वर्तमान में लोग ‘मोदी-शाह की कब्र खुदेगी’, ऐसे नारे सुनकर क्षोभ व्यक्त कर रहे हैं । यह क्षोभ अनुचित नहीं है; परंतु दुर्भाग्यवश वह केवल ऊपरी नारेबाजी तक ही सीमित है । वास्तव में यह विषय किसी नारे का नहीं, अपितु साम्यवादियों द्वारा देश की संप्रभुता को निरंतर दी जा रही चुनौती का है ।

१. उमर खालिद एवं शरजिल इमाम के द्वारा देश की संप्रभुता को मिटाने की भाषा
वर्ष २०१६ में उमर खालिद ने देश के टुकडे करने की, जबकि वर्ष २०२० में शरजिल इमाम ने असम राज्य को भारत से तोडने की भाषा बोली थी तथा ‘चिकन नेक पर (ईशान्य के ७ राज्यों को जोडनेवाला संवेदनशील क्षेत्र) केवल मुसलमानों का अधिकार है’, खुलेआम ऐसा वक्तव्य दिया था ।

यह केवल सरकार की आलोचना की भाषा नहीं है, अपितु भारत की अखंडता, एकात्मता एवं सार्वभौम अस्तित्व को मिटा डालने की ही भाषा है ।

२. साम्यवादियों का झूठा आक्रोश – ‘उमर एवं शरजिल पर की जा रही कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध है’ !
उमर खालिद एवं शरजिल द्वारा ‘जामिया मुस्लिम स्टुडेंट्स’ जैसे वॉट्सएप समूहों के माध्यम से वर्ष २०२० के आंदोलनों का समन्वय करने की बात भी सामने आई । उनके आंतरिक संदेश, भाषण एवं रणनीति से यह स्पष्ट हुआ कि इसका उद्देश्य केवल विरोध करना नहीं था, अपितु पूरे देश में अस्थिरता उत्पन्न कर दंगे कराना था । उसके कारण ही ‘UAPA’ कानून के (गैरकानूनी प्रतिबंधक गतिविधियां कानून) के अंतर्गत उनकी जमानत रद्द की गई तथा सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस निर्णय को सही ठहराया । तब भी सार्वजनिक चर्चाओं में साम्यवादियों द्वारा इस सूत्र को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ अथवा ‘मतभिन्नता पर की जा रही कार्रवाई’ ही कहा जा रहा है ।
३. साम्यवादियों की व्यवस्था द्वारा बुद्धिभ्रम करने का प्रयास

कुछ दिन पूर्व ‘जे.एन.यू.’ में किए गए आंदोलन में साम्यवादी विचारधारावाले समूह ‘भगवा जला था, भगवा जलेगा जे.एन.यू. में’ के नारे लगा रहे थे । ये घटनाएं अपवादात्मक हैं अथवा वे कोई उपद्रव नहीं हैं, इसलिए उनकी अनदेखी की जाए, ऐसा नहीं हैं । यह एक संपूर्ण सांस्कृतिक एवं धार्मिक पहचान के प्रति खुलेआम द्वेष व्यक्त करनेवाली भाषा है । यही वक्तव्य यदि अन्य धर्म के विषय में किए गए होते, तो वे तुरंत ही ‘हेट स्पीच’ (द्वेषयुक्त भाषण) की श्रेणी में आ गए होते; परंतु यहां इन्हीं वक्तव्यों को प्रगत, प्रतिरोधी अथवा क्रांतिकारी कहकर देश में सर्वत्र फैलाया जा रहा है । इससे निरंतर एक दोहरा मापदंड दिखाई देता है । एक ओर हिन्दू संगठनों द्वारा की जानेवाली प्रत्येक कृति को धर्मांध, तानाशाही एवं संकटकारी ठहराया जाता है; परंतु साम्यवादी अथवा तथाकथित आधुनिकतावादियों के गुटों से बोली जानेवाली देशविरोधी अथवा हिन्दूविरोधी भाषा को सदैव संदर्भ, परिस्थिति एवं भावनाओं का आधार लिया जाता है । साम्यवादी ‘इकोसिस्टम (व्यवस्था), प्रसारमाध्यम एवं समाजमाध्यमों में सक्रिय उनका बुद्धिजीवी विचारवर्ग इसमें बडी भूमिका निभाता है । जानबूझकर ऐसा एक प्रारूप बनाया गया है कि ‘संघ, भाजपा अथवा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ ही हिन्दू-मुसलमान की राजनीति करते हैं । उसके कारण अन्य किसी भी पक्ष से की जानेवाली आक्रामकता, द्वेष अथवा विभाजनकारी भूमिका की अनदेखी करना अथवा उसे उचित ठहराना सरल हो जाता है ।
४. लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए सत्यनिष्ठा की आवश्यकता है
वास्तव में प्रश्न धर्म का नहीं, अपितु सत्यनिष्ठा का है । यदि राष्ट्र-विरोधी भाषा, हिंसक चुनौतियां एवं सांस्कृतिक घृणा अनुचित है, तो यह सभी ओर से अनुचित ही होनी चाहिए । यदि हम लोकतंत्र को बचाए रखना चाहते हैं, तो सच्चाई को अनदेखा नहीं कर सकते !
– श्रीमती शांभवी थिटे, विदेश नीति विशेषज्ञ, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली. (७.१.२०२५)
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