Jaipur Dialogues SHATRUBODH : तीन दिन में ४२ सत्र संपन्न – ‘शत्रुबोध’ एवं ‘आत्मबोध’ इन विषयों पर विचारमंथन !

‘जयपुर डाइलॉग्ज २०२५’का समापन

एक सत्र में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए बाईं ओर से शहजाद पूनावाला, अभिजीत अय्यर मित्रा एवं तहसीन पूनावाला

जयपुर (राजस्थान) – राष्ट्रवादी वातावरण में संपन्न ‘जयपुर डाइलॉग्ज २०२५’ इन ३ दिवसीय विचारगोष्ठी का ९ नवंबर को समापन हुआ । ‘शत्रुबोध’ एवं ‘आत्मबोध’ इन केंद्रीभूत विषयों पर संपन्न कुल ४२ सत्रों में विचारक, राजनेता, रक्षा विशेषज्ञ एवं हिन्दुत्वनिष्ठों ने देश से संबंधित चिंतनीय सूत्र, सांस्कृतिक एवं सुरक्षा से संबंधित नीतियों पर गहन विचारमंथन किया । इन सत्रों में धर्मांतरण, भ्रष्टाचार, शिक्षाव्यवस्था, रक्षा निर्भरता एवं संकल्पनाजन्य राजनीति के अनेक पहलू सामने आए ।

संस्कृति के विरोध से संबंधित शत्रुबोध – इतिहास का सच्चा लेखाजोखा किया जाए !

‘सिविलाइजेशन शत्रुबोध’ (संस्कृति के विरोध से संबंधित) इस सत्र में डॉ. ओमेंद्र रत्नू, शेफाली वैद्य, एस्थर धनराज, संदीप बालकृष्ण एवं कार्तिक गौर ने ऐतिहासिक झूठी कहानियों के विरोध में आग्रहपूर्ण भूमिका रखी । उन्होंने कहा कि इतिहास के विकृतिकरण के कारण हिन्दू समाज की असीमित हानि हुई । उसके कारण सांस्कृतिक गर्व को टिकाए रखने पर बल देना आवश्यक है, साथ ही हिन्दुओं का इतिहास पुनः लिखना समय की मांग है ।

कार्यक्रम में उपस्थित विशेषज्ञ एवं हिन्दुत्वनिष्ठ

राजकीय शत्रु एवं राष्ट्रभेदी नीतियां

‘देश का विभाजन करने के इच्छुक राजनेताओं की आलोचना’, इस सत्र में तुहीन सिन्हा, पल्लवी घोष, अभिजीत अय्यर मित्रा, शहजाद पूनावाला, बाबा रामदास, बी.डी. मुंदडा एवं पत्रकार अभिषेक तिवारी ने इतिहास के संदर्भ देकर सनातन धर्म के विरोधियों द्वारा तथा पिछली कांग्रेस की सरकार के द्वारा तथा गांधी परिवार द्वारा किया गया जातिवाद, भेदभाव एवं असमानता के सूत्र रखकर विरोधियों की पोल खोल दी ।

शत्रु : शत्रु की पहचान कर ली जाए तथा उसके अनुरूप नीतिनिर्धारण किया जाए, यह आग्रह

चौथे सत्र में आर्. जगन्नाथ, भाऊ तोरसेकर, अवनीश पी.एन्. शर्मा, तहसीन पूनावाला, ‘ जयपुर डाइलॉग्ज’ के अध्यक्ष संजय दीक्षित एवं अनुपम मिश्रा ने शत्रुओं की पहचान कर लेने के उपरांत उन्हें निर्णायक, कानूनी एवं रणनीतिक जवाब देने की आवश्यकता पर बल दिया । इस सत्र में यह भी बताया गया कि शत्रु की पूर्णरूप से पहचान कर उसके विरुद्ध समन्वित नीति निर्धारित करना आवश्यक है । इस सत्र में ‘डिजिटल अखंड भारत’, इस उपक्रम के अंतर्गत ‘वर्ल्ड फास्ट एआई फॉर सनातन’ इस सनातन धर्म की जानकारी देनेवाले ‘एप’ का लोकार्पण किया गया ।

आत्मनिर्भर रक्षा : तकनीक पर आधारित परिवर्तन अनिवार्य

‘आत्मनिर्भर डिफेंस (रक्षा)’, इस सत्र में लेफ्टनेंट जनरल डी.पी. पांडेय, कर्नल मयंक चौबे, कर्नल अजय रैना एवं मेजर जनरल सुधाकर जी. (सभी सेवानिवृत्त सेनाधिकारी) ने युद्धकला में आए परिवर्तन तथा आधुनिक तकनीक के उपयोग पर बल दिया । उन्होंने बताया कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’में गोलीबारी के स्थान पर तकनीक का निर्णायक उपयोग किया गया तथा नौसेना के ‘मेक इन इंडिया’ के अंतर्गत बनी नौका का उपयोग महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ । प्रशासनिक व्यवस्था को अब पूर्व सेनाधिकारियों की मांगों को गंभीरता को समझ लेकर उचित दिशा पकडनी चाहिए, यह संदेश इस सत्र से दिया गया ।

शिक्षा विभाग : विदेशी शिक्षा पर पुनः विचार होना आवश्यक

‘इंडियंस कमिंग बैक टू भारत ?’ (भारतीयों का पुनः भारत वापस आना) इस विषय पर आयोजित चर्चा में संक्रांत सानू, सी.के. राजू, राज वेदम एवं विजय सरदाना ने बताया कि हमारी शिक्षाव्यवस्था मुघलों एवं उसके उपरांत ब्रिटिशों के कार्यकाल में पिछड गई; परंतु स्वतंत्रता के ८ दशकों में भी हम उसे पुनर्संचयित नहीं कर सकते । हमारी गुरुकुल व्यवस्था समाप्त हो चुकी है । हमारा इतिहास केवल दुर्बल ही नहीं हुआ है, अपितु वह विकृत भी हुआ है । उसके परिणामस्वरूप भारत की शैक्षणिक प्रतिभा विदेशों को समृद्ध करने हेतु स्थानांतरित हो रहीह ै । चीन प्रत्येक क्षेत्र में स्थित हमारे (भारत के) सर्वाेत्तम प्रतिभाओं को पहचान कर लेता है तथा उन्हें अलग से प्रशिक्षण देकर ‘सुपर स्पेशलिस्ट’ (अत्यंत प्रतिभावान) बनाता है । जब तक अन्य देश भारत को वैश्विक नेता के रूप में नहीं पहचान लेता, तब तक भारत को काम करने की आवश्यकता है ।