‘ईश्वर द्वारा मनुष्य को धर्म देने के कारण क्या हैं ?’ इस विषय में श्री. राम होनप को सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान !

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले

प्रश्न

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले : क्या धर्म इसलिए दिया गया है, कि मनुष्य वापस ईश्वर से एकाकार हो सके ? (२१.२.२०२५)

उत्तर

श्री. राम होनप

श्री. राम होनप :

१. आदिशक्ति का निर्माण

आदिशक्ति ने सर्वप्रथम त्रिगुणों (सत्त्व, रज, तम) का निर्माण किया तत्पश्चात उनके द्वारा ही पंचतत्त्वों का निर्माण किया । इन दोनों के द्वारा पृथ्वी का निर्माण हुआ है ।

२. मनुष्य पर त्रिगुणों के गुणधर्मों का परिणाम 

सत्त्वगुण के कारण व्यक्ति को उचित एवं अनुचित का ज्ञान होता है । रजोगुण के कारण व्यक्ति उत्तम प्रकार से कार्य कर सकता है । तमोगुण के कारण व्यक्ति को निद्रा आती है । यदि इन तीनों गुणों का संतुलन बना रहे, तो व्यक्ति का जीवन उत्तम प्रकार से चलता है ।

३. सत्ययुग में जीवों का आचरण ही धर्म का प्रतीक 

पृथ्वी की रचना के समय उत्पन्न हुए स्त्री एवं पुरुष अपने जीवन में निरंतर आनंद एवं शांति का अनुभव कर रहे थे । उस काल के जीवों को शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक कष्ट नहीं थे । उनके आचरण ईश्वरीय प्रेरणा एवं धर्म के अनुसार होते थे, इसलिए उनके आचरण ही धर्म के प्रतीक थे ।

४. ईश्वर द्वारा सत्ययुग में ‘धर्म’ को ग्रंथ रूप में प्रकट करना

प्रीतिस्वरूप एवं कृपास्वरूप होने के कारण, ईश्वर ने उस काल में विद्यमान ऋषियों को ग्रंथरूप में धर्म को प्रकट करने की प्रेरणा दी । तदनुसार, ऋषियों ने ‘धर्म क्या है ? इसे कैसे जीना है ? इसका महत्त्व क्या है ?’— इस संदर्भ में ईश्वरीय ज्ञान को ग्रंथरूप में लिखकर रखा । ईश्वर ने ऋषियों के माध्यम से पृथ्वी पर धर्म संबंधी ज्ञान प्रकट किया, जिससे ‘आगे चलकर जब व्यक्ति में सत्त्वगुण अल्प (कम) होकर रज-तम बढेगा, जिससे व्यक्ति अशांत, रोगी तथा दिशाहीन हो जाएगा, तब ऐसे जीवों को पुनः आनंदमय जीवन प्राप्त हो तथा उन्हें ईश्वर की ओर जाने का मार्ग मिल सके ।’

५. सत्ययुग की मध्यावधि के पश्चात त्रिगुणों का संतुलन बिगडना

काल गति के अनुसार व्यक्ति के मन पर त्रेता, द्वापर एवं कलियुग में रज-तम की प्रबलता और बढने लगी । त्रिगुणों का संतुलन बिगडने से, अर्थात सत्त्वगुण अल्प होकर रज-तम की प्रबलता बढने से, सर्वप्रथम व्यक्ति का  मनोबल तथा उसके उपरांत आत्मबल अल्प होता गया । इससे व्यक्ति में बेचैनी, अशांति एवं दुःख बढते गए, जिससे व्यक्ति द्वारा किए गए अनुचित कर्मों के कारण अधर्म होने लगा । परिणामस्वरूप व्यक्ति का सर्वांगीण पतन हुआ तथा वह दिशाहीन हो गया ।

६. ज्ञानी जीवों द्वारा सनातन धर्म का प्रसार करना 

सत्ययुग की मध्यावधि के पश्चात सत्त्वगुण अल्प होकर धीरे-धीरे रज-तम की प्रबलता बढने लगी । कालांतर में रज-तम बढने के कारण सामान्य लोगों के लिए धर्मग्रंथों का ज्ञान समझना एवं उसे आचरण में लाना कठिन होने लगा । तब ज्ञानी जीवों ने ऋषियों द्वारा लिखे गए धर्मग्रंथों का प्रसार करना तथा उसे सामान्य जीवों की समझ में आनेवाली भाषा में बताना आरंभ किया ।

७. जीवन में गुरु का महत्त्व

त्रेतायुग के कुछ जीवों ने धर्म के आधार पर आचरण करते हुए ईश्वरप्राप्ति की । उन जीवों को धर्म का पूर्ण ज्ञान था । गुरुरूप में उन्होंने समाज को धर्मग्रंथों के ज्ञान का अर्थ एवं विश्लेषण बताना आरंभ किया । गुरु के इस कार्य के कारण सामान्य लोगों को ‘अपना आचरण धर्म के अनुसार कैसा होना चाहिए ? स्वयं में सत्त्वगुण को बनाए रखकर रज-तम गुणों का त्याग कैसे करना चाहिए ? भगवान की उपासना कैसे करनी चाहिए ?’, यह समझ में आने लगा ।

८. ईश्वर का ‘धर्मग्रंथ एवं गुरु’ के रूप में कार्य करना

व्यक्ति में त्रिगुणों का अनुपात निरंतर परिवर्तित होता रहता है । ऐसे में व्यक्ति को धर्म के अनुसार जीवन जीने का विस्मरण हो जाता है, जिससे  उसका पतन होने लगता है ।
‘साधक रज-तम के चक्रव्यूह में न फंसें’, इसके लिए ईश्वर ने ऋषियों के रूप में धर्मग्रंथों के माध्यम से ज्ञान प्रकट किया तथा गुरुरूप में आकर उसे साधकों को समझाया । इससे साधकों को जीवन जीने की दिशा मिली । परिणामस्वरूप साधकों की आध्यात्मिक प्रगति हुई एवं उन्हें आनंदमय जीवन प्राप्त हुआ, तथा अंत में उन्हें ईश्वर की प्राप्ति हुई ।

९. ईश्वर कब आदिशक्ति के कार्य में हस्तक्षेप करते हैं ?

आदिशक्ति सत्त्व, रज एवं तम, इन गुणों के द्वारा पृथ्वी का कार्य चलाती है । इन गुणों के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति तथा लय होता रहता है, साथ में युग परिवर्तन भी होता रहता है । आदिशक्ति का यह कार्य निरंतर चलता रहता है । इस प्रक्रिया को ईश्वर साक्षी रूप में देखते रहते हैं ।

ईश्वर भक्तवत्सल, प्रीतिपूर्ण एवं कृपास्वरूप हैं । वे साधक अथवा भक्त के कल्याण के लिए आदिशक्ति के कार्य में हस्तक्षेप करते हैं । ईश्वर ‘अवतार, ऋषि, गुरु एवं धर्मशास्त्र’ के रूपों में कार्य करते हैं तथा भक्तों का कल्याण करते हैं ।

– श्री राम होनप (सूक्ष्म से प्राप्त हुआ ज्ञान), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा। (ज्ञान प्राप्त होने की तिथि, समय और कुल अवधि : 19.9.2025, सुबह 10:35 बजे, 10 सेकंड)

  • सूक्ष्म (Subtle) : व्यक्ति के स्थूल (प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले) अवयव नाक, जीभ, आंखें, त्वचा एवं कान, ये पंचज्ञानेंद्रियां हैं । इन पंचज्ञानेंद्रियों को, मन एवं बुद्धि से परे जो कुछ भी है, उसे ‘सूक्ष्म’ कहते हैं । साधना में प्रगति किए हुए कुछ व्यक्तियों को ये ‘सूक्ष्म’ संवेदनाएं अनुभूत होती हैं । विभिन्न धर्मग्रंथों में इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञान का  उल्लेख है ।
  • सूक्ष्म-जगत (Subtle World) : वह जगत जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रियों (नाक, जीभ, आंखें, त्वचा एवं कान) को ज्ञात नहीं होता; परंतु साधना करनेवाले व्यक्ति को उसके अस्तित्व का ज्ञान होता है, उसे ‘सूक्ष्म-जगत’ कहते हैं ।
  • सूक्ष्म में दिखना, सुनाई देना आदि (पंच ज्ञानेंद्रियों से ज्ञानप्राप्ति होना – Perception through the five subtle organs) : कुछ साधकों की अंतर्दृष्टि जागृत हो जाती है, अर्थात उन्हें वह दिखता है जो आंखों से दिखाई नहीं देता (सूक्ष्म में देखना), तो कुछ लोगों को सूक्ष्म नाद अथवा शब्द सुनाई देते हैं (सूक्ष्म में सुनना) ।
  • सूक्ष्म-परीक्षण (Subtle Analysis) : किसी घटना अथवा प्रक्रिया के विषय में चित्त (अंतर्मन) को जो अनुभव होता है , अथवा ज्ञात होता है, उसे ‘सूक्ष्म-परीक्षण’ कहते हैं ।
  • यहां प्रकाशित अनुभूतियां ‘भाव तेथे देव’ (जहां भाव है, वहां भगवान है), इस उक्ति के अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूतियां हैं । यह आवश्यक नहीं कि ये अनुभूतियां सभी को हों ! – संपादक