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गैरसैंण (उत्तराखंड) – यद्यपि ‘नमामि गंगे’ परियोजना हिन्दुओं के लिए पूज्य गंगा नदी के शुद्धीकरण हेतु नियोजित की गई है, तथापि वह अनेक गुणा प्रदूषित ही होती दिखाई दे रही है । नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, अर्थात ‘कैग’ का इस संदर्भ में देवप्रयाग से हरिद्वार तक के क्षेत्र में गंगा के जल की स्थिति बताने वाला प्रतिवेदन आया है । इसके अंतर्गत गंगा नदी के जल में रोगों के लिए अनुकूल वातावरण बनाने वाले ‘कोलिफॉर्म’ जीवाणुओं की मात्रा ३२ गुणा अधिक पाई गई । इसके अतिरिक्त अनेक अपशिष्ट जल शुद्धीकरण संयंत्र (STP) राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण द्वारा निर्धारित मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं, ऐसा भी संज्ञान में आया है । यह लेखा परीक्षण वर्ष २०१८ से २०२३ की अवधि में उत्तराखंड में ‘नमामि गंगे’ उपक्रम के कार्यान्वयन की समीक्षा करते समय किया गया ।
🚨 CAG Report Exposes Alarming Pollution in Maa Ganga 🌊
📊 ‘Coliform’ bacteria levels in the Ganga are 32 times higher than the permissible limit.
⚠️ Key Findings:
▪️ Administrative negligence highlighted in the report
▪️ Only 16% of funds under the Namami Gange initiative… pic.twitter.com/GrpVr8yWKw— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) March 12, 2026
प्रतिवेदन के महत्वपूर्ण सूत्र !
१. लगभग ३२ प्रतिशत अपशिष्ट जल शुद्धीकरण संयंत्रों से बिना शुद्धीकरण के सीधे गंगा में विसर्जित किया जा रहा है ।
२. गंगा के तट पर स्थित नगरों में इस योजना के अनेक घटक उचित प्रकार से कार्यान्वित नहीं किए गए हैं ।
३. परियोजना के अंतर्गत वृक्षारोपण से संबंधित कार्यों में भी अपेक्षित प्रगति नहीं हुई है । योजना हेतु निर्धारित व्यय में से लगभग १६ प्रतिशत राशि का ही प्रभावी उपयोग किया गया है ।
४. दूषित जल एवं बुरी स्वच्छता के कारण अनेक गंभीर रोग फैल सकते हैं । इसमें अतिसार (डायरिया), प्रवाहिका (पेचिश), ‘हेपेटाइटिस ए’, आंत्रज्वर (टाइफाइड) तथा पोलियो जैसे रोग सम्मिलित हैं ।
संपादकीय भूमिका
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