- मंदिर के न्यासियों का दायित्व !
- न्यासी सेवक के रूप में मंदिर का कार्य चलाए ।
- ‘मंदिर के स्वामी स्वयं भगवान हैं’, इस बात का न्यासी ध्यान रखें ।
- न्यासियों को मंदिर की संपत्ति को हानि पहुंचाने का कोई अधिकार नहीं है ।
- मंदिरों के विषय में कानूनी जानकारी हो; इसके लिए न्यासी महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट का अध्ययन करें ।
- देवस्थान से संबंधित प्रत्येक घटना की जानकारी न्यासियों को हो ।
- न्यासियों के आपसी विवाद के कारण देवस्थान की भूमि दूसरों के नियंत्रण में जा रही है । अतः देवस्थान की चल-अचल संपत्ति का संरक्षण करना न्यासियों का दायित्व है ।
– श्री. दिलीप देशमुख, पूर्वधर्मादाय आयुक्त
श्रद्धालुओं का दायित्व !
- मंदिर परिसर में पवित्रता बनाए रखना श्रद्धालुओं का दायित्व है ।
- मंदिर के सभी आचार-विचारों का पालन करना आवश्यक है ।
- त्योहार-उत्सवों के समय मंदिरों में आयोजित किए जानेवाले उपक्रमों में, सेवाभाव के साथ सहभागी हों तथा धर्मदान दें ।
- भावी पीढी को मंदिरों की धरोहर की जानकारी उपलब्ध हो, इस हेतु प्रयास करें ।
- चैतन्य, शक्ति, आनंद एवं शांति प्रदान करनेवाली मंदिर संस्कृति को संजोने का प्रयास करें ।
- मंदिरों की रक्षा कर अपना धर्मकर्तव्य निभाएं !
मंदिर संस्कृति को बनाए रखने से होनेवाले लाभ !
१. हिन्दुओं में अच्छे संस्कार निर्माण होंगे । हिन्दुओं का धर्मांतरण रुकेगा ।
२. धार्मिक विचारों का संरक्षण होगा ।
३. समाज में अपराध रुकेंगे ।
४. वस्त्र संहिता (Dress Code) के अनुसार आचरण किया जाएगा ।
५. नकारात्मकता घटेगी और हिन्दुओं को सकारात्मक ऊर्जा मिलेगी । हिन्दू सात्त्विक एवं सत्त्वगुणी बनेंगे ।
६. भक्तिभाव में वृद्धि होगी !
७. हिन्दू धर्माचरणी, धर्माभिमानी एवं धर्मनिष्ठ बनेंगे । उन्हें धर्मकार्य के लिए ऊर्जा मिलेगी ।
८. धार्मिक स्थलों की रक्षा होगी ।
९. मंदिर वास्तव में धर्मशिक्षा के केंद्र बनेंगे !
१०. हिन्दू बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दी जा सकेगी ।

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सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
कोटि कोटि प्रणाम !
सनातन धर्म के मूर्तिमान स्वरूप सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी के श्री चरणों में कोटि-कोटि वंदन !
संपादकीय : गुरुभ्यो नमः ।