
‘२२.१२.२०२५ को सनातन की संत पू. (स्व.) श्रीमती निर्मला दातेजी ने देहत्याग किया । बचपन से ही उन्हें देवता एवं धर्म में बहुत रुचि थी । विवाह के पश्चात ससुराल में पुणे आने पर उनमें अध्यात्म के प्रति आकर्षण एवं सेवावृत्ति भी बढी । बच्चों को अच्छे संस्कार मिलें, इसके लिए वे निरंतर प्रयत्नशील रहती थीं ।

सनातन के संपर्क में आने पर उन्हें अगले चरण का अध्यात्म समझ में आया, उसके पश्चात उन्होंने स्वयं ही कर्मकांड के अनुसार पुरानी साधना न्यून (कम) कर दी । पू. दातेजी के कारण उनका पूरा परिवार पूर्णकालीन साधना करने लगा तथा पुणे का उनका घर आश्रम में परिवर्तित हो गया । मैं जब पुणे जाता था, तब उनके ही घर में रहता था । पू. दातेजी अत्यंत आतिथ्यशील थीं, सभी कृतियां वे बहुत ही भावपूर्ण पद्धति से तथा प्रेमपूर्वक करती थीं । वे ‘त्याग एवं प्रेमभाव’ का प्रत्यक्ष उदाहरण थीं । वर्तमान में पुणे में अध्यात्म के प्रसारकार्य में बडे स्तर पर वृद्धि हुई है; परंतु उसकी नींव रखने का कार्य पू. दातेजी एवं दाते परिवार ने ही किया है । ‘श्रद्धा, निरपेक्ष प्रीति, त्यागी वृत्ति, सदैव अन्यों का विचार करना एवं आंतरिक साधना’, इन गुणों के बल पर दातेजी ने तीव्र गति से आध्यात्मिक उन्नति की । वर्ष २०१० में उन्होंने ६१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त किया तथा केवल ५ वर्ष में ही अर्थात २०१५ में ७१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर प्राप्त कर वे सनातन के ‘संत’ पद पर विराजमान हुईं ।
नवंबर २०२२ से वे रामनाथी, गोवा के सनातन आश्रम में रहने के लिए आई थीं । पिछले डेढ वर्ष से वे अर्धमूर्छित (आधी बेहोशी की) स्थिति में थीं; परंतु इस अवस्था में भी उनकी आंतरिक साधना जारी थी । उनकी साधना के कारण उनकी देह में अनेक सकारात्मक परिवर्तन आए । पू. दातेजी निर्गुण स्थिति की ओर अग्रसर थीं तथा इस संदर्भ में अनेक साधकों को अनुभूतियां भी हुई थीं । केवल जागृतावस्था में ही नहीं, अपितु अर्धमूर्छित स्थिति में भी साधना कर सभी साधकों के सामने आदर्श स्थापित करनेवाली पू. (स्व.) श्रीमती निर्मला दातेजी ने ८१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर तक पहुंचकर सनातन का ‘सद्गुरु’ पद प्राप्त किया है ।
दिन-रात सद्गुरु (स्व.) दातेजी की भावपूर्ण सेवा करनेवाले तथा उनकी बीमारी के समय में पूरा दिन नामजपादि उपचार करनेवाले उनके परिजन भी प्रशंसा के पात्र हैं । उनकी भी आध्यात्मिक उन्नति तीव्र गति से हो रही है ।
‘साधना की तीव्र लगन, भाव एवं निरपेक्ष प्रीति’, इन गुणों से युक्त सद्गुरु (स्व.) दातेजी की आगे की साधना भी तीव्र गति से होती रहेगी, इसके प्रति मैं आश्वस्त हूं ।’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले (३०.१२.२०२५)
सद्गुरु की विशेषता !
‘साधक जब आध्यात्मिक उन्नति कर ७० प्रतिशत अथवा उससे अधिक आध्यात्मिक स्तर प्राप्त करते हैं, तब उन्हें ‘संत’ कहा जाता है । संतों का आध्यात्मिक स्तर ८० प्रतिशत होने पर उन्हें ‘सद्गुरु’ पद तथा ९० प्रतिशत से अधिक आध्यात्मिक स्तर प्राप्त करने पर उन्हें ‘परात्पर गुरु’ पद प्राप्त होता है । ‘सद्गुरु’ एवं ‘परात्पर गुरु’ ईश्वर का जीवंत रूप होते हैं ! वे साधकों को तैयार करते हैं तथा उनकी आध्यात्मिक उन्नति करवा लेते हैं । उन्होंने उच्च आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त की होती है तथा उनका जीवन ईश्वरेच्छा से व्यतीत होता है । सनातन के सद्गुरुओं का कार्य अब चैतन्य के स्तर पर चल रहा है तथा वह अधिकाधिक व्यापक एवं सूक्ष्म स्तर पर हो रहा है । साधको, आनंद एवं शांति के स्तरों पर स्थित सद्गुरुओं के चैतन्य का लाभ उठाकर आप तीव्र गति से स्वयं की आध्यात्मिक उन्नति कर लो !’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. आठवले (३०.१२.२०२५)

सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी के ओजस्वी विचार
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