त्रिशूल की उत्पत्ति कैसे हुई ?

आपने अनेक देवताओं के हाथ में त्रिशूल देखे होंगे; परंतु उसकी दिव्य शक्ति तब द्विगुणित होती है, जब वह शिवजी के हाथ में होता है । त्रिशूल की ओर देखने पर हमें ३ तीक्ष्ण सिरे दिखाई देते हैं । यह अस्त्र संहार का प्रतीक है; परंतु वास्तव में त्रिशूल के पीछे गहन रहस्यमय अर्थ छिपा है । क्या आपको वह अर्थ ज्ञात है ? तो चलिए, आज हम उसकी जानकारी लेते हैं !

त्रिशूल की उत्पत्ति कैसे हुई ?

श्री. यशवंत नाईक

भगवान शिव को हम भोलेनाथ कहते हैं; क्योंकि वे तुरंत ही भक्त पर प्रसन्न होकर उसकी मनोकामना पूर्ण करते हैं । भगवान शिव की पूजा करने से सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है, ऐसा कहा जाता है; परंतु भगवान शिव अपने साथ त्रिशूल क्यों रखते हैं ? त्रिशूल भगवान शिव की शक्ति का प्रतीक है । अनिष्ट शक्तियों का नाश करनेवाले शस्त्र के रूप में शिवशंकर सदैव त्रिशूल अपने साथ रखते हैं ।

समुद्रमंथन के समय भगवान विष्णु से शिवजी को भेंट के रूप में त्रिशूल मिला । इसी संदर्भ में कुछ पौराणिक कथाओं में ऐसा भी बताया जाता है कि भगवान शिव को श्री दुर्गादेवी से त्रिशूल मिला था । शिवजी ने महिषासुर के विरुद्ध युद्ध में त्रिशूल का उपयोग किया ।

त्रिकालज्ञानी शंभूशंकर !

त्रिनेत्र, त्रिपुंड, ३ पत्तों का बेल तथा त्रिशूल के ३ सिरों से युक्त इस शंभूशंकर को ‘त्रिकालज्ञानी’ कहते हैं । त्रिशूल केवल ३ शूल (पाती) नहीं हैं, अपितु वह शिवशक्ति की ऊर्जा का प्रतीक है । शिव ऊर्जा तथा उसकी गति, साथ ही उसे नियंत्रित करनेवाली शक्ति, ये परस्पर कुछ इस प्रकार संलग्न हैं कि उसका एक उत्तम उदाहरण है त्रिशूल !

त्रिशूल के विषय में विष्णुपुराण क्या बताता है ?

‘विष्णुपुराण के अनुसार श्री विश्वकर्मा ने त्रिशूल की निर्मिति की ।’ इससे संबंधित एक पौराणिक कथा है । देवताओं के शिल्पी श्री विश्वकर्मा की पुत्री संजना का विवाह सूर्यदेव के साथ हुआ था; परंतु सूर्यदेव के असीम तेज से संजना को उनके साथ रहना संभव नहीं हो पा रहा था । उसके कारण कुछ काल उपरांत सूर्यदेव तथा पुत्रों के पास अपनी छाया रखकर वे वहां से चली गईं ।

जब यह घटना सूर्यदेव एवं श्री विश्वकर्मा को ज्ञात हुई, तब दोनों ने मिलकर उसका समाधान ढूंढने का निश्चय किया । श्री विश्वकर्मा ने सूर्यदेव को घिसकर उनका तेज थोडा-सा अल्प किया, जिससे संजना बिना किसी कष्ट के उनके साथ रह सके । इस तेज से श्री विश्वकर्मा ने सुदर्शनचक्र एवं त्रिशूल जैसे दैवीय शस्त्र तैयार किए । उन्होंने श्रीविष्णु को सुदर्शनचक्र तथा महादेव को त्रिशूल भेंट किया ।

त्रिशूल के ३ सिरों का अर्थ है ३ शक्तियां !

शिवपुराण में ऐसा कहा गया है कि विश्व के आरंभ में भगवान शिव ब्रह्मनाद से प्रकट हुए । उस समय उनके साथ सत्त्व, रज एवं तम, ये तीन गुण भी प्रकट हुए । इन ३ गुणों के मिलने से शिवशूल तैयार हुआ, जिससे त्रिशूल उत्पन्न हुआ । इस विश्व में ३ प्रकार की प्रवृत्तियां हैं – सत्त्व, रज एवं तम ! प्रत्येक मनुष्य में ये तीनों प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं । इन प्रवृत्तियों का स्तर प्रत्येक मनुष्य में भिन्न-भिन्न होता है । त्रिशूल के तीन सिरे इन ३ प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं । त्रिशूल के ३ सिरे ३ शक्तियां हैं । इस ब्रह्मांड का विचार किया जाए, तो उन्हें ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश मान लें । शक्ति में महागौरी, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती को ३ शक्तियां तथा इडा, पिंगला एवं सुषुम्ना, ये ३ नाडियां हैं । कुल मिलाकर शिवजी के हाथ में स्थित त्रिशूल इन्हीं बातों को दर्शाता है; इसलिए शिवजी हमें यह संदेश देते हैं कि इन तीन गुणों पर उनका नियंत्रण है । जब कोई कठिन स्थिति उत्पन्न होती है, तभी यह त्रिशूल उठाया जाता है । त्रिशूल पर लाल रंग का वस्त्र क्यों बंधा होता है ?

त्रिशूल पर सदैव लाल वस्त्र बंधा रहता है । इस विषय में पुराण में एक कथा बताई गई है । एक बार मंगल ग्रह ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की, जिससे भोलेनाथ प्रसन्न हुए । तब मंगल ग्रह ने वरदान मांगा, ‘आप मुझे सदैव अपने साथ रखें ।’ इस पर महादेव ने बताया कि वे किसी भी ग्रह को साथ नहीं रख सकते; परंतु मंगल ग्रह सुनने के लिए तैयार नहीं था । भगवान शिव द्वारा इसके लिए मना किए जाने पर मंगल ग्रह ने उनके किसी चिह्न, जो उनका प्रतीक है, उसके साथ जोडे रखने का वरदान मांगा तथा शिवजी ने वह वरदान दिया । तभी से त्रिशूल पर लाल रंग का वस्त्र बांधा जाता है, ऐसी मान्यता है ।

– श्री. यशवंत नाईक, मलेशिया