मृत्यु अथवा आपातकाल के भय से नहीं; अपितु मर्म समझकर साधना करें !

‘कुछ संत साधकों को साधना का महत्त्व समझाने के लिए आनेवाले आपातकाल की गंभीरता बताते हैं, साथ ही ‘कम से कम आपातकाल में जीवित रहने के लिए तो साधना करें’, ऐसा मार्गदर्शन करते हैं । इस मार्गदर्शन का उचित चिंतन द्वारा बोध न कर पाने के कारण कुछ लोग आपातकाल अथवा मृत्यु के भय से साधना करते हैं, तो कुछ लोग ‘कभी न कभी मृत्यु आनी ही है, तो उससे डरना क्यों ?’, ऐसा कहकर साधना को टालते हैं । कुछ लोग अपनी समझ के अनुसार आपातकाल को परिभाषित करने का प्रयास करते हैं । ‘अभी तक आपातकाल आया नहीं है । जब आएगा, तब देखेंगे । सबके साथ जो होगा, वही हमारे साथ भी होगा’, ऐसे भ्रम मन में रखकर साधना में टालमटोल करते हैं । कुछ को यह भी विकल्प आता है कि ‘संत-महात्मा मृत्यु का भय दिखा रहे हैं ।’ इस दृष्टि से साधना वास्तव में क्यों करनी चाहिए ? और मनुष्य को साधना की आवश्यकता क्यों है ? यह यदि समझ लिया जाए, तो आपातकाल, मृत्यु एवं साधना के बीच उचित वैचारिक समन्वय स्थापित कर साधना में सही दिशा में आगे बढा जा सकता है और दृष्टिकोण स्पष्ट होने से जीवन सरल हो जाता है । इसी उद्देश्य से यह लेख प्रस्तुत है ।             

१. मृत्यु एक शाश्वत सत्य है

मृत्यु अटल है । प्रत्येक व्यक्ति को कभी न कभी मरना ही है । सनातन संस्था के संस्थापक सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी सदैव कहते हैं, ‘जन्म, मृत्यु और विवाह’ – ये तीनों बातें १०० प्रतिशत प्रारब्ध के अनुसार ही होती हैं । स्वयं ईश्वर भी व्यक्ति के प्रारब्ध में हस्तक्षेप नहीं करते ।

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले

प्रारब्ध अर्थात हमारे पूर्व जन्मों के कर्मों का फल, जिसे भोगकर समाप्त करना ही पडता है । यह स्वतः कम नहीं होता । अच्छे कर्म करने पर अच्छा फल और बुरे कर्म करने पर बुरा फल भोगना ही पडता है । इसलिए यदि हम साधना करें तो किसी की प्रारब्धजन्य मृत्यु टल जाएगी, ऐसा नहीं है; किन्तु यदि किसी में साधना की तीव्र लगन हो और उसी जन्म में उसकी आध्यात्मिक उन्नति होनेवाली हो अथवा उससे धर्मकार्य होनेवाला हो, तो ईश्वर गुरु के माध्यम से उस पर आए बडे संकट (जैसे महामृत्युयोग) को भी कुछ समय के लिए टालकर उसे साधना का अवसर देते हैं । अर्थात ईश्वर ऐसी कृपा करें, इसके लिए कठोर साधना करना आवश्यक है ।

२. संत-महात्मा ‘मृत्यु सामने है’ कहकर साधना करने को क्यों कहते हैं ?

किसी की मृत्यु कब और कैसे होगी ? उसका जीवन कितना शेष है ? किस कारण से मृत्यु होगी ? यह सब निश्चित होते हुए भी संत-महात्मा बार-बार ‘मृत्यु सामने है, इसलिए साधना करो’, ऐसा क्यों कहते हैं, यह प्रश्न स्वाभाविक है । क्या साधना से मृत्यु टल जाएगी ? नहीं । मृत्यु से कोई बचाव नहीं है । यहां यह समझना आवश्यक है कि ‘साधना कोई जीवन बीमा नहीं है !’ ऐसा नहीं कि साधक बनते ही मृत्यु का भय समाप्त हो जाएगा ।

मृत्यु का उदाहरण देकर साधना के लिए प्रेरित करने का मूल कारण है कि साधना केवल मनुष्य जन्म में ही संभव है; शेष भोगयोनि हैं । ‘इस जन्म के कर्मों के अनुसार अगला जन्म भी मनुष्य का ही होगा’, यह भी सुनिश्चित नहीं है । ‘अन्ते मतिः सा गतिः’ – इस सिद्धांत के अनुसार मृत्यु के समय मन में जो विचार होते हैं, उसी के अनुसार आगे की गति मिलती है । यदि मृत्यु के समय मन में साधना का संस्कार होगा, तो अगला जन्म साधना के लिए अनुकूल मिलेगा । अर्थात मृत्यु तो निश्चित है; परंतु यदि मृत्यु तक मन पर साधना का संस्कार हो जाए, तो अगले जन्म में वहीं से साधना आगे बढाई जा सकती है ।

संक्षेप में, अगले जन्म में साधना की यात्रा जारी रह सकती है; परंतु यदि ऐसा सोचकर कि ‘मृत्यु अभी दूर है’, हम साधना से दूर रहे और सांसारिक जीवन में उलझे रहे, तो मन पर अनेक संस्कार होंगे एवं मृत्यु के समय भगवान का नामस्मरण नहीं होगा । इससे मृत्यु उपरांत यात्रा की गति अपेक्षित रूप से नहीं होगी और पुनः भौतिक सुखों की ओर आकर्षण बढेगा । इस प्रकार मनुष्य जन्म का जो उद्देश्य है, वह पूर्ण नहीं हो पाएगा । अत: संत-महात्मा मृत्यु का स्मरण कराकर निरंतर साधना करने का आग्रह करते हैं ।


आज से ही साधना आरंभ करें, तभी आपातकाल में रक्षा होगी !

कोई व्यक्ति अपने प्रारब्ध (भाग्य) अथवा पूर्व पुण्यों के कारण भीषण संकटकाल (आपातकाल) में भी जीवित बच सकता है; परंतु परम पूज्य गगनगिरी महाराजजी ने अपने मार्गदर्शन में एक बार कहा था, ‘आगे आनेवाला आपातकाल इतना भयानक होगा कि हम संतों को भी लगेगा । यदि हमने पहले ही अपनी आंखें मूंद ली होतीं (देह त्याग दी होती), तो अच्छा होता !’’

संतों द्वारा बताए इस संकटकाल की भीषणता को सुनकर शंका उत्पन्न होती है कि उस समय मनुष्य का मानसिक संतुलन कितना टिक पाएगा ? आज हमें छोटी-छोटी चुनौतियों का सामना करना भी बहुत कठिन लगता है, तो ऐसी परिस्थितियों की कल्पना कीजिए जहां आपकी आंखों के सामने सगे-संबंधियों की मृत्यु हो रही होगी ।

श्री. योगेश जलतारे

युद्ध जैसी परिस्थिति में आपका कोई प्रियजन अपंग, अंधा अथवा असहाय होगा । आपकी संपत्ति लूट ली गई होगी अथवा आपके अपनों ने ही आपके साथ विश्वासघात किया हो । खुलकर सोचिए, क्या ऐसी स्थिति में आप अपना मानसिक संतुलन टिका पाएंगे ?

केवल और केवल ‘साधना’ ही वह एकमात्र मार्ग है, जो मनुष्य के मानसिक संतुलन को स्थिर रख सकता है । अत: यदि हम आज से ही साधना आरंभ करते हैं, तो मन पर उचित संस्कार होंगे और हम भावी कठिन समय में स्वयं को स्थिर रख पाएंगे ।

– श्री योगेश जलतारे

 

३. आपातकाल निकट है : साधना करें !

संत ऐसा मार्गदर्शन क्यों करते हैं, इसका कारण भी सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवलेजी ने अपने एक मार्गदर्शन में बताया है । वे कहते हैं, ‘‘काल का महत्त्व अत्यंत महान होता है । ‘हम समय को बदल देंगे’, ऐसा सामर्थ्य किसी में नहीं होता ।’’ जब कलियुग का आरंभ हुआ, तब पांडव राजा परीक्षित को ज्ञात हुआ कि कलियुग अत्यंत कष्टदायक होगा । कलि के प्रभाव से लोग साधना, उपासना और धर्म से बहुत दूर चले जाएंगे । यह जानने पर उसने ‘कलियुग को आने ही नहीं दूंगा’, ऐसा निश्चय कर स्वयं काल को ही चुनौती दी । तब ऋषि-मुनियों ने राजा का मार्गदर्शन करते हुए कहा, ‘‘यद्यपि कलियुग बुरा है, तथापि अन्य युगों की तुलना में इस काल में सभी जीवों की आध्यात्मिक उन्नति साधना के माध्यम से अधिक तीव्र गति से होगी । इसलिए यह एक प्रकार से इष्टापत्ति है । इससे मानव का कल्याण ही होगा ।’’ यह शास्त्र समझने के उपरांत राजा परीक्षित ने अपने शस्त्र नीचे रख दिए । कलियुग के आपातकाल में थोडी-सी भी साधना करने पर उसका फल अनेक गुना मिलता है । इसी कारण संत-महात्मा निरंतर आग्रहपूर्वक कहते हैं -‘आपातकाल निकट आ गया है, अब तो साधना आरंभ करो ।’

आपातकाल में साधना करने अथवा उसे बढाने के लिए कहने का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि यदि किसी व्यक्ति के साथ अथवा उसके परिजनों के साथ कोई अनिष्ट हो जाए – जैसे युद्ध की स्थिति में कोई अपंग हो जाए, किसी की आंखें चली जाएं या किसी प्रियजन का निधन हो जाए – तो ऐसी स्थिति में उसे जीवन ही बोझ लगने लगता है । उस समय साधना करना तो दूर, जीवित रहने के लिए भी मनुष्य को संघर्ष करना पडता है । यदि साधना का बल साथ हो, तो ऐसी परिस्थितियों में भी साक्षिभाव और संतोष के साथ जीवन जीने की शक्ति केवल साधना से ही प्राप्त होती है । इसलिए साधना का आरंभ आज ही करना चाहिए । जैसे हम भविष्य की आवश्यकताओं और सुख-सुविधाओं को ध्यान में रखकर धन संचित करते हैं और समय आने पर उसका उपयोग करते हैं, उसी प्रकार साधना भी है ।


आपातकाल क्या है ?


हम अपने दृष्टिकोण से ‘आपातकाल’ (आपातकाल अथवा संकट के समय) को देखते हैं । वास्तव में यहीं अनदेखी होती है । ‘जब सबकुछ ठीक चल रहा है, तो क्या अचानक प्रलय आएगा ? क्या भूकंप आएगा ? क्या बडे पैमाने पर बाढ आएगी ? क्या आग लगेगी ?’ ऐसे अनेक प्रश्न हमारे मन में आते हैं । परंतु संतों की दृष्टि से आपातकाल की व्यापकता केवल युद्ध, प्राकृतिक आपदा अथवा महामारी जैसे भौतिक संकटों तक सीमित नहीं होती, अपितु समाज के गिरते नैतिक मूल्य भी संत-महात्माओं की दृष्टि में एक बडा आपातकाल ही है ।

आज हम चारों ओर युद्ध जैसी स्थिति अनुभव कर ही रहे हैं । कोरोना महामारी के समय हमने एक अलग प्रकार का आपातकाल देखा, कुछ लोगों ने प्राकृतिक आपदाओं का भी सामना किया है; परंतु नैतिकता का पतन होने के कारण उत्पन्न हुए आपातकाल के प्रति हम उतने सजग नहीं हैं ।

कुछ वर्ष पहले, एक लडकी अपने पिता, भाई अथवा मामा के साथ सुरक्षित अनुभव करती थी; परंतु आज वह इन रिश्तेदारों के साथ भी सुरक्षित रहेगी ही, यह आश्वासन नहीं दिया जा सकता । मां की गोद में बच्चा सबसे सुरक्षित अनुभव करता है; परंतु आज जब हम सुनते हैं कि मां ने ही अपनी संतान की हत्या कर दी, तो इसे आपातकाल नहीं तो और क्या कहेंगे ?

आज माता-पिता से बात करते समय बच्चों में विनम्रता व सम्मान दिखाई नहीं देता । बच्चे आज माता-पिता से ‘तू-तडाक’ (अनादरपूर्वक) करके बात करते हैं । आचारधर्म तो लोग भूल ही चुके हैं । ऐसी अनेक बातें हम उदाहरण के रूप में देख सकते हैं ।

जगद्गुरु संत तुकाराम महाराजजी

जगद्गुरु संत तुकाराम महाराजजी ने भी ३७८ वर्ष पहले ‘तुकाराम गाथा’ में बताया है :

उत्तमकुळीं जन्म क्रिया अमंगळ ।

बुडविलें कुळ उभयतां ।।

 – तुकाराम गाथा, अभंग ३९०७, ओवी २

अर्थ : कलियुग में लोग ऊंचे कुल में जन्म तो लेंगे; परंतु उनके कर्म अत्यंत बुरे अथवा अमंगल होंगे । इससे वे अपने पूर्वजों तथा स्वयं के, दोनों कुलों का नाम खराब करेंगे ।

तुका म्हणे ऐसी कलयुगाची चाली ।

स्वार्थे बुडविलीं आचरणें ।।

– तुकाराम गाथा, अभंग ३९०७, ओवी ३

अर्थ : कलियुग की रीति ही ऐसी है कि प्रत्येक मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए अपना अच्छा आचरण और नैतिकता भूल जाएगा ।

निष्कर्ष

यह उदाहरण यहां केवल एक उदाहरणस्वरूप दिया गया है । ऐसे अनेक प्रमाण संतों ने ४०० वर्ष पूर्व ही दे दिए थे । आज हम वही दुरवस्था देख रहे हैं । इसलिए संतों की दृष्टि में ‘आपातकाल’ शब्द बहुत व्यापक है, यह केवल युद्ध अथवा प्राकृतिक आपदाओं तक सीमित नहीं है ।

अतः, जब संत किसी सूत्र को बार-बार बताते हैं, तो उसके पीछे के कार्यकारण भाव (कारण एवं प्रभाव) को समझकर आचरण करना बहुत महत्त्वपूर्ण होता है । यदि हम केवल बुद्धि से प्रत्येक बात का विश्लेषण करने लगेंगे, तो संतों के कथन के पीछे का वास्तविक कारण कभी समझ नहीं आएगा । उनके बताए अनुसार कार्य न करने से हम अपने जीवन की हानि ही करेंगे ।

– श्री. योगेश जलतारे

 

४. जीवन में होनेवाली हानि टालने के लिए संतों के आज्ञापालन की वृत्ति आवश्यक !

कभी-कभी संत कोई बात बताते हैं और हम उसे आचरण में लाते हैं; किन्तु समय बीतने पर जब संत दूसरी ही बात बताते हैं, तो मन में यह प्रश्न उठता है – ‘पहले अलग क्यों कहा था ?’ कुछ लोगों के मन में यह भी नकारात्मक विचार आता है कि ‘संतों की बात मानकर भी कुछ विशेष नहीं हुआ और हमारी हानि हो गई’; क्योंकि बाह्य रूप से ऐसा दिखाई नहीं देता । परंतु ‘उस माध्यम से संतों ने हमारा कितना प्रारब्ध क्षीण किया’, यह हमें ज्ञात नहीं हो सकता ।

साधकों को अधिकाधिक समय तक साधना करने का अवसर मिले, इसके लिए संत अपने प्रत्येक श्वास का त्याग करते हुए आपातकाल को रोकने का प्रयत्न करते हैं, जिससे आपातकाल साधक के जीवन में आए ही नहीं । उन्होंने हमारे संरक्षण के लिए क्या किया, यह बुद्धि से परे है । स्थूल दृष्टि से देखें तो इससे हमारे भीतर संतों की बात मानने का संस्कार विकसित होता है; क्योंकि यदि आज हमें संतों की आज्ञा मानने की आदत हो जाएगी, तो जब वास्तविक आपातकाल आएगा अथवा उसका स्वरूप अधिक विकराल होगा, तब हम सहज ही उनका निर्विकल्प आज्ञापालन कर सकेंगे ।

भगवान श्रीकृष्ण के समय उन्होंने गोप-गोपियों को पहले गोकुल छोडकर वृंदावन जाने के लिए कहा । आगे कंस वध के पश्चात जब जरासंध बार-बार आक्रमण करने लगा, तब श्रीकृष्ण लोगों को मथुरा से द्वारका ले गए । उस समय गोप-गोपियों ने उनकी आज्ञा का पालन किया । इस प्रसंग का हमें स्मरण होना चाहिए और उसी प्रकार आचरण करने का अभ्यास करना चाहिए ।

आपातकाल संबंधी संतों के मार्गदर्शन का यदि हम केवल बुद्धि से विश्लेषण करेंगे, तो हम सही निर्णय लेने में चूक सकते हैं; क्योंकि हमें काल की गति का ज्ञान नहीं होता, जबकि संत काल के परे जाकर मार्गदर्शन करते हैं । इसलिए भविष्य में होनेवाली हानि से बचने के लिए संतों के निर्देशानुसार अभी इसी क्षण साधना आरंभ करना अत्यंत आवश्यक है ।

५. अध्यात्म में विवेकपूर्ण श्रद्धा आवश्यक है !

 कुछ लोग प्रतिदिन थोडे-बहुत धार्मिक कर्मकांड करते हैं और समझते हैं कि इतना पर्याप्त है तथा ईश्वर ही हमारी रक्षा करेंगे । यह सत्य है कि ईश्वर रक्षा करते हैं; परंतु उसके लिए उनका भक्त होना आवश्यक है; क्योंकि ‘न मे भक्तः प्रणश्यति’ (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ९, श्लोक ३१) अर्थात ‘मेरा भक्त नष्ट नहीं होता’, ऐसा उनका वचन है ।

भक्ति निरंतर साधना से उत्पन्न होती है । ‘भक्ति कैसे बढाएं ?’ इसका मार्गदर्शन स्वयं ईश्वर ही विभिन्न संत-महात्माओं के माध्यम से करते हैं । यह समझकर हमें उनके आदेशों का पालन करना चाहिए । अध्यात्म में जागरूक एवं विवेकपूर्ण श्रद्धा आवश्यक है । केवल भाव पर्याप्त नहीं है, अपितु संतों और गुरुओं के मार्गदर्शन को सुनकर उसके अनुसार निरंतर आचरण करना आवश्यक है । उसी से उनकी कृपा प्राप्त होती है ।

‘संतवचनों का मर्म समझकर उसके अनुसार आचरण करने की बुद्धि हम सभी को प्राप्त हो’, ऐसी गुरुचरणों में प्रार्थना !

– श्री. योगेश जलतारे, संपादक, ‘सनातन प्रभात’ प्रसारमाध्यम समूह. (१४.३.२०२६)