ण दावा प्रारंभ में ही निरस्त कर देवस्थान के पक्ष में निर्णय देने का यह महाराष्ट्र राज्य का पहला ऐतिहासिक निर्णय माना जा रहा है । इस संघर्ष में ‘महाराष्ट्र मंदिर महासंघ’ द्वारा संस्थान के नए न्यासियों (ट्रस्टियों) को दिए गए दृढ कानूनी समर्थन और सहयोग के कारण ही मंदिर की भूमि अभी तक सुरक्षित है ।
🚩 Major Victory for Temple Rights in Maharashtra!
A Revenue Court in Achalpur dismissed an attempt to claim nearly ₹10 crore worth of land belonging to the historic 'Shri Sitaramchandra Sansthan – Shri Ram Mandir' (Bundelpura)
The verdict, achieved with legal support from… pic.twitter.com/SSc9MQhD1L
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) June 29, 2026
मृत ट्रस्टियों के नाम पर भूमि हडपने का था षड्यंत्र !
संबंधित भूमि श्रीराम मंदिर संस्थान की संपत्ति है । उसकी आय से मंदिर के नैवेद्य, पूजा-अर्चना, जीर्णोद्धार और पुजारियों का खर्च चलना अपेक्षित है; किंतु वर्तमान में मंदिर अत्यंत जर्जर अवस्था में है और कब्जाधारी की ओर से देवस्थान को एक रुपये का भी प्रतिफल नहीं मिल रहा था ।
७/१२ अभिलेख में प्रविष्ट पुराने ट्रस्टियों के निधन का लाभ उठाकर आवेदिका अनिता लखनसिंह तरवले ने वास्तविक स्थिति छिपाते हुए भूमि को अपने नाम कराने के लिए आवेदन किया था । धर्मादाय आयुक्तालय के आदेशानुसार मंदिर में नए ट्रस्टियों की नियुक्ति हो चुकी थी, फिर भी उन्हें पक्षकार बनाए बिना यह अवैध प्रक्रिया चलाई जा रही थी ।
इस प्रकरण में ‘महाराष्ट्र मंदिर महासंघ’ के राज्य पदाधिकारी श्री अनुप जायसवाल और विनीत पाखोडे ने तत्काल हस्तक्षेप करते हुए तहसीलदार को ज्ञापन दिया और भूमि का इतिहास प्रस्तुत किया । धर्मादाय सह-आयुक्त, अमरावती की रिपोर्ट के अनुसार पंजीकृत देवस्थान की भूमि की खरीद-बिक्री के लिए धर्मादाय आयुक्त की पूर्व अनुमति अनिवार्य होती है और आवेदिका के पास ऐसी कोई अनुमति नहीं थी ।
दोनों पक्षों की दलीलों और कागदपत्रों (दस्तावेजों) की जांच के उपरांत तहसीलदार सुदर्शन शहारे ने स्पष्ट किया कि आवेदिका ने कुल-कानून की आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं किया है और उसे देवस्थान की भूमि खरीदने का कोई अधिकार नहीं है । उन्होंने आवेदिका का आवेदन पूर्णतः निरस्त करते हुए निर्णय दिया कि भूमि संस्थान की ही संपत्ति है ।
इस संपूर्ण न्यायिक लडाई में संस्थान की ओर से नए ट्रस्टी सर्वश्री मयूर दीक्षित, अजय तिवारी, पुरुषोत्तम दुबे, राजकुमार मिश्रा, लोकनाथ वाजपेयी, सचिन अवस्थी और नितिन माहेश्वरी ने अत्यंत सशक्त रूप से कानूनी पक्ष प्रस्तुत किया ।

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