भारतीय संस्कृति में काल-विभाजन का कोई भी प्रारंभ दिवस अत्यंत पवित्र माना जाता है । इसीलिए ऐसी तिथियों पर स्नान, दान आदि धर्मकृत्यों का विधान बताया गया है । अक्षय तृतीया के दिन पवित्र जल में स्नान, भगवान श्रीविष्णु की पूजा, जप, होम, दान एवं पितृ-तर्पण किया जाता है । इस दिन ‘अपिंडक श्राद्ध’ करना चाहिए और यदि वह संभव न हो, तो कम से कम तिल-तर्पण अवश्य करना चाहिए ।

१. उदककुंभ (कलश) का दान
इस दिन देवताओं और पितरों के निमित्त ब्राह्मण को जल से भरे कलश (उदककुंभ) का दान करना चाहिए ।
१ अ. महत्त्व : उदककुंभ को ‘सर्वसमावेशक स्तर का निर्गुण पात्र’ माना जाता है ।
२. उद्देश्य
अ. उदककुंभ का दान देने का अर्थ यह है कि कुंभ में स्थित जल को पवित्र मानकर उसमें स्वयं की सभी प्रकार की देहसदृश, साथ ही कर्मसदृश वासनाएं समर्पित करना ! इस प्रकार स्वयं की देह को आसक्तिविहिन कर्म से शुद्ध बनाकर उसके उपरांत इन सभी वासनाओं को ब्राह्मण को ईश्वर एवं पूर्वज मानकर समर्पित करना !
आ. पूर्वजों के चरणों में उदककुंभ दान देने से तथा पूर्वज मनुष्ययोनि से संबंधित होने से वे हमारी स्थूल वासनाएं नष्ट कर देते हैं ।
इ. ईश्वर का कृपाशिर्वाद प्रारब्धजन्य सूक्ष्म कर्म से लगे पाप नष्ट करता है; इसलिए सूक्ष्म कर्मजन्य वासनाएं इस दान के माध्यम से ईश्वर के चरणों में अर्पित की जाती हैं ।
३. उदककुंभ दान का मंत्र
ब्राह्मण को उदककुंभ का दान देते समय निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करें ।
एष धर्मघटो दत्तो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः ।
अस्य प्रदानात् तृप्यन्तु पितरोऽपि पितामहाः ।।
गन्धोदकतिलैर्मिश्रं सान्नं कुम्भं फलान्वितम् ।
पितृभ्यः सम्प्रदास्यामि अक्षय्यमुपतिष्ठतु ।। – धर्मसिन्धु
अर्थ : ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव जिसमें समाए हुए हैं, ऐसा धर्मकलश मैंने ब्राह्मण को दान दिया है । इस दान के कारण मेरे पूर्वज एवं देवता तृप्त हों । गंध, उदक, तिल, यव (जौ) एवं फलों से युक्त यह कुंभ मैं पूर्वजों के लिए दे रहा हूं । यह कुंभ मेरे लिए सदैव अक्षय (क्षय न होनेवाला) सिद्ध हो ।
४. अध्यात्मशास्त्र
अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्मांड में अखंड रूप से स्थित, साथ ही एक समान गतिजन्यता दर्शानेवाले सत्व-रज तरंगों का प्रभाव अधिक मात्रा में होता है, इसलिए इन तरंगों के प्रवाह के माध्यम से ईश्वर एवं पूर्वजों को संबोधित कर ब्राह्मण को दिया जानेवाला दान पुण्यकारक सिद्ध होता है । पूर्व जन्म के लेन-देन हिसाब को ध्यान में रखकर यह कर्म-अकर्म होता है, अत: कभी भी क्षय न होनेवाली तरंगों के प्रभाव की सहायता से दिया जानेवाला दान महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है ।
५. मृत्तिका पूजन
सदोदित कृपादृष्टि रखनेवाली मृत्तिका के कारण ही हमें धनलक्ष्मी, अनाजलक्ष्मी एवं वैभवलक्ष्मी की प्राप्ति होती है । अक्षयक्षय तृतीया का यह दिन तो कृतज्ञभाव रखकर ऐसी मृत्तिका की उपासना करने का दिन होता है !
– ज्योतिषी राहुल नारायणराव पुराणिक एवं ज्योतिषी आकाश नारायणराव पुराणिक, जालना (महाराष्ट्र)
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