इलाहाबाद उच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणी
आरोपी पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत की गई कार्रवाई को उचित ठहराया !
नई देहली – गाय की हत्या एक ऐसा कृत्य है, जो स्वतः ही समाज में तीव्र भावनाओं तथा हिंसक प्रतिक्रिया का कारण बनता है, ऐसा वक्तव्य इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने गत दिनों एक सुनवाई के समय दिया । उच्च न्यायालय के इस निर्णय से अब गोवंश हत्या तथा उससे उत्पन्न होने वाले सामाजिक तनाव के प्रकरणों में कठोर वैधानिक कदम उठाने हेतु प्रशासन को बल प्राप्त होगा ।
१५ मार्च २०२५ को उत्तरप्रदेश के शामली जिले में होली के अवसर पर एक खेत में गोवंश के अवशेष प्राप्त हुए थे । इस घटना के कारण परिसर में तनाव व्याप्त हो गया था । पुलिस ने इस प्रकरण में कुछ आरोपियों को बंदी बनाकर उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत कार्रवाई की थी । इनमें से एक आरोपी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका प्रविष्ट (दाखिल) कर यह दावा किया कि, ‘यह केवल विधि-व्यवस्था का विषय है तथा इस प्रकरण में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत कार्रवाई करना त्रुटिपूर्ण है ।’ न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया ।
सार्वजनिक व्यवस्था को आघात पहुंचाने वाली घटना !
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि, गाय की हत्या करने से समाज के एक बड़े वर्ग की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं । इससे सार्वजनिक शांति भंग होने का अत्यधिक संकट बना रहता है । यह विषय केवल सामान्य अपराध का नहीं, अपितु सार्वजनिक व्यवस्था को आघात पहुंचाने वाला है; इसीलिए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत की गई कार्रवाई न्यायोचित है ।
राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत संविधान का अनुच्छेद ४८ राज्य को गोवंश के रक्षण तथा संवर्धन का निर्देश देता है, इस सुनवाई के समय इस विषय का भी उल्लेख हुआ ।
वैधानिक एवं सामाजिक परिणाम !
विधि विशेषज्ञों के अनुसार, न्यायालय की यह टिप्पणी प्रशासन को अधिक सतर्क रहने का संकेत देती है । विशेषतः पर्वों के समय ऐसी घटनाओं के कारण सामाजिक समरसता खराब न हो, इस दृष्टि से यह टिप्पणी महत्वपूर्ण मानी जा रही है । साथ ही न्यायपालिका ने यह भी सुझाया है कि, सामाजिक भावनाओं का विचार करते समय विधि का शासन (कानून का राज) बनाए रखना, प्रशासन का सर्वोच्च दायित्व है ।

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