तुलसी विवाह (कार्तिक शुक्ल द्वादशी [२ नवंबर] से कार्तिक पूर्णिमा [५ नवंबर]) के उपलक्ष्य में…

‘कार्तिक शुक्ल द्वादशी से लेकर पूर्णिमा तक किसी भी दिन तुलसी विवाह का अनुष्ठान किया जाता है । उस दृष्टि से इस लेख में हम ‘तुलसी दर्शन का महत्त्व, तुलसी की आध्यात्मिक विशेषताएं, प्रतिवर्ष श्रीकृष्ण के साथ तुलसी का विवाह कराने के संदर्भ में कथा, साथ ही ‘देवता को भोग लगाते समय तुलसी के पत्तों का उपयोग क्यों करना चाहिए ?’, इस संदर्भ में जानकारी दे रहे हैं ।
१. तुलसी दर्शन का महत्त्व
‘प्रत्येक हिन्दू के घर तुलसी होनी ही चाहिए’, ऐसा संकेत है । ‘सवेरे एवं सायंकाल में सभी को तुलसीदर्शन करना चाहिए’, ऐसा बताया गया है । इस तुलसीदर्शन का मंत्र इस प्रकार है –
तुलसि श्रीसखि शुभे पापहारिणि पुण्यदे ।
नमस्ते नारदनुते नारायणमनःप्रिये ।।
– तुलसीस्तोत्र, श्लोक १५
अर्थ : हे तुलसी, आप लक्ष्मीजी की सखी, शुभदा, पापहारिणी एवं पुण्यदा हैं । नारदजी द्वारा जिनकी स्तुति गाई गई है तथा श्री नारायण को प्रिय ऐसे आपको मैं प्रणाम करता हूं ।
२. तुलसी की आध्यात्मिक विशेषताएं
२ अ. पापनाशक : ‘तुलसी का दर्शन, स्पर्श, ध्यान, नमन, पूजन, रोपण एवं सेवन की कृतियां युगों-युगों के पापों को नष्ट करते हैं ।
२ आ. पवित्रता : जहां तुलसी का वन होता है, उस परिसर की कोसभर भूमि गंगाजी जैसी पवित्र बन जाती है । इस संदर्भ में स्कन्दपुराण में (वैष्णवखण्ड, अध्याय ८, श्लोक १३ में) कहा गया है,
तुलसीकाननं चैव गृहे यस्यावतिष्ठते ।
तद् गृहं तीर्थभूतं हि नायान्ति यमकिङ्कराः ।।
अर्थ : जिसके घर तुलसी का वन है, वह घर तीर्थ के समान पवित्र है । उस घर में यमदूत नहीं आते ।
२ इ. सभी देवताओं का वास होना : ‘तुलसी की वनस्पति की जड से लेकर सिरे तक के भाग में सभी देवताओं का वास होता है’, ऐसा बताया गया है ।
२ ई. श्रीविष्णु को तुलसी परमप्रिय होना
१. तुलसी वृंदावन में रहती है । वह श्रीविष्णु को परमप्रिय है ।
२. तुलसीदल के बिना श्रीविष्णु की पूजा व्यर्थ होती है । पद्मपुराण में कहा गया है कि स्वर्ण, रत्न एवं मोतियों के फूल भी यदि श्रीविष्णु को समर्पित किए गए, तब भी तुलसीदल की १६वीं कला की भी बराबरी नहीं होगी ।
३. तुलसीपत्र रखे बिना अथवा तुलसीदल से प्रोक्षण किए बिना श्रीविष्णु भोग ग्रहण नहीं करते ।
४. कार्तिक मास में तुलसीदल के साथ की गई श्रीविष्णुपूजा की विशेष महिमा है ।
५. श्रीविष्णु, श्रीकृष्ण अथवा श्री विठ्ठल के गले में तुलसी की सुंदर माला पहनाई जाती है ।’
(संदर्भ : ‘भारतीय संस्कृतिकोश’, खंड ४, पृष्ठ क्र. १५५)
३. तुलसी का विवाह प्रतिवर्ष श्रीकृष्ण के साथ कराने के संबंध में कथा !
देवताओं का जलंधर दैत्य के साथ युद्ध चल रहा था । उस जलंधर की वृंदा नामक पत्नी पतिव्रता थी । उसके पातिव्रत्य के प्रभाव के कारण देवता जलंधर दैत्य का वध नहीं कर पा रहे थे । उस समय श्रीविष्णु ने जलंधर का रूप लेकर वृंदा का पातिव्रत्य भ्रष्ट किया । परंतु उसी समय श्रीविष्णु ने वृंदा के पातिव्रत्य पर प्रसन्न होकर उसे वर भी दिया, ‘वृंदा, तुम तुलसी बनकर सभी के लिए वंदनीय होगी । तुम्हारे तुलसीपत्र से भक्त मेरी पूजा करेंगे, साथ ही प्रतिवर्ष कार्तिक मास में तुम्हारा विवाह मेरे साथ कराया जाएगा ।’ भगवान श्रीकृष्ण श्रीविष्णु के पूर्णावतार हैं । उसके कारण प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल द्वादशी से लेकर पूर्णिमा तक किसी दिन तुलसी का विवाह श्रीकृष्ण से कराया जाता है ।

४. देवता को भोग लगाते समय तुलसी के पत्ते का उपयोग क्यों किया जाता है ?
देवता को भोग लगाते समय तुलसी के पत्तों का उपयोग करने से भोग देवता तक शीघ्र पहुंचना, उसका सात्त्विक बन जाना तथा उस पर अनिष्ट शक्तियों का आक्रमण होने की संभावना अल्प होना
४ अ. तुलसी की विशेषता : तुलसी वनस्पति वायुमंडल से सात्त्विकता खींच लेने में तथा उसे प्रभावीरूप से जीव की ओर प्रक्षेपित करने में अग्रणी है । ब्रह्मांड में विद्यमान श्रीकृष्णतत्त्व को खींच लेने की क्षमता भी तुलसी में अधिक होती है ।
४ आ. लाभ
१. तुलसी के पत्ते से भोग लगाने से सात्त्विक अन्न से प्रक्षेपित होनेवाली सूक्ष्म तरंगें तुलसी के पत्ते से ग्रहण की जाती हैं । ऐसे सूक्ष्म तरंगों से युक्त पत्ता देवता को समर्पित किए जाने के कारण देवता के तत्त्व से उन तरंगों को शीघ्र ग्रहण किया जाता है । अत: हमारे द्वारा समर्पित अन्न तुलसी के माध्यम से देवता तक शीघ्र पहुंचता है तथा उससे देवता के शीघ्र संतुष्ट होने में सहायता मिलती है ।
२. भोग पर तुलसी का पत्ता रखने के कारण अन्न पर बना रज-तम कणों का आवरण न्यून होता है । तुलसीदल से प्रक्षेपित होनेवाली सात्त्विक तरंगों के कारण भोग के चारों ओर का वायुमंडल शुद्ध होकर भोग पर अनिष्ट शक्तियों का आक्रमण होने की संभावना भी अल्प होती है ।
३. भोग पर भावपूर्ण तुलसीदल रखने से वह उसके मूल गुणधर्म के अनुसार देवता से आनेवाला चैतन्य ग्रहण कर उसे प्रभावीरूप से भोग की ओर संक्रमित करता है । उसके उपरांत ऐसे भोग के सेवन से जीव की देह को चैतन्य की तरंगें मिलने में सहायता होती है ।’
(संदर्भ : सनातन का ग्रंथ : ‘पंचोपचार एवं षोडशोपचार पूजन का अध्यात्मशास्त्र’)
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