कर्नाटक के कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या की मद्य (शराब) की दावत का वरिष्ठ पत्रकार दिनेश अमीन मट्टू ने किया समर्थन

बेंगलुरु (कर्नाटक) – मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या द्वारा कुछ दिन पूर्व ही पत्रकारों के लिए आयोजित बजट-पूर्व मद्य की दावत इस समय राज्य की राजनीति एवं सामाजिक माध्यमों में चर्चा का विषय बनी हुई है । इस विवाद पर मुख्यमंत्री के पूर्व माध्यम परामर्शदाता एवं वरिष्ठ पत्रकार दिनेश अमीन मट्टू ने प्रतिक्रिया देते हुए ऐसी दावतों का पूर्णरूप से समर्थन किया है । उन्होंने कहा कि, “यदि किसी कार्यरत पत्रकार को मद्य पीने की आदत है तथा उसने कभी किसी राजनेता के साथ मद्य नहीं पी है, तो वह पत्रकार ही नहीं है ।”
‘अंदर के’ समाचारों के लिए दावतों में जाना आवश्यक !
मट्टू ने कहा कि राजनेताओं तथा पत्रकारों के बीच इस प्रकार की दावतों का संबंध आज का नहीं है, अपितु यह दोनों व्यवसायों के आरंभ होने के समय से ही चलता आया है । पत्रकार सम्मेलनों में केवल आधिकारिक समाचार ही मिलते हैं; किंतु समाचार के पीछे का वास्तविक सत्य एवं रहस्य ऐसे भोजन एवं मद्य की दावतों में ही सामने आते हैं । मद्य पीने के बाद व्यक्ति कुछ भावुक तथा स्पष्टवादी हो जाता है । उस समय उससे निकलनेवाली पुरानी स्मृतियां तथा वास्तविक घटनाएं एक व्यवसायिक संवाददाता के लिए अत्यंत मूल्यवान जानकारी होती हैं । केवल चाय या नींबू का रस लेकर ऐसी गहराईवाले समाचार एकत्र करना संभव नहीं है ।
Journalism or PR? 🤔
“There isn’t a journalist who doesn’t drink with politicians!” 🥃🚫
– Senior journalist Dinesh Amin Mattu defending CM Siddaramaiah’s liquor party.Drinking may be a personal choice, supporting it in this manner is wrong.
When alcohol and “envelopes”… pic.twitter.com/JXDkJFs1jo
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) March 11, 2026
उन्होंने यह भी कहा कि यह ‘संस्कृति’ केवल सिद्धरामय्या से आरंभ नहीं हुई है । कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री देवराम उर्स भी वरिष्ठ पत्रकारों को बुलाकर महंगी मद्य के साथ भोजन करवाते हुए विचार-विमर्श करते थे । पूर्व केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार भी दिल्ली में पत्रकारों के लिए मद्य की दावत आयोजित करते थे; किंतु वे स्वयं केवल नींबू का रस लेकर बैठते थे । यह रोचक प्रसंग भी मट्टू ने बताया ।
सरकारी कोष से धन नहीं जाता
मट्टू के अनुसार सिद्धरामय्या को मद्य का विशेष रुचि नहीं है । जब वे विपक्ष के नेता थे, तब वे मद्य नहीं पीते थे । पिछले कुछ वर्षों में मद्य के प्रति उनका संकोच कुछ कम हुआ है तथा दावतों में वे केवल एक छोटा घूंट लेते हैं । इसके पश्चात सभी से बातचीत करके वहां से चले जाते हैं । उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी दावतों के लिए सरकारी कोष से धन व्यय नहीं होता, अपितु कोई मंत्री उसका व्यय वहन करता है । (मंत्री यह धन कहां से लाते हैं, यह जनता को अलग से बताने की आवश्यकता नहीं ! – संपादक)
(और इनकी सुनिए…) ‘मद्य की दावत का चित्र लेकर प्रसारित करनेवाला पत्रकार दायित्वहीन !’
मट्टू ने कहा कि उनके कार्यकाल में वे इस बात का ध्यान रखते थे कि ऐसी दावतों में मद्य की बोतलें तथा गिलास कैमरे की दृष्टि में न आएं । मुख्यमंत्री द्वारा दावत आयोजित करना कोई अपराध नहीं है; किंतु वहां उपस्थित किसी पत्रकार द्वारा उन निजी क्षणों का चित्र लेकर उसे सामाजिक माध्यमों पर प्रसारित करना अपराध भले न हो, परंतु यह निश्चित ही सभ्य आचरण नहीं है । इस विषय में दिनेश अमीन मट्टू ने तीव्र अप्रसन्नता व्यक्त की ।
संपादकीय भूमिकामद्य पीना या न पीना यह प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता है; किंतु उसका इस प्रकार समर्थन करना अनुचित है । राजनेता मद्य पिलाकर एवं पैसों के लिफाफे देकर पत्रकारों को अपना पक्षधर बना लेते हैं तथा ऐसे पत्रकार किस प्रकार की पत्रकारिता करते हैं, यह जनता भलीभांति जानती है ! |
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