मनुष्य के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर ग्रहों के प्रभाव !

‘सूर्यमाला के ग्रह विशिष्ट सूक्ष्म ऊर्जाओं के वाहक हैं । वे मनुष्य के अंतःकरण पर अर्थात, वैकल्पिक रूप से, प्रायः व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं । व्यक्ति के विचार एवं कृत्य उसके व्यक्तित्व पर आधारित होते हैं । ग्रह मनुष्य के व्यक्तित्व के किन पहलुओं को दर्शाते हैं, इस लेख के द्वारा हम इसे समझ लेते हैं ।

११ जनवरी को प्रकाशित लेख में हमने ‘ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ग्रहों के महत्त्व’ का भाग देखा । उसके साथ ही हमने ‘मनुष्य के व्यक्तित्व पर ग्रहों की विशिष्ट ऊर्जाओं का प्रभाव’ में समाहित कुछ सूत्र पढे । आज यहां इस लेख का अंतिम भाग दे रहे हैं ।

(भाग २)

२. मनुष्य के व्यक्तित्व पर ग्रहों की विशिष्ट ऊर्जा के प्रभाव

२ ऊ. जीव की आंतरिक आकांक्षा दर्शानेवाला रवि : ‘ज्योतिषशास्त्र में चंद्रमा बाह्यमन की चंचल इच्छाएं दर्शाता है, जबकि रवि अंतर्मन की स्थिर एवं सूक्ष्म आकांक्षा दर्शाता है । जीव की आंतरिक आकांक्षा उसे जीवन की सत्यता, उदात्तता, व्यापकता, ज्ञान, प्रीति आदि उच्चतम तत्त्वों की ओर आकर्षित करती है । यह भान मनुष्य को उसके जीवन की सार्थकता ढूंढने के लिए प्रेरित करती है । इस भान के कारण मनुष्य में अल्पसंतुष्टि नहीं आती तथा उससे वह अधिकाधिक उन्नति करने के लिए उत्सुक होता है । मंगल एवं रवि, ये दोनों ग्रह अग्नितत्त्व से संबंधित ग्रह हैं; परंतु मंगल ग्रह रज-तमोगुणी है तथा वह बाह्यमन की चंचल कामनाओं की पूर्ति के लिए आवश्यक शक्ति की आपूर्ति करता है, जबकि रवि ग्रह सत्त्व-रजोगुणी है, जो अंतर्मन की सूक्ष्म लगन की पूर्ति के लिए आवश्यक चैतन्य की आपूर्ति करता है । जीव की चेतना को अगले स्तर तक ले जाने में रवि की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है ।

श्री. राज कर्वे

२ ऊ १. अन्य ग्रहों से रवि का योग : कुंडली में रवि केअन्य ग्रहों के साथ योग से व्यक्ति की उच्च लक्ष्य की ओर अग्रसर होने की लगन किस स्वरूप की है, इसका बोध होता है ।

अ. यदि रवि शुक्र के साथ है, तो व्यक्ति प्रेम, सौंदर्य, विविधता आदि के माध्यम से जीवन का अर्थ ढूंढता है ।

आ. यदि रवि मंगल के साथ है, तो व्यक्ति शक्ति, कार्य, दायित्व आदि के द्वारा व्यापक बनने का प्रयास करता है ।

इ. यदि रवि बृहस्पति के साथ है, तो ऐसे व्यक्ति में ज्ञान, चिंतन, अध्ययन आदि के माध्यम से जीवन का सत्य जानने की उत्कंठा होती है ।

ई. यदि रवि शनि के साथ है, तो व्यक्ति सेवा, त्याग, समर्पण आदि के द्वारा जीवन की सार्थकता ढूंढता है  ।

२ ए. महानता के कारक बृहस्पति : बृहस्पति ग्रह आकाशतत्त्व से संबंधित हैं । उसके कारण महानता उनकी विशेषता है । जीवन के महान सिद्धांत, उदा. धर्म, नीतिमूल्य, न्याय, ज्ञान आदि पर बृहस्पति ग्रह का प्रभाव है । बृहस्पति ग्रह मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाता है । बृहस्पति ग्रह का स्थायीभाव है ‘विवेक’ । मनुष्य की बुद्धि सात्त्विक होने पर उसमें विवेक प्रकट होता है । उसके कारण मनुष्य को उचित-अनुचित, सत-असत, धर्म-अधर्म आदि में स्थित अंतर जान पाना संभव होता है । विवेक के कारण मनुष्य में संयम, सामंजस्य, विचारशीलता, चिंतनशीलता, समभाव, अन्यों का विचार, प्रीति आदि सद्गुण उत्पन्न होते हैं । इन सद्गुणों के कारण मनुष्य की चेतना व्यापक होती है । चेतना व्यापक होने से उसके ज्ञान एवं आनंद में वृद्धि होती है । बृहस्पति ग्रह वयस्कता से संबंधित है । व्यक्ति की आयु के अनुसार उसके अनुभव बढते जाते हैं तथा अनुभवों के कारण उसमें परिपक्वता आती है ।

२ ए १. अन्य ग्रहों के साथ बृहस्पति का योग : कुंडली में बृहस्पति के अन्य ग्रहों के साथ योग से, व्यक्ति को व्यापकता की ओर अग्रसर होने का संकेत मिलता है ।

अ. यदि बृहस्पति बुध के साथ है, तो व्यक्ति जिज्ञासा, वाचन, मनन, अध्ययन आदि के माध्यम से स्वयं को परिपक्व बनाता है ।

आ. यदि बृहस्पति शुक्र के साथ है, तो प्रेमभाव, भक्ति, अन्यों का विचार आदि के माध्यम से व्यक्ति ईश्वर के निकट जाता है ।

इ. यदि बृहस्पति मंगल के साथ है, तो समष्टि के हित में कार्य करने के माध्यम से व्यक्ति व्यापकता की ओर अग्रसर होता है ।

ई. यदि बृहस्पति रवि के साथ है, तो व्यक्ति अध्ययन, अध्यापन, मार्गदर्शन, ज्ञान आदि के द्वारा समाज का मार्गदर्शन करता है ।

उ. यदि बृहस्पति शनि के साथ है, तो व्यक्ति त्याग, निष्कामता, सेवा आदि के द्वारा समाज के साथ एकरूप होता है ।

२ ऐ. त्याग के कारक शनि : शनि ग्रह वायुतत्त्व से संबंधित है । उसके कारण ‘अनासक्ति’ एवं ‘त्याग’ उनकी विशेषताएं हैं । बृहस्पति ग्रह के कारण व्यक्ति विवेकशील एवं ज्ञानी होता है, जबकि शनि ग्रह के कारण वह अंतर्मुख एवं त्यागी होता है । उसे ‘मेरे चित्त में स्थित कामनाएं एवं इच्छाएं अल्प हुए बिना ‘शांति’ एवं ‘आत्मिक संतुष्टि’ की अनुभूति नहीं होगी’, इसका भान होने से उसे त्याग करने की प्रेरणा मिलती है । उसमें निष्कामता, सेवाभाव, त्यागी वृत्ति एवं समर्पणभाव उत्पन्न होते हैं अर्थात वह अहंशून्यता की ओर अग्रसर होने लगता है । उसके कारण वास्तव में उसके चित्त की शुद्धि होने से उसे शांति एवं यश की प्राप्ति होती है । शनि ग्रह जीवन की वृद्धावस्था दर्शाता है । वृद्धावस्था में शारीरिक दुर्बलता के कारण तथा पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्व अल्प होने के कारण, साथ ही जीवन में सभी प्रकार के अनुभव होने के कारण ऐसे व्यक्ति में वैराग्य शीघ्र उत्पन्न हो सकता है ।

२ ऐ १. अन्य ग्रहों के साथ शनि के योग एवं उससे होनेवाले लाभ : कुंडली में अन्य ग्रहों के साथ शनि के योगों के कारण व्यक्ति के त्याग का स्वरूप समझ में आता है ।

अ. यदि शनि चंद्रमा अथवा बुध के साथ है, तो व्यक्ति में चंचलता, आवेगपन एवं दृढनिश्चय अल्प होता है ।

आ. यदि शनि शुक्र के साथ है, तो व्यक्ति विलासीनता, भावनाशीलता, व्यक्तिनिष्ठा आदि का त्याग करता है ।

इ. यदि शनि रवि के साथ है, तो व्यक्ति मान-सम्मान, प्रसिद्धि, अधिकार आदि का त्याग करता है ।

ई. यदि शनि बृहस्पति के साथ है, तो व्यक्ति केवल बौद्धिक स्तर पर न रहकर वह अध्यात्म का क्रियान्वयन करने का प्रयास करता है ।

२ ओ. मुक्तिकारक केतु : अव्यक्त होना, लय (मुक्त) करना, सूक्ष्मतत्त्व की ओर अग्रसर होना आदि कार्य केतु ग्रह के हैं । उसके कारण केतु ग्रह का स्वभाव अंतर्मुख है तथा उसकी गति ‘बाहर से अंदर’ इस प्रकार की है । केतु की दृष्टि में आत्मा एवं पृष्ठभाग की अपेक्षा सारगर्भ का, स्थूलता की अपेक्षा आत्मा का तथा अनेकता की अपेक्षा एकता का अधिक महत्त्व है । उसके कारण केतु को मुक्तिदायक एवं मोक्षदायक कहा जाता है । ईश्वर अपने द्वारा व्यक्त समस्त सृष्टि के व्यापार को पुनः स्वयं में समा लेते हैं । केतु ईश्वर की लयकारी शक्ति है । केतु ग्रह भौतिक वस्तुएं नहीं देता, जबकि भौतिक वस्तुओं का त्याग कराता है तथा जीव को लेकर उसके मूल स्वरूप की ओर जाता है । (केतु में तडप है उस अमृतत्व को पाने की जो उसे नहीं मिल पाई । केतु जिस स्थान में बैठता है व जिस ग्रह के साथ होता है, उन वस्तुओं से विरक्त कर देता है ।)

२ ओ १. अन्य ग्रहों के साथ केतु का योग तथा उसके कारण होनेवाले लाभ : कुंडली में केतु के अन्य ग्रहों के साथ योग से यह पता चलता है कि व्यक्ति किन बातों के माध्यम से स्वयं को अंतर्मुख बनाएगा ।

अ. यदि केतु बुध के साथ है, तो व्यक्ति विचार, जिज्ञासा आदि के द्वारा स्वयं को अंतर्मुख बनाएगा ।

आ. यदि केतु शुक्र के साथ है, तो व्यक्ति ईश्वरभक्ति, ईश्वर के साथ आंतरिक सान्निध्य आदि के द्वारा स्वयं को अंतर्मुख बनाएगा ।

इ. यदि केतु मंगल के साथ है, तो व्यक्ति दूसरों के लिए कार्य, ईश्वर के लिए कर्म आदि के द्वारा स्वयं को अंतर्मुख बनाएगा ।

ई. यदि केतु बृहस्पति के साथ है, तो व्यक्ति आत्मज्ञान, विवेक आदि के द्वारा स्वयं को अंतर्मुख बनाएगा ।

२ औ. हर्षल एवं नेपच्यून : ‘हर्षल’ ग्रह का आविष्कार १८वीं शताब्दी में, जबकि ‘नेपच्यून’ ग्रह का आविष्कार १९वीं शताब्दी में हुआ । हर्षल ग्रह नाविन्यता, आधुनिकता, शोधकार्य आदि का कारक है, जबकि नेपच्यून ग्रह संवेदनशीलता, सूक्ष्मता, आंतरिक प्रेरणा आदि का कारक है ।

२ औ १. हर्षल एवं नेपच्यून ग्रहों के कारण मिलनेवाला ज्ञान : आध्यात्मिक दृष्टि से विचार किया जाए, तो हर्षल एवं नेपच्यून अंतर्ज्ञान अथवा सूक्ष्म ज्ञान से संबंधित ग्रह हैं । साधना के कारण व्यक्ति का अंतःकरण सात्त्विक होकर उसकी चेतना व्यापक हो जाती है । उसके कारण विश्वमन एवं विश्वबुद्धि से उसे ज्ञान प्राप्त होता है । यह ज्ञान दैवीय, अचूक एवं अनुभूतिजन्य होता है । हर्षल एवं नेपच्यून इस प्रकार का सूक्ष्म ज्ञान दर्शाते हैं । कुंडली में अच्छे आध्यात्मिक योगों के साथ यदि चंद्रमा, बुध, शुक्र, रवि, बृहस्पति आदि का हर्षल एवं नेपच्यून के साथ शुभयोग है, तो ऐसे व्यक्ति को सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त होने की संभावना होती है ।

३. भौतिक प्रकृतिवाले एवं आध्यात्मिक प्रकृतिवाले ग्रह

उक्त विवेचन से यह ध्यान में आता है कि चंद्रमा, बुध, शुक्र, मंगल एवं राहू भौतिक प्रकृति के ग्रह हैं; जबकि रवि, बृहस्पति, शनि, केतु, हर्षल एवं नेपच्यून आध्यात्मिक प्रकृतिवाले ग्रह हैं । चंद्रमा, बुध, शुक्र, मंगल एवं राहू जीवन की नींव को दर्शाते हैं, उदा. संस्कार, प्रवृत्ति, इच्छा, आकांक्षा, आकलनशक्ति, क्रियाशक्ति आदि । इन बातों पर ही व्यक्तित्व की मूलभूत चौखट आधारित होती है; जबकि रवि, बृहस्पति, शनि, केतु, हर्षल एवं नेपच्यून ग्रह, जीवन के सत्य एवं अर्थ को ढूंढने के लिए जीव को प्रेरित करते हैं । इन ग्रहों के कारण व्यक्ति व्यापक, विवेकशील एवं सत्यनिष्ठ बनता है ।

४. कुंडली में विद्यमान विभिन्न ग्रह जीव की आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग दिखानेवाले दिशादर्शक !

इस प्रकार जन्मकुंडली में स्थित ग्रहयोगों से व्यक्ति के व्यक्तित्व का अच्छे ढंग से बोध होता है । कुंडली के जिन ग्रहों के एक-दूसरे के साथ महत्त्वपूर्ण योग होते हैं, उन ग्रहों से संबंधित शक्तियां अथवा विशेषताएं उस व्यक्ति में सुस्पष्ट होती हैं ।

व्यक्ति की कुंडली के ग्रहयोगों से यह ध्यान में आता है कि स्वयं का आत्मिक विकास कराने की व्यक्ति की कितनी क्षमता है तथा उसका मार्ग कौन-सा है । ग्रहयोगों से यह ध्यान में आ सकता है कि व्यक्ति की जन्मजन्मांतर की यात्रा में उसकी जीवात्मा वर्तमान जीवन में किस स्तर तक पहुंची है तथा आगे की उन्नति हेतु व्यक्ति का मार्गदर्शन किया जा सकता है । इस प्रकार विशिष्ट ऊर्जा का वहन करनेवाले ग्रह जीव के आत्मिक विकास के मार्गदर्शक हैं !’        (समाप्त) ॐ

– श्री. राज कर्वे, ज्योतिष विशारद, महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा. (१०.११.२०२५)