
मुंबई – अभिभावक छात्रों को मातृभाषा से शिक्षा दें । विदेशी भाषाओं का उपयोग करना टालें । घर में बच्चों के साथ मातृभाषा में बात करें । मातृभाषा का उपयोग बढना चाहिए । ‘मम्मी-डैडी’ बोलने की अपेक्षा ‘माता-पिता’ कहकर ही बुलाना चाहिए, ऐसा प्रतिपादन प.पू. सरसंघचालक डॉ. मोहनजी भागवत ने किया । यहां के वरली डोम में चल रही २ दिवसीय व्याख्यानमाला में प्रथम व्याख्यान देते हुए वे ऐसा बोल रहे थे ।
सामाजिक समरसता, स्वबोध, परिवार उद्बोधन एवं संविधान इन पर आधारित नागरिक कर्तव्यों का पालन करें !
इस अवसर पर प.पू. सरसंघचालक ने आगे कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को यदि जान लेना हो, तो उसके लिए संघ शाखाओं का अनुभव करें । संघ की शाखा, कार्यकर्ता, शिविर आदि का सूक्ष्म निरीक्षण करने से आप संघ को यथार्थरूप में समझ पाएंगे । चाहे कितने भी आरोप लगे अथवा आलोचना हो, तब भी संघ का कार्य निरंतर चलता रहता है । संघ को प्रसिद्धि का मोह नहीं है । सामाजिक समरसता, स्वबोध, परिवार उद्बोधन एवं संविधान पर आधारित नागरिक कर्तव्यों के पालन पर बल दें ।
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