मंत्री-विधायक यह न समझे कि ईश्वर उनकी प्रतीक्षा में बैठे हैं । – Madras High Court

  • मंदिरों के ‘वीआईपी (VIP) दर्शन’ के विषय में मद्रास उच्च न्यायालय ने डांट लगाई ।

  • सनातन धर्म की सीख देते हुए ‘ईश्वर के सामने सभी समान हैं’, यह भी स्पष्ट किया ।

(वीआईपी अर्थात अतिविशिष्ट व्यक्ति)

नई दिल्ली – मंत्री एवं विधायक ऐसा न समझें कि वे कानून से ऊपर हैं अथवा ईश्वर उनकी प्रतीक्षा में बैठे हैं, इन शब्दों में मद्रास उच्च न्यायालय ने मंदिर में ‘वीआईपी दर्शन’ की (अतिविशिष्ट व्यक्तियों के देवतादर्शन कराने की पद्धति ) पद्धति पर डांट लगाई । पूरे देश के प्रसिद्ध मंदिरों में प्रतिदिन सहस्रों श्रद्धालु देवता के दर्शन करते हैं, चाहे वह तिरुपति बालाजी मंदिर हो, महाराष्ट्र का श्री महालक्ष्मी अथवा तुलजाभवानी देवी का मदिर हो, अयोध्या का श्रीराममंदिर अथवा काशी विश्वनाथ का मंदिर हो । तथापि ऐसे अधिकांश मंदिरों में ‘वीआईपी दर्शन’ की पद्धति अपनाई जाती है । इसके विरोध में प्रविष्ट की गई याचिका की सुनवाई के समय मद्रास उच्च न्यायालय ने उक्त डांट लगाई ।

याचिकाकताओं का तर्कवाद समझ लीजिए

विश्व हिन्दू परिषद के पदाधिकारी पी. चोक्कलिंगम् ने यह जनहित याचिका प्रविष्ट की है । उसमें उन्होंने कहा है कि मंदिरों में जारी किया जानेवाला विशेष टिकट, ‘ब्रेक दर्शन’ एवं ‘‘वीआईपी दर्शन‘ ये सभी व्यक्तियों में भेदभाव उत्पन्न करते हैं । ईश्वर की दृष्टि में ऐसा भेदभाव नहीं है । सनातन परंपरा में धनवान एवं गरीब इनके मध्य किसीप्रकार का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है । इसलिए पैसों के आधार पर देवता के दर्शन की अलग व्यवस्था संविधान एवं धार्मिक मूल्य इन दोनों का विरुद्ध है । यह व्यवस्था बंद होनी चाहिए ।

चर्च एवं मस्जिदों में इसप्रकार की विशेष व्यवस्था देखने को नहीं मिलती – मद्रास उच्च न्यायालय ने प्रविष्ट किया महत्त्वपूर्ण निरीक्षण

मद्रास उच्च न्यायालय के अवकाशकालीन खंडपीठ के न्यायाधीश जी.आर्. स्वामीनाथन् एवं न्यायाधीश वी. लक्ष्मीनारायणन् ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्होंने कहा,

१. भगवान के सामने सभी समान हैं । सनातन धर्म हमें यही सिखाता है ।

२. पूजा एवं श्रद्धा का आधार में यदि समानता हो, तो ‘वीआईपी दर्शन’ जैसे व्यवस्था की आवश्यकता ही क्या है ?

३. चर्च एवं मस्जिदों में इसप्रकार की विशेष व्यवस्था देखने को नहीं मिलती, तो मंदिरों में प्रचालित की गई इस व्यवस्था को कैसे समर्थनीय माना जा सकता है ?

संविधान का अनुच्छेद १४ सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है ।

याचिकाकर्ता ने भारतीय संविधान में प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार प्रदान करनेवाले अनुच्छेद १४ का संदर्भ देते हुए कहा कि देश का कानून प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान है । कोई व्यक्ति धनवान हो, गरीब हो, सामान्य नागरिक हो अथवा सरकारी अधिकारी हो, जहां सभी नागरिक कानून की दृष्टि से समान हैं, तो धार्मिक स्थलों पर भी सभी को समान अवसर मिलना चाहिए ।

मंदिर प्रशासन की भूमिका ।

मंदिर प्रशासन ने इस पर कहा कि विशेष दर्शन के लिए जारी किए जानेवाले टिकटों से मिलनेवाला पैसा मंदिर की आय का बडा अंश है । इसके कारण मंदिर का संचालन एवं देखभाल करने में सहायता मिलती है; परंतु उच्च न्यायालय इस राजस्व की हानि का तर्कवाद निरस्त करते हुए कहा कि केवल आय के आधार पर भेदभावपूर्ण व्यवस्था को उचित नहीं ठहराया जा सकता । इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती ।