Sabarimala Temple : धार्मिक परंपरा में परिवर्तन करने से पूर्व उस धर्म के विद्वानों का मत लें ! – केरल सरकार

  • शबरीमला मंदिर में १० से ५० आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश प्रकरण में केरल सरकार ने बदली अपनी भूमिका

  • ​सर्वोच्च न्यायालय में ९ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष होगी सुनवाई

तिरुवनंतपुरम् (केरलम्) – केरल के प्रसिद्ध शबरीमला मंदिर में १० से ५० वर्ष के आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर लगी अनेक वर्षों की परंपरागत रोक को सर्वोच्च न्यायालय की ५ न्यायाधीशों की खंडपीठ ने ४ एवं १ मत के अंतर से वर्ष २०१८ में निरस्त कर दिया था । न्यायालय ने इस प्रतिबंध को असंवैधानिक घोषित करते हुए सभी आयु वर्ग की महिलाओं के लिए मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी । उस समय पिनराई विजयन के नेतृत्व वाली केरल सरकार ने इस निर्णय का दृढता से समर्थन किया था, जिसके कारण संपूर्ण राज्य में तीव्र आंदोलन हुआ था । अब इस प्रकरण की ९ न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा पुनरावृत्ति (सुनवाई) होगी तथा इस बार केरलम् सरकार ने अपनी भूमिका परिवर्तित कर ली है । पूर्व में न्यायालय के निर्णय को कठोरता से कार्यान्वित करने पर अडिग रही सरकार ने अब यह पक्ष लिया है कि ‘किसी भी परिवर्तन से पूर्व धर्म के विद्वानों तथा समाज सुधारकों का मत लेना आवश्यक है’ ।

​श्रद्धा को तर्क की कसौटी पर न परखें ! – केरल सरकार

​१४ मार्च को सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत किए गए लिखित उत्तर में केरल सरकार ने कहा है कि, ‘न्यायिक पुनरावलोकन करते समय कोई धार्मिक प्रथा तर्कसंगत है या नहीं ?, अथवा भावनाओं के अनुकूल है या नहीं ?, इस पर विचार नहीं करना चाहिए । इसके स्थान पर यह देखना चाहिए कि क्या वह श्रद्धा निष्ठापूर्वक धर्मपालन का अंग मानी जाती है ? अनेक वर्षों से प्रचलित धार्मिक परंपरा में परिवर्तन करने से पूर्व उस धर्म के प्रतिष्ठित विद्वानों तथा मान्य समाज सुधारकों का मत लेना न्याय की दृष्टि से आवश्यक है ।’

वर्ष २०१८ के निर्णय के विरुद्ध प्रविष्ट (दाखिल) पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए नवंबर २०१९ में ५ न्यायाधीशों की खंडपीठ ने ३ व २ मतों के अंतर से कहा था कि , इस निर्णय का प्रभाव अन्य धर्मों पर भी पड़ सकता है, अतः अधिक गहन विचार आवश्यक है । बड़ी खंडपीठ के निर्णय आने तक पुनर्विचार याचिकाओं को प्रलंबित रखा जाए ।

इसके पश्चात यह प्रकरण ९ न्यायाधीशों की संविधान पीठ को प्रेषित किया गया है, जहां आगामी ७ महत्वपूर्ण प्रश्नों पर निर्णय होगा :

​१. संविधान के अनुच्छेद २५ एवं २६ के अंतर्गत धर्मिक स्वतंत्रता तथा भाग ३ के अन्य प्रावधानों का परस्पर संबंध क्या है ?

२. अनुच्छेद २५(१) में उल्लेखित ‘सार्वजनिक सुव्यवस्था, नैतिकता तथा स्वास्थ्य’ की सीमाओं की व्याप्ति क्या है ?

३. अनुच्छेद २५ एवं २६ में प्रयुक्त ‘नैतिकता’ शब्द का अर्थ तथा विस्तार क्या है, तथा क्या इसमें संवैधानिक नैतिकता को सम्मिलित किया जाना चाहिए ?

४. आवश्यक धार्मिक प्रथाओं की पहचान के संदर्भ में न्यायिक पुनरावलोकन की व्याप्ति एवं सीमाएं क्या हैं ?

५. अनुच्छेद २५(२)(ब) में प्रयुक्त ‘हिन्दुओं का वर्ग’ इस अभिव्यक्ति का अर्थ क्या है ?

६. क्या अनुच्छेद २६ के अंतर्गत आवश्यक धार्मिक प्रथाओं को संरक्षण प्राप्त है ?

७. क्या कोई व्यक्ति उस धार्मिक संप्रदाय से संबंधित न होते हुए भी जनहित याचिका प्रविष्ट कर उस संप्रदाय की प्रथा पर प्रश्न उपस्थित कर सकता है ?

​संवैधानिक नैतिकता के विषय में भूमिका

​केरल सरकार ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत धारणाओं को बदलकर नैतिकता निर्धारित नहीं की जा सकती । इसे समानता, भेदभाव उन्मूलन एवं अस्पृश्यता निवारण जैसे संवैधानिक सिद्धांतों से जोड़ा जाना चाहिए । तथापि, यदि कोई प्रथा विधि (कानून) के विरुद्ध अथवा सामाजिक शिष्टाचार के प्रतिकूल हो, तो उसे धर्म के नाम पर मान्यता नहीं दी जा सकती ।

​शबरीमला मंदिर में प्रवेश की परंपरा क्या है ?

​शबरीमला मंदिर में भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी स्वरूप में पूजे जाते हैं । इसी परंपरा के कारण १० से ५० वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध था । भक्तों की श्रद्धा के अनुसार, देवता के ब्रह्मचर्य तथा तपस्या की ऊर्जा को अक्षुण्ण रखने हेतु रजस्वला आयु वर्ग की महिलाओं का प्रवेश वर्जित माना जाता है ।

​संपादकीय भूमिका

यही भूमिका सरकार ने इस आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश देने का निर्णय लेते समय क्यों नहीं अपनाई ? इससे यही सिद्ध होता है कि ‘साम्यवादी केरल सरकार हिन्दुओं की प्रथा-परंपराओं को ध्वस्त करना चाहती है’ !*