शबरीमला प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दोहराया

नई देहली – सामाजिक सुधारों के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता । संविधान के निर्माताओं ने समाज की आवश्यकताओं के अनुसार जो प्रावधान निर्मित किए हैं, उन्हें ९ न्यायाधीशों की पीठ परिवर्तित नहीं कर सकती । यदि जनता की सहमति से सुधार की मांग आती है, तो उस पर विचार किया जा सकता है, ऐसा सर्वोच्च न्यायालय ने शबरीमला प्रकरण की सुनवाई के समय स्पष्ट किया ।
१. सुनवाई के समय केरलम् सरकार के पक्ष से वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने कहा, ‘धर्म के आवश्यक पक्षों को सामाजिक सुधार के नाम पर परिवर्तित नहीं किया जा सकता । हिन्दू धर्म में पूजा का अधिकार महत्वपूर्ण है तथा वह पवित्र स्थान पर होता है । उन्हें हटाना अधिकारों का उल्लंघन होगा ।’
२. न्यायालय में यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि, जब राज्य सामाजिक कल्याण हेतु कानू निर्माण करता है, तब उन्हें धार्मिक प्रथाओं के आधार पर निरस्त नहीं किया जाना चाहिए ।
३. महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के पक्ष से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगडे ने कहा कि, तर्कवादी प्रत्येक विषय को तर्क की कसौटी पर देखते हैं । संविधान के ‘अनुच्छेद ५१ अ’ में वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा सुधार की भावना को प्रोत्साहन देने के विषय में कहा गया है ।
४. स्वामी अग्निवेश के पक्ष से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि , संविधान ने धर्मों में सुधार हेतु अवसर रखा है । अनुच्छेद २६ में व्यवस्थापन शब्द का प्रयोग किया गया है, नियंत्रण नहीं । इससे यह स्पष्ट होता है कि, धार्मिक संस्थाओं के अधिकार तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मध्य संतुलन है ।
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