३ दिवसीय ‘जयपुर डायलॉग २०२५’का आरंभ

जयपुर (राजस्थान) – हमारे शत्रु कहीं बाहर नहीं हैं, इसे हमें समझ लेना आवश्यक है । स्वतंत्रतापूर्व काल में इतिहासकारों ने सत्य को छिपाए बिना इतिहास लिखा; परंतु स्वतंत्रता के उपरांत मार्क्सवाद के प्रभाव में आकर इतिहास को विकृत बनाया गया । हमारी वास्तविक परंपराओं तथा सांस्कृतिक दृष्टि को हटाकर नई विकृति रची गई । जेएनयु एवं अलीगढ जैसे विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों से मूल भारतीय इतिहास ही गायब हुआ । उसके कारण आज हमें यह समझ लेना होगा कि हमारे शत्रु हमारे विचारविश्व में ही छिपे हुए हैं, ऐसा प्रतिपादन प्रसिद्ध इतिहासकार एवं राज्यसभा सासंद (राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित) मीनाक्षी जैन ने किया । ७ से ९ नवंबर की अवधि में जयपुर में आयोजित प्रसिद्ध ‘जयपुर डायलॉग २०२५’सम्मेलन में ‘शत्रुबोध’ इस विषय पर आयोजित सत्र में सांसद मीनाक्षी जैन ऐसा बोल रही थीं ।
🇮🇳 India is unique among ancient civilizations in that , 🔥“The Enemy is within” ! – Padma Shri Dr. Meenakshi Jain, Honorable Member of the Rajya Sabha, distinguished historian, political scientist and Professor at Gargi College, University of Delhi, speaking at… pic.twitter.com/8GYFYqtObf
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) November 8, 2025

सांसद मीनाक्षी जैन ने दीपप्रज्वलन कर इस सम्मेलन का उद्घाटन किया । सम्मेलन के पहले दिन मुख्य सभागारसहित विभिन्न स्थानों पर कुल १४ सत्र आयोजित किए गए । इस अवसर पर जयपुर डायलॉग के अध्यक्ष संजय दीक्षित द्वारा लिखित ‘ऑल रिलिजेंस आर् नॉट सेम ’, इस अंग्रेजी पुस्तक के ‘सभी धर्म समान नहीं’ इस हिन्दी संस्करण का लोकार्पण किया गया ।
🇮🇳 India Must Name, Expose & Confront Its Civilizational Enemies ⚔️
A Grand Congregation of Nationalists — #JaipurDialogue2025 themed on “Shatrubodh” begins in Jaipur 🕉️
🗣️ “It is essential to identify enemies to protect our identity & existence. We must awaken our sense of… pic.twitter.com/EL7XF8UU2m
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) November 8, 2025

प्रथम सत्र : संस्कृति के शत्रुओं की पहचान
‘भारत को अपनी संस्कृति के शत्रुओं को पहचानना चाहिए’, इस विषय पर पत्रकार भाऊ तोरसेकर, अनुपम मिश्रा, ओम्कार चौधरी, अभिषेक तिवारी एवं बाबा रामदास ने चर्चा की । वक्ताओं ने बताया कि भारत की विकास में बाधा उत्पन्न करनेवाली अनेक झूठी कहानियां (नैरेटिव) रचे जा रहे हैं तथा उनकी पोल खोलना ही सच्ची देशसेवा है ।
दूसरा सत्र : दक्षिण एशिया में चल रहीं राजनीतिक गतिविधियां
इस सत्र में बांग्लादेश, नेपाल एवं श्रीलंका में चल रही नई राजनीतिक गतिविधियों पर विचारमंथन किया गया । इसमें सहभागी वक्ताओं ने बताया कि ‘जेन-जेड’ (वर्ष १९९६ से वर्ष २०१० की अवधि में जन्मी पीढी) पीढी में स्थित असंतोष तथा भारत के कुछ राजनीतिक गुटों से उसका किया जा रहा उपयोग हमारे लिए एक चेतावनी है । हमें इन आंतरिक शत्रुओं के विषय में जागरूक रहना होगा ।
तीसरा सत्र : शिक्षा के द्वारा हो रही भारतविरोधी घुसपैठ
निजी संगठनों के चंदों से गैरसरकारी संगठनों की ओर से शिक्षा के माध्यम से फैलाई जा रही भारतविरोधी कल्पनाओं पर सांसद मीनाक्षी जैन, एस्थर धनराज, प्रा. भारत गुप्त, आभास मालदहियार, नीलेश ओक एवं कुंदन सिंह ने विचार रखे । उन्होंने बताया कि शिक्षाक्षेत्र में चल रहे विदेशी विचारधारावाले अभियानों को पहचानना तथा उन्हें जवाब देना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है ।
चौथा सत्र : देश के आंतरिक शत्रुओं का बोध
Watch live streaming of #TJD2025
The Jaipur Dialogues 2025 https://t.co/GTjlX5rMRj
— Sanatan Prabhat (@SanatanPrabhat) November 7, 2025
‘ब्रेकिंग इंडिया’ गुट, ‘टुकडे टुकडे’ गैंग, नक्सली एवं इस्लामी जाल इन विषयों पर संजय दीक्षित, नाजिया खान, अभिजीत मित्रा, अभिजीत चावडा, पंकज सक्सेना एवं अविनाश धर्माधिकारी ने अपने विचार रखे । उन्होंने खुलकर यह बताया कि देशविरोधी जाल ने केवल बाहरसे नहीं, अपितु हमारे प्रशासनिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी स्थान बना लिया है ।
भ्रष्टाचार एवं प्रशासन पर विचारमंथन
‘ओपन माइक’ सत्र में अविनाश धर्माधिकारी, उदय माहुरकर, सैवियो रॉड्रिग्स, राहुल सूर एवं संजय दीक्षित ने भाग लिया । उन्होंने बताया कि भ्रष्टाचार हमारे समाज एवं लोकतंत्र को लगा कैंसर है । शिक्षा एवं चरित्रनिर्माण ही भ्रष्टाचार का समाधान संभव है । शासनतंत्र में ‘राष्ट्र प्रथम’की भावना स्थापित करने हेतु शिक्षानीति बनानेवाले अधिकारियों में दृढता का होना आवश्यक है ।
नागरिक संस्कारों का अभाव
अभिजित अय्यर मित्रा, सुशांत सरीन एवं गर्वित ने चर्चा में बताया कि भारत में नागरिक अनुशासन (सिविक सेंस) अभी भी अल्प है । वह न सामान्य नागरिकों में हैं तथा न ही जनप्रतिनिधियों में है । लालबत्ती लालबत्ती (सिग्नल) पार करना, सडक पर कचरा फेंकना, सार्वजनिक स्थानों पर थूकने जैसी आदतों के कारण समाज त्रस्त होता है । समाज का नैतिक पतन हुआ है । तथाकथित उच्चशिक्षित लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हमारे देवताओं के विषय में अशोभनीय बातें करते हैं; परंतु अन्य धर्माें के विषय में बोलने का साहस नहीं दिखाते । छात्रावस्था में कुछ लोग शौचालयों पर, ऐतिहासिक स्थानों पर अश्लील बातें लिखते हैं, जो उनकी दुर्बल मानसिकता की पहचान है ।
हमें कालक्रम समझ लेना होगा !
अगले सत्र में वेदवीर आर्य, नीलेश ओक एवं संजय दीक्षित ने वैदिक गणनापर संवाद किया । उन्होंने बताया कि विगत २-३ शताब्दियों में हमारी परंपराओं का विकृतिकरण किया गया है । वेद एवं महाभारत में विद्यमान खगोलिय ज्ञान सत्य एवं विज्ञाननिष्ठ है । विश्व की किसी भी संस्कृति में नक्षत्रों की गणना नहीं है, जो भारत की विशेषतापूर्ण देन है । संस्कृत श्लोकों से ग्रंथों की कालगणना का तर्कशुद्ध स्पष्टीकरण मिलता है ।
सनातन एवं सामाजिक माध्यमों का प्रभाव
इस सत्र में कार्तिक गौर, विनोद कुमार एवं अनुज भारद्वाज ने चर्चा की । उन्होंने बताया कि ‘बंटोगे तो कटोगे’ (विभाजित होंगे, तो मारे जाओगे) का नारा भारत में और सैकडों वर्षाें तक सुनाई दे सकता है । सामाजिक माध्यम, फिल्म निर्माता, यू ट्यूबर (यू ट्यूब चैनल चलानेवाले) तथा प्रभावशाली व्यक्तियों की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ लोग स्वयं को हिन्दुत्व के प्रतिनिधि कहलाते हैं; परंतु वास्तव में वे हिन्दुत्व से बहुत दूर हैं । हिन्दुत्व ईसाईयत एवं इस्लामी मतों से संपूर्णरूप से भिन्न है । कथित पत्रकार एवं इतिहासकार भी इस अनुचित प्रवाह का अंश बन गए हैं । कुछ लोग ज्योतिष के माध्यम से हिन्दुत्व को अपकीर्त करते हैं, लोकप्रियता के लिए इतिहास एवं ृअध्यात्म की अनुचित व्याख्या करते हैं ।
वक्ताओं ने कहा कि आंतरिक सुरक्षा को सर्वाेच्च प्रधानता देना आवश्यक है । स्वतंत्रता का उपयोग लोकतंत्र को लाभ पहुंचाता है अथवा हानि ?’, इस पर विचार करने का अब समय आ चुका है ।
युवा पीढी पर सामाजिक माध्यमों का परिणाम
अंतिम सत्र में प्रियांक कानूनगो एवं हर्ष ने चर्चा की । उन्होंने बताया कि कुछ विदेशी शक्तियां सामाजिक माध्यमों से ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ (बिना विवाह किए पुरुष एवं स्त्री न करता पुरुष आणि स्त्री का एकत्र रहना) एवं अश्लीलता का महिमामंडन कर भारत की युवा पीढी को दिशाहीन बनाने का प्रयास कर रहे हैं । भारत के युवकों की औसत आयु २९ वर्ष है तथा देश में युवाओं की जनसंख्या ९० करोड है । अतः भारतीय विचारधारा पर आधारित स्वदेशी सामाजिक माध्यमों की निर्मिति समय की मांग है ।

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