(टिप्पणी : केस स्टडी अर्थात किसी व्यक्ति का गहन परीक्षण)
‘हमें शारीरिक कष्ट होने पर हम भौतिकोपचार विशेषज्ञ (‘फिजियोथेरपिस्ट’) के पास जाते हैं । वहां हमारे कष्ट के अनुसार उपचार दिए जाते हैं । विशिष्ट उपचारों के उपरांत कष्ट के अनुसार व्यायाम भी करने के लिए कहा जाता है । रोगी को बताया गया व्यायाम नियमितरूप से कर कुछ दिन पश्चात भौतिकोपचार विशेषज्ञ को ब्योरा देना पडता है । उसके कारण भौतिकोपचार विशेषज्ञ रोगी की पुनः जांच करता है तथा उस रोगी को अगले चरण के व्यायाम बताता है । रोगी चरणबद्ध पद्धति से उसकी क्षमता में सुधार लाकर कष्ट से मुक्त होने लगता है; परंतु अनेक बार ऐसा ध्यान में आता है कि रोगी ये व्यायाम नियमित नहीं करता । व्यायाम करने पर तात्कालिक रूप से कष्ट अल्प होने पर रोगी व्यायाम करना बंद कर देता है तथा उससे उस रोगी में सुधार दिखाई नहीं देता । ‘रोगी को कौन-से व्यायाम करने चाहिए ? उन्हें कैसे करना चाहिए ? उपचारों की दिशा क्या होनी चाहिए ?’, इन विषयों में भौतिकोपचार विशेषज्ञ उसका मार्गदर्शन करता है; परंतु ‘बताए गए व्यायाम नियमित करते रहना’ उस रोगी का ही दायित्व होता है ।
अनाज चुनने की सेवा करनेवाली ६५ वर्ष की एक साधिका का व्यायाम उल्लेखनीय है । उन्होंने पूरा जीवन खेती में अथक परिश्रम के काम किए थे । ‘भारी वस्तुएं उठाने तथा निरंतर झुककर काम करने’ के कारण उनके शरीर को परिश्रम करने की आदत थी । उनकी मांसपेशियां मूलतः ही सशक्त थीं; परंतु अब उनके नित्यक्रम में परिवर्तन आने से उनकी बैठी जीवनशैली बन गई थी ।

१. साधिका की जांच करने पर ध्यान में आए सूत्र

अ. उन्हें गर्दन नीचे झुकाकर निरंतर ५ – ६ घंटे बैठकर अनाज चुनना पडता था, जिसके कारण उनकी पीठ, कंधों एवं गर्दन पर बहुत तनाव था ।
आ. इस तनाव के कारण उनकी मांसपेशियों में संवेदनशील बिंदु (Trigger Points) उत्पन्न हो गए थे ।
इ. उनमें ‘फ्रोजन शोल्डर्स’ के (अकडे हुए कंधे के) सदृश लक्षण दिखाई दे रहे थे ।
ई. वे अपने दोनों कंधों को पूर्ण रूप से ऊपर नहीं ले पा रही थीं ।
उ. उनकी पीठ के ऊपरी भाग में तथा बाजू की मांसपेशियों में बहुत कडकपन (spasm) था । उसके कारण हल्के से दबाने पर भी उनकी मांसपेशियों में बहुत पीडा (Tenderness) हो रही थी ।
२. साधिका द्वारा सकारात्मक रहकर भौतिकोपचार विशेषज्ञ द्वारा बताए व्यायाम नियमितरूप से तथा निरंतर करना
‘निरंतर एक ही स्थिति में गर्दन नीचे झुकाकर अनाज चुनने के लिए बैठना, बैठी जीवनशैली एवं व्यायम का अभाव’ उनकी इस पीडा के कारण थे । मैंने उनके कष्ट के लिए आवश्यक भौतिकोपचार किए तथा उन्हें उनके कष्ट के अनुरूप व्यायाम करने के लिए कहा । साधिका ने मेरे बताए व्यायाम नियमितरूप से किए । उन्होंने प्रामाणिकता के साथ व्यायाम की दिनचर्या का पालन किया तथा उसमें नियमितता रखी । उनकी एक और विशेषता यह कि वे व्यायाम के संदर्भ में सदैव सकारात्मक थीं । इस साधिका को उपचारों के समय भले ही पीडा होती थी, तब भी उसकी ओर देखने की उनकी दृष्टि सकारात्मक थी । इसके परिणामस्वरूप कुछ ही दिन में उनकी पीडा अल्प होती गई तथा उनकी गतिविधियों में सुधारा आने लगा ।
३. व्यायाम करने पर साधिका को हुए लाभ
अ. पहले १०० अंश कोण से ऊपर जानेवाले उनके दोनों हाथों को अब १८० अंश कोण से ऊपर ले जाना उन्हें संभव होने लगा ।
आ. वे अब उनके कंधे भी ऊपर ले जा पा रहे थे तथा उनके कंधों की गतिविधि भी सहज होने लगी ।
इ. गतिविधि करते समय व दबाने पर उन्हें होनेवाली पीडा लक्षणीय रूप से घट गई ।
ई. मांसपेशियों में शक्ति एवं लचीलापन बढा ।
उ. मांसपेशियों में स्थित संवेदनशील बिंदु (Trigger points) एवं कडापन दूर हुआ ।
४. ‘केस स्टडी’ से स्पष्ट हुए सूत्र
इस उदाहरण से यह स्पष्ट होता है, ‘किसी की आयु भले ही अधिक हो, तब भी मन से सकारात्मक रहकर नियमित रूप से उचित व्यायाम करने के कारण उसके शरीर में सुधार आ सकता है ।’ व्यायाम केवल १-२ दिन करने से नहीं, अपितु नियमित करने से ही शरीर में उचित सुधार आते हैं ।
इसके लिए भौतिकोपचार विशेषज्ञ द्वारा (‘फिजियोथेरपिस्ट’ द्वारो) दी गई व्यायाम की दिनचर्या का पालन कर बीमारियों से शीघ्र मुक्त होने के लिए प्रयास करेंगे ! आत्मनिर्भर बनेंगे !’
– श्रीमती अक्षता रूपेश रेडकर, भौतिकोपचार विशेषज्ञ (फिजियोथेरेपिस्ट), फोंडा, गोवा. (२७.१२.२०२५)
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