वर्ष २०२१-२०२२ के मध्य ‘यूनिवर्सल ऑरा स्कैनर’ उपकरण द्वारा परीक्षण करते समय, कुछ घटकों का प्रभामंडल (Aura) २३०० मीटर से भी अधिक पाया गया। स्थान की कमी के कारण इतनी विशाल दूरी को सटीक रूप से मापना संभव नहीं हो पा रहा था। इन सीमाओं को देखते हुए, ‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ ने प्रभामंडल के सटीक मापन के लिए लोलक (पेंडुलम) का उपयोग करना आरंभ किया।

लोलक परीक्षण द्वारा किसी घटक का सटीक प्रभामंडल मापने की विधि
‘लोलक द्वारा किसी घटक का सटीक प्रभामंडल कैसे मापा जाता है?’, इस विषय में सभी को उत्सुकता रहती है। ‘महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ के साधक लोलक परीक्षण किस प्रकार करते हैं, इसकी जानकारी नीचे दी गई है:

१. लोलक परीक्षण करनेवाला साधक सर्वप्रथम अपने इष्टदेवता से प्रार्थना करता है कि ‘मेरे और लोलक के चारों ओर सुरक्षा कवच निर्मित हो ।’ इसके उपरांत वह लोलक से निम्नलिखित प्रश्न पूछता है:
प्रश्न १: क्या मैं लोलक परीक्षण कर सकता हूं ।
प्रश्न २: क्या लोलक परीक्षण के लिए चुना गया स्थान एवं समय उचित है ?
जब लोलक इन दोनों प्रश्नों के लिए सकारात्मक (हां में) उत्तर देता है, तभी साधक परीक्षण प्रक्रिया शुरू करता है ।
२. लोलक परीक्षण के लिए जिसका परीक्षण करना है, वह घटक अथवा उसका छायाचित्र और कुछ तालिकाओं (Charts) की आवश्यकता होती है । साधक उस घटक का प्रभामंडल मापने के लिए उसके सामने लोलक पकडकर विशिष्ट प्रश्न पूछता है ।

इन प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार की तालिकाओं (Charts) का उपयोग किया जाता है, जैसे: ‘हां’ और ‘नहीं’ की तालिका । ‘मीटर’ और ‘किलोमीटर’ की तालिकाb। अंकों की तालिकाएं जैसे १ से १० अंकों की तालिका; ५, १०, ५०, १०० आदि संख्याओं के गुणज (Multiples) वाली तालिकाएं । बडी संख्याओं की तालिकाएं जैसे १ हजार से १० हजार, १० हजार से १ लाख, १ लाख से १० लाख, १० लाख से १०० लाख आदि के गुणज वाली तालिकाएं ।साधक इनमें से आवश्यक तालिकाओं का उपयोग करके और आवश्यक प्रश्न पूछकर उस घटक के प्रभामंडल (Aura) को मापता है और उसे दर्ज (Record) कर लेता है ।
३. लोलक-परीक्षण पूर्ण होने के पश्चात, साधक अपने इष्टदेवता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है ।
– सौ. मधुरा धनंजय कर्वे, महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा. (१०.७.२०२४)
| सूक्ष्म : व्यक्ति के स्थूल अर्थात प्रत्यक्ष दिखनेवाले अवयव नाक, कान, नेत्र, जीभ एवं त्वचा, ये पंचज्ञानेंद्रिय हैैं । जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुद्धि के परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इसके अस्तित्व का ज्ञान साधना करनेवाले को होता है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान के विषय में विविध धर्मग्रंथों में उल्लेख है । |
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