Supreme Court Namaz : (और इनकी सुनिए…) ‘महिलाओं को नमाज के लिए मस्जिदों में प्रवेशबंदी न होते हुए भी, उनका घर पर ही नमाजपठण करना अधिक अच्छा है !’

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का सर्वोच्च न्यायालय में निवेदन


नयी देहली – महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश करने पर कोई भी प्रतिबंध नहीं हैं, इस पर इस्लाम के सभी पन्थों में एकमत है; परन्तु ‘मस्जिद में नमाज पाठ करनेवाले समुदाय में सम्मिलित होना महिलाओं के लिए अनिवार्य नहीं है’, इस पर भी एकमत है । साथ ही मोहम्मद पैगम्बर ने स्वयं महिलाओं को मस्जिद में आने से न रोकने की सूचना दी है । फिर भी महिलाओं का घर पर ही नमाज पढ़ना अधिक अच्छा है । घर में नमाज पढ़ने पर महिलाओं को मस्जिद में नमाजपठने वाले पुरुषों जितना ही धार्मिक फल मिलता है, ऐसी जानकारी ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सर्वोच्च न्यायालय में दी ।

सर्वोच्च न्यायालय के ९ सदस्यीय घटनापीठ के समक्ष शबरीमला मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश के विषय में प्रविष्ट की गई याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है । महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश करने की अनुमति देने की विनती करनेवाली याचिकाएं शबरीमला से सम्बन्धित याचिकाओं के साथ जोडी गई हैं । राज्यघटना के अनुच्छेद २५ एवं २६ की व्याप्ति से सम्बन्धित घटनात्मक सूत्र इन दोनों प्रकरणों में लागू हो रहे हैं । उस सन्दर्भ में अधिवक्ता एम.आर. शमशाद ने बोर्ड का पक्ष रखा ।

याचिकाओं का उत्तर देते हुए शमशाद ने बताया कि, मस्जिदों में गर्भगृह यह संकल्पना नहीं है; परन्तु वह दरगाहों में है । मस्जिद में गर्भगृह न होने से कोई भी किसी विशिष्ट स्थान पर खडे रहने का आग्रह नहीं करता ।

संपादकीय भूमिका

इसका अर्थ यह है कि, दिखाने के लिए प्रवेशबंदी नहीं है; परन्तु उन्हें घर पर ही नमाज पढ़ने के नाम पर अघोषित बंदी डाली गई है । इसी कारण मुसलमान महिलाएं कभी मस्जिद में नमाजपठने के लिए जाती हुई दिखाई नहीं देतीं ! इस पर कोई भी पुरो(अधो)गामी अथवा महिला संगठन, स्त्रीमुक्तिवाले कभी प्रश्न नहीं पूछते, यह ध्यान में लें !