सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता ! – Supreme Court

सबरीमला मंदिर प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी l


नई दिल्ली – लाखों लोगों की आस्था को ठेस पहुंचाना सबसे कठिन कार्यों में से एक है । सामाजिक कल्याण एवं सुधार के नाम पर किसी भी धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता, ऐसा अवलोकन सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमला मंदिर प्रकरण की सुनवाई के समय पंजीकृत किया । वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी द्वारा अनुच्छेद २५(२) (ख) एवं अनुच्छेद २६(ख) के अंतर्गत धार्मिक संस्थाओं को अपने कार्यों के प्रबंधन के अधिकार के संबंध में दिए गए तर्क को सुनते समय न्यायालय ने यह टिप्पणी की । अनुच्छेद २५(२) (ख) राज्य को सामाजिक सुधार एवं कल्याण के लिए कानून बनाने तथा हिन्दू धार्मिक संस्थाओं को सभी वर्गों एवं समुदायों के लिए खोलने की अनुमति देता है ।

कौन-सी प्रथा आवश्यक है या नहीं, यह तय करना न्यायालय का काम नहीं ! 

‘त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड’ की ओर से बहस करते हुए अधिवक्ता सिंघवी ने कहा कि भले ही अनुच्छेद २५(२) (ख) के अंतर्गत सभी हिन्दू संप्रदायों को सार्वजनिक धार्मिक संस्थानों में प्रवेश का अधिकार हो, लेकिन अनुच्छेद २६(ख) के अंतर्गत धार्मिक संप्रदाय को अपने धार्मिक कार्यों के संचालन का अधिकार बना रहता है । अनुच्छेद २५(२) (ख) का उद्देश्य किसी धर्म की पहचान या अस्तित्व को समाप्त करना नहीं है । इसके अंतर्गत बनाए गए कानूनों से धर्म की मूलभूत प्रथाओं पर असर नहीं पडना चाहिए । संवैधानिक संरक्षण केवल “आवश्यक धार्मिक प्रथाओं” तक सीमित नहीं किया जा सकता एवं यह तय करना भी न्यायालय का कार्य नहीं है कि कौन-सी प्रथा आवश्यक है या नहीं ।

सबरीमला मंदिर ‘रेस्टोरेंट’ नहीं है ! – त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड 

त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह कोई खिलौनों की दुकान या रेस्टोरेंट का प्रकरण नहीं है । यह एक ऐसे देवता को समर्पित मंदिर है, जिन्हें आजीवन ब्रह्मचारी माना जाता है । १० से ५० वर्ष आयु वर्ग की महिलाएं इस देवता के स्वरूप एवं पहचान के विरुद्ध मानी जाती हैं । भारत में लगभग १,००० अयप्पा मंदिर हैं । यदि महिलाएं दर्शन करना चाहती हैं, तो वे अन्य मंदिरों में जा सकती हैं; उन्हें इसी विशेष मंदिर में आने की आवश्यकता क्यों है ?

क्या है पंजीकरण ? 

केरल उच्च न्यायालय ने वर्ष १९९१ में १० से ५० वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के सबरीमला मंदिर में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया था । वर्ष २०१८ में सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रतिबंध को भेदभावपूर्ण बताते हुए हटा दिया । इसके उपरांत प्रविष्ट पुनर्विचार याचिकाओं के आधार पर ७ महत्त्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर विचार किया जा रहा है, जिन पर वर्तमान में सुनवाई जारी है ।